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May, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक जून को फाल्गुन विश्व की पहली वर्षगाँठ है

आगामी एक जून को फाल्गुन विश्व की पहली वर्षगाँठ है. यों १७ जुलाई २००९ को फाल्गुन विश्व एक साप्ताहिक के तौर पर पाठकों से रू-ब-रू हुआ था, लेकिन एक सांस्कृतिक-वैचारिक पत्रिका को हर सप्ताह सिर्फ उत्साह और जिद के भरोसे नहीं प्रकाशित किया जा सकता. मार्च २०१० में पत्रिका बंद हो गई. लेकिन जून २०१० में हमने मासिक के तौर पर वापसी की. रंगीन आवरण में हमने फाल्गुन विश्व का प्रवेशांक प्रकाशित किया. महज ५०० प्रतियां छपी गई. इससे ज्यादा छपने का पैसा ही नहीं था. प्रवेशांक को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया लेकिन जुलाई का अंक छापने के लिए जरूरी धन एकत्रित नहीं हो पाया, लिहाजा जुलाई और अगस्त का अंक संयुक्त रूप से प्रकाशित करने का निर्णय हुआ. लेकिन अगस्त में भी जरूरी धन में कमी रह गई, सो जुलाई-अगस्त और सितम्बर का संयुक्त अंक प्रकाशित हुआ. लेकिन आवरण ब्लैक-वाइट रहा. इस बार भी प्रतियां ५०० ही छपी गई. पाठकों ने इस अंक को भी तहेदिल से स्वीकार किया.

अक्तूबर में कुछ मित्रों के सुझाव पर सदस्यता मुहिम चलाई गई. महज दस रुपये में साल भर पत्रिका देने की बात हुई. यह योजना बनी की यदि देश भर में पत्रिका के दस हज़ार पाठक इस मुह…

ये हैं सबीहा खुर्शीद, नहीं डाक्टर सबीहा खुर्शीद.

ये हैं सबीहा खुर्शीद, नहीं डाक्टर सबीहा खुर्शीद. नागपुर के पास एक छोटे से कस्बे कामठी में रहती हैं. सबीहा ने हाल ही 'उर्दू में माहिया निगारी' पर पी.एचडी. हासिल की है. इस विषय पर अनुसंधान करने वाली वे देश और दुनिया की पहली शख्सियत हैं. पंजाब में लोकगीत के तौर पर माहिया की बड़ी प्रतिष्ठा है. लेकिन पंजाबी में माहिया के आगाज़, इर्तेका और उर्दू में इसके इब्तेदा के साथ उर्दू में होने वाले वजन और मेज़ाज़ को सबीहा ने अपने अनुसन्धान का विषय बनाया. उन्होंने माहिए के लिए किये जाने वाले तजुर्बात को भी निशान ज़द किया और माहिया कहने वालों को उनके इलाकाई हवाले से उजागर किया है. सबीहा के अनुसन्धान में मगरीबी दुनिया के माहिया निगार, हिन्दुस्तान के माहिया निगार, पकिस्तान के माहिया निगार तफसील से अपनी जगह बनाए हुए हैं. उर्दू माहिए के बानी हिम्मत राय शर्मा और इस तहरीक के रूह-ए-रवां हैदर कुरैशी तक, सभी से सबीहा आपका परिचय पूरी शिद्दत के साथ कराती हैं.
सबीहा एक बुनकर के घर पैदा हुईं और तमाम जद्दोजहद के साथ अपनी शिक्षा को उन्होंने एक मुक्कल मुकाम तक पहुंचाया है. अपने घर में पढ़ने-लिखने का जुनून रखने…

कहाँ हो तुम?

अब तो तुम्हारी छवि भी स्मृतियों से धूमिल होने लगी है
दिन में एक बार
उस मोड़ से गुजरना ही होता है मुझे
जहां तुम्हें हँसते देखकर
गिर पड़ा था वह सावंला बाइक सवार अपनी होंडा सीडी हंड्रेड से
उस पुल पर से भी
जिस पर न जाने कितनी ही बार
ठहर गया था समय
तुम्हें गुजरते देख

तुम्हें याद है
मुकेश का वह दर्दीला गीत
'दीवानों से ये मत पूछो...'
जिसकी अंतिम दो पंक्तियाँ
मैं अपनी नाक दबा कर गाता था
और तुम गीत के तमाम दर्द को महसूसने के बावजूद
खिलखिला कर हंस पड़ती थी

हिस्लॉप कॉलेज के प्रांगण
में उस रोज जब
बहुत दिनों बाद देखा था मैंने और तुमने
एक-दूसरे को
तो हमारे चेहरे के लाली चुराकर भाग गया था
सूर्य आकाश में
याद है न तुम्हें!

