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June, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

स्कूल जाने के पहले एक बच्ची की प्रार्थना

"हे भगवान्, अब आप हमारे क्लास के बच्चों के गाल और हाथ की रक्षा करना. कल टीचर को नया डस्टर मिल गया है, इस साल का डस्टर बड़ा मज़बूत और मोटा है और टीचर का निशाना भी एक दम पक्का है. अपनी सीट से बैठे-बैठे ही वे किसी का भी गाल लाल कर सकती हैं. कुछ ऐसा करो भगवान् कि टीचर से ये डस्टर गुम जाए. या फिर ऐसा करो कि टीचर को लकड़ी मिल जाए, कम से कम लकड़ी कि मार सही जा सकती है क्योंकि हमें उसके बारे में मालूम होता है. लेकिन ये टीचर तो जुबान पर लकड़ी से मारती है. एक काम करो भगवान् टीचर ही बदल दो..., हाँ भगवानजी, ये टीचर हटाकर कोई ऐसी टीचर हमें दो, जो हमसे प्यार से बातें करे, हमें प्यार से हर बात, हर सबक समझाए और पूछने पर मारे नहीं बताये, समझाए वो भी प्यार से, बिलकुल हमारी मम्मी की तरह..., आप सुन रहे हो न भगवानजी.."

बापू का चश्मा

सेवाग्राम आश्रम से बापू का चश्मा क्या चोरी हुआ, हाय तौबा मचाने वालों की तो निकल पड़ी. किसी ने सेवाग्राम आश्रम समिति को जमकर कोसा कि उन लोगों ने आखिर इतने महीनों तक चश्मे की चोरी छिपाए क्यों रखी? तो किसी ने पुलिस विभाग को कोसा कि अभी तक चश्मे का कोई सुराग नहीं लग सका.  लेकिन कोई भी उस चोर के बारे में क्यों नहीं सोचता! वह बेचारा तो बापू का चश्मा चुरा कर कितना पछता रहा होगा? क्योंकि न तो वह उसे पहन सकता है, न बेच सकता है!! पहनेगा तो बापू की नज़र से दुनिया देखनी पड़ेगी!! और बेचेगा तो एक ऐसी चोरी के लिए पकड़ा जाएगा, जिसकी लिए न जाने के लिए कितने लोग उसे दुआएं दे रहे होंगे कि अच्छा हुआ बापू का चश्मा गया, आज नज़र गई है... कल नजरिया भी चला ही जाएगा... अब यदि चोर पकड़ा गया तो बापू के नज़रिए के जाने की आस लगाए बैठे तमाम लोगों की बद्दुआएं उसकी झोली में!! मुझे तुमसे सहानुभूति है चोर जी...

काका का एल्बम

कल इसी कविता को किसी और तरीके से लिखा था. आज  'कविता लेखन' पर अग्रज कवि-आलोचक नन्द भारद्वाज जी के मार्गदर्शन के बाद कल की कविता 'जय भीम कावडे काका, जय भीम' को कुछ इस तरह लिखा है. आप सुधीजनों से  तवज्जों चाहता हूँ ...


तनि-तनि से पंख हैं उस सफ़ेद तितली के जिन्हें मासूमियत से हिलाकर प्रदर्शित करती है वह अपना प्रेम हालांकि सैकड़ों पैरों वाला वह जंतु उसे कतई नहीं पसंद  लेकिन क्या करे काका के एल्बम में उसके लिए जगह ही यहाँ थी
काका के एल्बम में नाचते हैं मयूर गूंजते हैं भौरे सहमकर टंगा पड़ा है एक सफ़ेद उल्लू  और माजरे को समझने की कोशिश करता एक हिरन शावक इधर ही देखर रहा है
कुछ फूल और पत्तियों  और किस्म-किस्म की औषधियों की गुफ्तगूँ  आपको सुननी ही पड़ेगी साहेबान यदि आप देखेंगे काका का एल्बम तो
काका के एल्बम में सबकुछ अच्छा-अच्छा और सुन्दर नहीं है कुछ बदसूरत और वीभत्स चेहरे भी देखने पड़ेंगे आपको ये उन चेहरों के अंतिम अवशेष हैं जिन्हें कुचलकर भाग गए हैं बस-ट्रक जैसे अति भारी वाहन या कर-जीप जैसे कम वजनी वाहन  या फिर मोटर साइकल या स्कूटर जैसे हल्की गाड़ियाँ  
इन चेहरों की पहचान बनाए रखने की ठोस वजह है…

