सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

April, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ओह!

ओह!
उफ्फ़! आज कितनी गर्मी है. कल से ज्यादा होगा आज का तापमान, पक्का... मूर्खता देखिये की आज हेलमेट लेकर भी नहीं निकला. बस अब जल्दी से घर पहुँच जाऊं. यह अच्छा है की आज सारे सिग्नल ग्रीन ही मिल रहे हैं, वर्ना दोपहर के साढ़े बारह बजे इस कड़ी धूप में दो पल को भी रुकना पड़ जाए तो..!! अपनी ही नज़र लगी पुलिस लाइन का सिग्नल रेड हो गया. खैर चलो घर पास ही है. इस ऑटो की बगल में खड़ा हो जाता हूँ. ८९..८८..८७... ओह कब आएगा यह सिग्नल १ पर.. ये ऑटो में बैठे बाबाजी को क्या होगा.. क्या थूक रहा है ये... अरे देखना... ये तो उलटी कर रहा है... और उलटी को बायीं हथेली में उगल कर धीरे से ऑटो के नीचे फेंक रहा है... और दाहिने हाथ से मुझे क्या इशारा कर रहा.. अच्छा गाडी आगे बढाने के लिए कह रह है... ताकि मेरी गाड़ी अथवा मेरे ऊपर उलटी... अरे जल्दी बढ़ाओ गाड़ी..मेरे पीछे वाला चिल्लाया, लेकिन मुझे उस पर गुस्सा आ गया, मैंने गाड़ी वहीं खड़ी की और उतारकर इधर-उधर पानी का इंतजाम देखने लगा, ताकि बाबाजी कम से कम कुल्ला कर के मुंह तो धो ही ले... मुझे पुलिस लाइन के सामने चाय की टापरी दिखी, मैं गाड़ी से चाबी निकल टपरी की तरफ दौड…

अनहद

(सुभाष तुलसीता का एक रेखाचित्र) 
कपोलों के सहज बिंदु पर छपे प्रार्थना पत्रों में कभी नहीं ढलता है सूर्य अँधेरे में खो जाने के लिए
श्वेत स्मित मुस्कान अचानक ही नहीं दिया करती दस्तक न ही पक्षी गाने के लिए बांग की प्रतीक्षा करते हैं
मेढक टर्राते हैं साल भर चाहे पानी बरसे या न बरसे...

(वर्ष २००७ में प्रकाशित कविता संग्रह 'सो जाओ रात' से)

परिवर्तित अस्तित्व

(मशहूर चित्रकार सुभाष तुलसीता का एक रेखांकन) 
नहीं लिखा होता तलवार की धार पर की किसकी गर्दन बनेगी उसका भोजन
सिक्कों पर भी नहीं होता किसी विशेष उपभोक्ता का नाम
तलवार और सिक्कों का वजूद निर्भर करता है उन हाथों पर जो करते हैं उनका उपयोग और उपयोग के प्रयोग
टिकाऊ  न तलवार की धार है  न सिक्कों की खनक
दो चार गर्दन के साथ कट जाती है धार दो पांच जेब में ही गुम जाती है खनक
धार और खनक का नहीं होना प्रभावित करता है इतिहास को
इतिहासज्ञ ढूंढ़-ढूंढ़ कर लाते हैं उन गर्दनों को और उन करतलों को जिन्होंने निगल ली है धार और खनक
जाने किस लाचारीवश इतिहासकार उचित नहीं समझते उन हाथों का उल्लेख जो उपयोजक रहे हैं धार और खनक के जो हमेशा करते रहे हैं पलायन परिवर्तित अस्तित्व की आड़ में
इतिहास गवाह है उपयोग ने कभी नहीं माना क्यों और कैसे का प्रयोग
(वर्ष २००७ में प्रकाशित कविता संग्रह 'सो जाओ रात' से) 

हुई सुबह

सिया मिश्र की पेंटिंग 'स्पेसशिप' 

एक लड़की हंसती है बस की खिड़की से बाहर देखती हुई तो छँटने लगती है कालिमा शहर की
दूर कहीं से घनघनाता भोंपू उछाल देता है सूर्य को आकाश में 
(वर्ष २००७ में प्रकाशित कविता संग्रह 'सो जाओ रात' से)