कैसी हो तुम या कैसी होगी?
इस सवाल का जवाब कभी नहीं ढूँढा मैंने
तुम्हें ढूंढते हुए भी
लेकिन मुझे हमेशा अंदेशा लगा रहता है कि
कहीं घट न रही हो
तुम्हारे मुस्कान की लम्बाई इस कठिनतम दौर में

तुम्हारे चेहरे का हर शफा
मैं लगभग भूल चूका हूँ
सिवाय तुम्हारे मुस्कान के
भूल चुका हूँ सारी बातें
सिवाय उस मौन के जिसे
तुमने कभी नहीं तोड़ा
मैंने तोड़ना चाहा तब भी

एक बार और देख लेने की तमन्न…

वह चाहता है

वह चाहता है  कोई आदमी उसे आदमी न कहे मेले में उस रोज घुमा आया है वह अपनी आदमियत
वह चाहता है  उसे मित्र न माना जाए कितने ही मित्रों की जेबें वह कर चुका है छलनी
वह चाहता है  दुनिया भर के लोग अमन और अधिकार से जीवित रहें मरने पर सभी का अभिवादन किया जाए
वह चाहता है   राह चलती स्त्रियाँ यों ही न जाने दें अपनी खुजली वह चाहता है  समाज अपने बवासीर का इलाज़  जल्द से जल्द कराये
हालांकि सब की तरह आप भी उसे पागल कह सकते हैं वह चाहता है
उसे पागल न कहा जाए न माना जाए

(कविता संग्रह 'सो जाओ रात' से) 

१९ मई १९९६ को मेरी उम्र २२ साल की थी और मेरी दुनिया बदल गई थी.

(मेरी शरीक-ए-हयात सुषमा)
२१ बरस का होते ही मैंने समाज को बेहतर बनाने का सपना देखते हुए घर छोड़ दिया था. साथ मौसेरे भाई हेमधर भी थे. हमने तय किया था की बस चलते जायेंगे सन्यासियों की तरह और समाज को समझते-समझाते समूचा जीवन बिताएंगे. कृष्ण जन्माष्टमी की रात हमने चुपके से घर छोड़ा. दोनों भाइयों ने एक-एक चिट्ठी लिखी और अपने-अपने घर के पूजा-घर में 'भगवान् के सिंहासन' में रख आये. 'भगवान् के सिंहासन' में इसलिए कि हम दोनों के पिता सुबह भोर में ही स्नान कर लेते थे और घंटों पूजा घर में बिताते थे. भगवान् को नहलाते समय सिंहासन साफ़ किया जाता था और उस समय उन्हें चिट्ठियां आसानी से मिल सकती थीं. चिट्ठियों में यही लिखा था कि हम लोग अपनी मर्जी से घर छोड़ कर जा रहे हैं और हमें ढूंढने की कोई कोशिश न की जाए... अब से यह दुनिया ही हमारा घर है...  रात बारह बजे घर से निकल कर हम दोनों अधाधुंध पैदल चलते रहे... सुबह होते-होते हम लोग लगभग साठ किलोमीटर पैदल चल चुके थे. महाराष्ट्र बार्डर पार कर हम दोनों मध्यप्रदेश की सीमा में आ गए थे. अपने ज़रा से कानूनी ज्ञान से हम इतना जानते थे की यदि पुलिस की मदद स…

शहर का पुल

उगता है सूर्य उसी पुल के नीचे से और पीछे से रोजाना कि जिस पर दिन भर दौड़ता है शहर और रात में लकलकाता है सन्नाटा 
तेज होती सिसकारियों पर अंकुश लगाने के प्रयास में एक बूढ़ी खंखारती है  उत्तेजित युवती झकझोरती है अपने पियक्कड़ पति को  जो भरभरा गया है उकसाकर उसे युवती बिलखती है उसका विलाप कुलबुला देता है पुल पर खड़े तमाम रिक्शों और ठेलों को
शहर भर में बिखरा फुटपाथ सिमट आता है रात में पुल पर लगी उन दो तख्तियों के बीच कि जिस पर खोंइची गई हैं भूमिपूजन से शिलान्यास तक की तारीखें और उबटा हुआ है किसी उदघाटनकर्ता का नाम पुल निर्माता कंपनियों के साथ तख्तियां सलामत हैं कि कुत्ते सींचते हैं उन्हें प्रतिदिन बिना सूंघे ही
पुल के नीचे  प्रभु के वराह अवतार के लिए हर सुबह इलाके के लोग छोड़ आते हैं रौरव
किशोरों की आँखों में पनपता है मिनी स्कर्ट और पैन्टियों के रंग सना आशावाद इसी पुल के नीचे
कई स्त्रियों की पेट की आग में पड़ता है पानी इसी पुल के नीचे
एक युवक इस पुल को देख-देख बन गया है नामी लेखक
वह बूढ़ा जो आप सबका सम्राट है इस पुल पर बोल सकता है कई-कई घंटे लगातार
पुल के नीचे से बहा करता है एक बड़ा नाला इस निर्देश के साथ कि शहर भर का कचरा बहान…