जय भीम कावडे काका, जय भीम

गाड़ेघाट* के मुहाने पर आपको देख विस्मित होती आँखें आत्मीयता से भर उठेंगी जैसे ही आप उनसे कावडे काका के घर का पता पूछेंगे
यों गाड़ेघाट पूरे नागपुर जिले में 'अम्मा की दरगाह' के लिए मशहूर है लेकिन इधर कावडे काका की वजह से इस गाँव का नाम कई लोगों के लिए आदरणीय हो गया है
५६ साल पुरानी देह में रहते हैं कावडे काका लेकिन उनके उत्साह और बुद्धि और मेधा और हिम्मत का  उनकी देह से कोई जोड़ बैठ ही नहीं पाया अब तक इसलिए आप देखते ही कहेंगे काका आप तो ३८-४० से ज्यादा के नहीं लगते
गाड़ेघाट अम्मा की दरगाह और कावडे काका के अलावा भी कुछ अन्य वजहों से जाना जाता है इस हल्क़े** में जैसे यहाँ के रेती घाट ठेकेदार यहाँ से रेती निकालते समय इतने तल्लीन हो जाते हैं कि हर साल चार फुट की तय जगह की बजाय १२-१५-१८-२० फुट तक खोह करते हैं और आराम से रेती ले जाकर पैसा कमाते हैं रायल्टी चार फुट की, बाकी का 'माल' अपने बाप का ठेकेदारों की इस प्रवृति को
तहसीलदार और कलेक्टर की स्थायी हरी झंडी मिली हुई है
ठेकेदार की करतूतों की सजा भुगतती है नदी कन्हान नदी कि जिसके किनारे बसा है गाड़ेघाट और इसी गाड़ेघाट में है अम्मा की दरगाह और कावडे का…

इन कविताओं को पढ़ा जाए...

१९९५ की सर्दियों की एक सुबह ननिहाल में बैठे-बैठे 'फूट' पड़ीं ये कविताएं. आकार में ये कविताएं अत्यंत छोटी हैं, लेकिन एक ही 'मूड' में लिखी गईं हैं. ये सभी कविताएं 'सो जाओ रात' संग्रह में संकलित हैं. आज इन्हें बहुत सालों बाद पढ़ रहा था, तो लगा कि आप मित्रों से भी इन्हें साझा किया जाये...
प्रश्न
दर्पण निहारने का कार्यक्रम **
उत्तर
जिसे ढूँढा जाए **
इच्छा
स्वाद की तलाश में पीड़ा भोगने की एक क्रिया **
जीवन
आड़ी-टेढ़ी लकीरों का एक लटकता गुच्छ
जिसे खींचने पर गाँठ पड़ने का भय सदैव बना रहा **
माँ
जो जानती है हमारे विषय में वह सब जो हम नहीं जान पाते कभी
जो हमें दे सकती है वह सब जिसके आभाव में स्वयम वह कलपती रही है ता-उम्र
जो सदा हमें छिपाने को तैयार हम चाहें तो भी, न चाहे तो भी
जिसकी उंगलियाँ जानती हैं बुनना जिसकी आँखें जानती है डूब जाना जिसके स्वर में शैली और गुनगुनाहट हो
जो हमेशा चादरों की बात करे. **
पिता
उन्हें नहीं मालूम उनकी किस उत्तेजना में बीज था
वे घबराते हैं यह जानकार कि काबिलियत  उनके ही अस्तबल का घोड़ा है संतति को लायक बनाने के लिए सारी तैयारियां कर चुके हैं वे
और यह सोचकर ही खुश हो लेते हैं कि उनके बच्…

टूट जाना ही बेहतर...

