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October, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक नई ग़ज़ल पेश-ए-नज़र है ...

उनके लिए शौक़-ए-इज़्हार है हुनर मेरी तो ज़िन्दगी की अब्सार है हुनर 
कितने ही सवालात जीता हूँ, पीता हूँ  मेरे लिए होता हुआ एतबार है हुनर 
मुकम्मल का हिस्सा तुम्हें लगता हूँ मेरे हिस्से-हिस्से में यलगार है हुनर  
ओट से देखने की फितरत क्यों पालें  जब बेजल्व-ए-कराती दीदार है हुनर
यही ख़ुशफ़हमी उन्हें देती तसल्ली है  कि फ़ुवाद सा हमारा बे ज़ार है हुनर 
मिलेंगे उनसे तो बतायेंगे ये फाल्गुन  कि प्यार की ही तरह मेरा यार है हुनर 
                       - पुष्पेन्द्र फाल्गुन 

इज़्हार = अभिव्यक्ति  अब्सार = आँख एतबार = भरोसा  मुकम्मल = संपूर्ण  यलगार = विद्रोह  फितरत = प्रवृति  बेजल्व = बिना दिखावे के  दीदार = दर्शन  फ़ुवाद = हृदय, दिल 

बहुत दिनों बाद एक ग़ज़ल मुकम्मल हुई है, ज़रा गौर फरमाएं ...

वह शख्स जो किसी मस्जिद-मंदिर नहीं जाता  दरअसल वह आदमी किसी के घर नहीं जाता 
मस्जिद-ओ-मंदिर में अब जो भीड़-शोर-सोंग है मैं तो मैं अब वहाँ कोई खुदा-ईश्वर नहीं जाता   
मिलाया हाथ, लगाया गले, दी तसल्लियाँ तुमने तुम्हारे प्यार का शुक्रिया पर मेरा डर नहीं जाता 
बदला, ओढ़ा, रगड़ा, तोड़ा और कितना मरोड़ा क्या करूँ कि तेरे ऐतबार का असर नहीं जाता 
पीने को पानी नहीं, खाने को दाना नहीं फिर भी  तुझसे मेरा दिल ऐ ज़िन्दगी क्यों भर नहीं जाता 
मिलने पर जो आदमी देख चौंके तुम्हें फाल्गुन  समझना उसके घर आदमी अक्सर नहीं जाता  
 - पुष्पेन्द्र फाल्गुन                                      15 अक्तूबर 2012