गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

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पुष्पेन्द्र फाल्गुन
संपादक फाल्गुन विश्व
द्वारा- विश्वभारती प्रकाशन
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सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

प्रवाह



जैसे दो किनारों के सहारे आगे बढ़ती है नदी 
किनारे न हों तो भटक जाएगी नदी
किनारे नदी के भटकाव को रोकते हैं
और रखते हैं प्रवाहमान उसे

किनारे न हों तो दूर तक कहीं फ़ैल कर नदी ठहर जायेगी...

स्वाभाविक तरीके से गतिमान रहना है तो दो की जरूरत अपरिहार्य है
दो पैर हों तो चाल स्वाभाविक होगी
दो हाथ हों तो उलट-पलट आसान होगी 

उलट-पलट से एक किस्सा याद आया

कोई दस बरस पहले की बात है
मैं एक पारिवारिक शादी में शरीक होने ननिहाल गया था.
वहाँ जो खानसामा थे, उनसे मेरी दोस्ती हो गई.
मैं उनसे अलग-अलग व्यंजन बनाना सीखता...

एक शाम बड़े से चूल्हे पर एक बड़े कड़ाह में वे आलू और कद्दू के सब्जी बना रहा थे
उनके दोनों हाथ में सब्जी चलाने के लिए औज़ार थे...
मैंने उनसे पूछा, 'सब्जी चलाने के लिए दो-दो औज़ार क्यों...'
वे हँसते हुए बोले, 'एक उलटने के लिए एक पलटने के लिए...'
मैंने पूछा, 'उलटने-पलटने!! मतलब?'

मेरे गालों को छूकर उन्होंने कहा, 'जिस दिन उलटने-पलटने की उपयोगिता समझ जाओगे, अपने साथ-साथ औरों का जीवन भी  आसान बना दोगे...' 

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

फर्क



"क्या आपको सचमुच फर्क नहीं पड़ता!!" मैंने हैरत से उस बुजुर्ग फ़कीर से पूछा था.
लगभग हँसते हुए लेकिन अत्यंत दृढ़ स्वर में उन्होंने कहा था, "नहीं."

मेरे रुआंसे चेहरे को देखकर उन्हें फिर हंसी आ रही थी. लेकिन उन्होंने हंसी को ज़ब्त करने का अभिनय किया.
मैंने लम्बी सांस खींचकर उनसे पूछा, "तो फिर किस बात से फर्क पड़ता है?"

चमकती आँखों और मुस्कुराते होठों के मालिक उस फकीर ने कहा, "इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक, आप आत्मा और परमात्मा को मानते हैं या नहीं, आप कर्मकांडी हैं या नहीं, आप साम्यवादी  हैं या नहीं, फर्क इस बात से पड़ता है कि आपका चित्त निर्मल है या नहीं. यदि आपके आस्तिक अथवा नास्तिक होने से आपका चित्त निर्मल हो जाता हो तो आप शौक से आस्तिकता अथवा नास्तिकता का ढोल बजाइए. लेकिन यदि आपका चित्त निर्मल नहीं हैं तो फिर किसी को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक, साम्यवादी हैं या भाग्यवादी, कर्मकांडी हैं या कर्मवादी..."

वह बूढ़ा फ़कीर अपनी बात खत्मकर कब का जा चुका था और मैं अपनी हैरत को संभालने के तरीके ढूँढने में मशगूल था....

नाव, नाविक और समुद्र

समग्र चैतन्य - पुष्पेन्द्र फाल्गुन मित्र ने कहा, ‘समंदर कितना भी ताकतवर हो, बिना छेद की नाव को नहीं डुबो सकता है.’ तो मैंने एक क...