बंगाली बाबा

कपाल के मूल में धंसी आँखों से झांकता  उनका जीवन दर्शन इस बार भी उनके पोपले मुंह में होकर रह गया गोल-गोल, फुस्स-फुस्स
आकाश की धूप को अपनी छितरी छतरी पर टिकाये और होंठ के कोर से फिसलती लार की धार को गंदले अंगरखे के हवाले करते उन्होंने नाक से स्वर साध मुझसे पूछा 'बोलो हमी है बंगाली बाबा'
उन्हें साइकिल की कैरिअर पर बिठा मैंने पैडलों के सहारे धकेली थी उनके घर की तरफ एक नदी अंग्रेजों के जमाने का एक पुल और राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात
रास्ते भर बीड़ी के  सुन्न धुएं में मिला वह सुनते रहे मुझे टुकड़ों-टुकड़ों में  बाउल रेल की नौकरी छोड़ने की कहानी और बाबूजी से दोस्ती के किस्से-कोताह
२. दो शाम नाश्ते की प्लेट की जबरन अनदेखी के बाद भी जब पिताजी को नहीं मिली गंगा तो उन्होंने मुझे  बंगाली बाबा को बुला आने का निर्देश दिया था
दरवाजे पर बाबा को जूते उतारते देख पिताजी उछल पड़े थे गंगा से मिलने की कल्पनाकर  'कब से गायब है गैया मतलब गंगा..' बाबा के सवाल का जवाब पिताजी अपने उच्छ्वास से देते हैं
फिर अम्मा बाबा के आदेश पर घर भर में दिखाई देने लगीं आधी पालथी और घुटने पर टिकाये अपने लरजते शरीर को बाबा फूंकते हैं पीढ़े पर
अक्षत, कनेल के फू…

समता

समता की  चाह से ही टूटेंगे  जाति  और  धर्म के  चक्रव्यूह
समता की दीक्षा यहाँ जारी है अहर्निश

सो जाओ रात

चारों तरफ बरस रही है रात नभ-मंडल का पर्दा खुल गया है
चाँद पर लिख इबारत रास्ते सोने चले गए हैं
चांदनी दबे पैर आ गई है दूब पर 
शबनम बनाने लगी है घर पूरे लय में
सितारे खेलते हैं आँख मिचौनी शहर की रोशनी से
सूर्य को सपने में देख रास्ते चौंकते हैं नींद में
शबनम की तन्मयता सितारों का संघर्ष देख अँधेरे को भी नींद आने लगी
नीरव मौन को सुलाना जरूरी है की इससे भंग हो रही है रास्ते की नींद सितारों का संघर्ष शबनम की तन्मयता
आओ मौन को सुलाएं नींद तुम लोरी गाओ मैं टोकरी में सपने भर खड़ा हो जाता हूँ मौन के सिराहने
रात का बरसना ज़ारी है तो रहा करे कसम से
(२००७ में प्रकाशित मेरे कविता संग्रह 'सो जाओ रात' की शीर्षक कविता. इस कविता को 'वागर्थ' के नव-लेखन प्रतियोगिता -२००७ में सांत्वना पुरस्कार भी दिया गया था.)

वलनीः छब्बीस बरस की गवाही

-लेखक योगेश अनेजा 

यह कहानी है नागपुर तालुका के गांव वलनी के लोगों की। वलनी में उन्नीस एकड़ का एक तालाब है। वलनीवासी 1983 से आज तक वे अपने एक तालाब को बचाने के लिए अहिंसक आंदोलन चला रहे हैं। छब्बीस वर्ष गवाह हैं इसके। न कोई कोर्ट कचहरी, न तोड़ फोड़, न कोई नारेबाजी। तालाब की गाद-साद सब खुद ही साफ करना और तालाब को गांव-समाज को सौंपने की मांग। हर सरकारी दरवाजे पर अपनी मांगों के साथ कर्तव्य भी बखूबी निभा रहा है यह छोटा-सा गांव। योगेश अनेजा, जो अब इस गांव के सुख-दुख से जुड़ गये हैं, वे 26 वर्ष लम्बी  दास्तान को बयान कर रहे हैं. हम सब कलेक्टर के पास अर्जी लेकर गए थे। उन्होंने कहा कि मैं तो यहां नया ही आया हूं। मैं देखता हूं कि मामला क्या है। अर्जी के हाशिए में कोई टिप्पणी लिखकर उसे एस.डी.ओ. की तरफ भेजते हुए कहा कि अभी तो मंत्रीजी आ रहे हैं, मैं उन्हें लेने हवाई अड्डे जा रहा हूं। आप बाद में मिलिए। अगली बार फिर उन्नीस किलोमीटर दूर से अर्जी लेकर चार-पांच साथियों को किसी तरह मनाकर जुटाकर कलेक्टर साहब से मिलने पहुंचा तो पता चलता है कि वे तो अभी एक बैठक में हैं। आज नहीं मिलेंगे। किसी कोशिश में मिल भ…