( सुभाष तुलसीता का रेखांकन  )
हालाँकि  टूटने के बाद  बिखरने का डर बना रहता है,  लेकिन मैं सोचता हूँ  कि टूट ही जाऊं तो बेहतर होगा 
आखिर कब तक बिखरने के डर से न टूटने का अभिनय करता फिरूंगा
आप मित्रों से अनुरोध है कि मैं बिखरने लगूँ यदि, तो कृपया मुझे समेटने की कोशिश बिलकुल न कीजियेगा. हालाँकि मैं जानता हूँ किसी के बिखराव का चश्मदीद होना आसान नहीं होता हमारा अहम् हमें न बिखरने की ही इजाज़त देता है और न ही बिखराव के दर्शक होने की लेकिन कद्रदानों-मेहरबानों  मुझे बिखरने देना टूट-टूट कर बिखरने देना चूर-चूर होकर बिखरने देना फूट-फूट कर बिखरने देना
मत रोकना मत टोकना हाँ नज़र जरूर रखना कि कोई मेरे बिखराव का अफसाना न बना ले कोई मेरे बिखराव को अपने शिगूफों का ठिकाना न बना ले कोई मेरे बिखराव पर अपनी रोटियां न सेक ले कोई मेरे बिखराव की बोटियाँ न नोच ले
ये क्या मैं तो सच-मुच टूट रहा हूँ...!!! ???

क्यों जरूरी है फाल्गुन विश्व का प्रकाशन?

इसलिए जरूरी है फाल्गुन विश्व का प्रकाशन -
- ताकि प्रतिरोध और असहमतियों की आवाजों के लिए जगह बची रहे.
- ताकि रूबरू होता रहे आम पाठक अपने समय-सत्ता-समाज से.
- ताकि मुझे जीने का मकसद मिले.
- ताकि तुम्हें जीने का मकसद मिले.
- ताकि बेहतर दुनिया बनाने का हमारा सपना आकार पाए...
- ताकि संभावनाएं अशेष रहें
- ताकि विडम्बनाएं मुक्ति पायें
- ताकि समता और इन्साफ हमारे समाज का चरित्र बनें
- ताकि हर कोई बन सके अपना दीपक स्वयं, ''अत्त दीपो भव"
आइये मिलजुलकर इस अभियान को आगे बढ़ाएं
फाल्गुन विश्व पढ़े-पढ़ाएं
एक अंक - मूल्य १० रूपए मात्र
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आजीवन सदस्यता शुल्क - १,००० रूपए मात्र
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कृपया बैंक में राशि जमा कराने के पश्चात अपना नाम और पता मोबाइल क्रमांक 09372727259  पर एस.एम्.एस. करें.
आइये हमकदम बनें, हमनवा बनें बेहत…

क्योंकि कामठे जी सोते रहे, इसलिए सैकड़ों लोग जागते रहे...

अच्छा हुआ आप यहाँ नहीं हैं, हमारे साथ. अरे साहब हम इस समय महाराष्ट्र की उपराजधानी यानी नागपुर जिले के एक छोटे से गाँव कन्हान में हैं. कन्हान के तुकराम नगर मोहल्ले में किराए से रहते हैं अपन. यदि आप भी कल मेरे साथ यहाँ होते, तो रात भर आपको जागना पड़ता. जी जागना इसलिए पड़ता क्योंकि कामठे साहब सोये हुए थे.  अब ये कामठे साहब के सोने की वजह से अपने जागने का क्या मतलब? यही पूछना चाहते हैं न आप? तो साहेबान  जान लीजिये की कामठे साहब वो शख्स हैं की जिनकी मर्जी की बिना इनदिनों रातों में सो पाना नामुमकिन हैं. कामठे साहब सोते रहेंगे तो मच्छर आपके यहाँ अपने पूरे कुटुंब के साथ डेरा डाल देंगे. बारिश का मौसम है साहेबान, उमस भी इनदिनों क्या कमाल की होती है, फिर चाहे रात हो या दिन, उमस तो अँधेरा-उजाला देखकर होती नहीं. कामठे साहब, हमारे 'इलाके' के कतिपय गणमान्य 'लाइनमैनों' में से एक 'लाइनमैन' हैं!! जी लाइनमैन!!! लाइनमैन यानी ऐसा व्यक्ति जो आपकी रात खराब कर सकता है, आपके सपनों को चकनाचूर कर सकता है.  पिछली रात यानी १५ जून की रात पूरी दुनिया चंद्रग्रहण का मजा ले रही थी. ये गलती अपन ने भ…