तलाश

मंजिल की तलाश उन्हें होती है जिन्हें चलने (रास्तों) से डर लगता है...

ईश्वर

दौड़ते हुए लोगों की आकांक्षा दौड़ने के ख्वाहिशमंदों के लिए एक आकर्षण दौड़कर थके और पस्त हुए लोगों के लिए होमियोपैथिक दवा
जो दौड़ न पाए उनके लिए तर्क-वितर्क दौड़ते-दौड़ते गिर गए जो उनके लिए प्यास
जिसने अभी चलना नहीं सीखा उसके लिए जरूरी पाठ्यक्रम
असल में ईश्वर उपन्यास का एक ऐसा पात्र जिसके अस्तित्व पर है लेखक का सर्वाधिकार...
(कविता संग्रह 'सो जाओ रात से'..)

संभव है?

(सुभाष तुलसीता द्वारा निर्मित 'पर्ण चित्र')
क्या यह संभव है कि जागकर हम पहले जाएँ आकाश में और दरवाज़ा भड़भड़ाकर उसे जगाएं और सूर्य देखकर हमें चौंके बरबस ही उसके मुंह से निकल पड़े अरे तुम! इतनी सुबह?
या कि सूर्योदय ही न हो हम बस देखकर घड़ी पहुँच जाएँ दफ्तर
बच्चे स्कूल
मजदूर फैक्ट्री
किसान खेत
महिलायें टेलीविजन के सामने

क्या यह संभव है कि
किसी रोज़ हम
चिड़ियों के घोंसलों में मुंह डाले
फुसफुसा रहे हों व्यंग्य से
कि उठो रानी
देखो कितना दिन चढ़ आया है
दाना चुगने नहीं जाओगी आज?

क्या यह संभव है कि
फूल हमारे इशारों से खिलें और मुरझाएं
और तितलियाँ हमसे पूछकर ही
फूलों का रस पायें

क्या यह संभव है कि
माँ
बनाकर खाना
खा जाए सारा
और दोपहर को बच्चे जब लौटें स्कूल से
और शाम को पति दफ्तर से
तो उन्हें दिखाए ठेंगा...


(वर्ष २००७ में प्रकाशित कविता संग्रह 'सो जाओ रात' से)

आतंक, श्रद्धा और डर

लादेन मारा गया सत्य साईं मर गए दोनों ही मोस्ट वांटेड थे और रहेंगे
आतंक से श्रद्धा पैदा होती है और श्रद्धा का आतंक कभी इंसान को उबरने नहीं देता
लादेन ने आतंक से श्रद्धा पैदा की सत्य साईं ने श्रद्धा से आतंक फैलाया
दोनों ही इंसानियत के दुश्मन थे दोनों ही मर चुके हैं
लेकिन डरे हुए इंसान मरे हुओं को कभी मरने नहीं देते अपने डर के वलय में संजोंकर रखते हैं उन्हें ताकि उनका डर डर न लगे श्रद्धा लगे, आस्था लगे, हौंसला लगे, प्रेरणा लगे
डरे हुए इंसान इंसानियत के सबसे बड़े दुश्मन हैं लादेन और सत्य साईं से भी बड़े
डरे हुए इंसान अतीत में रोप चुके हैं और आगम में भी रोपेंगे अपना डर यत्र-तत्र-सर्वत्र
इंसानियत और भविष्य को बचाना है तो डरे हुए इंसानों  तुम्हे मारना होगा अपने-अपने डर को
इंसानियत और भविष्य नहीं बचेगा यदि डरा हुआ इन्सान मर जाए अपने डर समेत एक दिन.... 

मेरी दिनचर्या

जिस रोज़ मैं गलतियां करता हूँ, उस रोज़ मैं दूसरों की गलतियां सहजता से नज़रंदाज़ कर देता हूँ... जिस रोज़ मैं गलतियां नहीं करता, दूसरों की एक गलती भी मुझे नागवार गुजरती है... :) :)) :)))