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हेमधर शर्मा की दस कविताएँ

(1) . कविता के साथ-साथ

हो सकता है कि अच्छी न बने कविता क्योंकि आँखों में नींद और सिर में भरा है दर्द पर स्थगित नहीं हो सकता लिखना लिखा था कभी कि जीवन की लय को पाना ही कविता है लय तो अभी भी टूटी नहीं पर सराबोर है यह कष्टों और संघर्षो से नहीं रोकूँगा अब इन्हें कविता में आने से. ओढ़ँगा-बिछाऊँगा रखूँगा अब साथ-साथ कविता को. जानता हूँ कठिन है इजाफा ही करेगी यह कष्टों-संघर्षो में लेकिन मंजूर है यह. साथ रही कविता तो भयानक लगेगी नहीं मौत भी कविता के बिना लेकिन रास नहीं आयेगा जीवन भी.
(2). कठिन विकल्प
गुजरता हूँ जब गहन पीड़ा से जन्म लेती हैं तभी, महान कविताएँ इसीलिये नहीं करता मन भागने का, अब कष्टों से चुनता हूँ वही विकल्प जो सर्वाधिक कठिन हो. हताशा लेकिन होती है शक्ति के अभाव में जब चिड़चिड़ा उठता है मन. होती महसूस तब प्रार्थना की जरूरत इसलिये नहीं कि कम हो जायँ दुख-कष्ट बल्कि शक्ति मिले उन्हें सहने की. इसीलिये बार-बार हार कर भी आता उसी जगह पर चुनता हूँ कठिन विकल्प स्वेच्छा से दुख-कष्ट. फीनिक्स पक्षी की तरह मरता हूँ बार-बार जीता हूँ फिर-फिर अपनी ही राख से. (3). अंतहीन यात्रा 
जब भी लगता है सब…

पिता

पिता को हम चाहें न चाहें  पिता हमें चाहें न चाहें  वे हमारे पिता होते ही  हमारे स्थायी पता हो जाते हैं।
पिता की उंगलियाँ पकड़कर  हमने चलना सीखा हो कि न हो  पिता ही हमारी ज़िन्दगी में  रास्तों की वजह बनते हैं।
पिता ने गिरने से संभाला हो कि न हो  गिरने के बाद और गिरते हुए भी  और गिरने से बच जाने के बावजूद  शिद्दत से हमें याद आते हैं पिता।
पिता अच्छे या बुरे नहीं होते  पिता सच्चे या झूठे नहीं होते  पिता या तो पिता होते हैं  या फिर पिता नहीं होते।
जिस दिन पिता हमारी ज़िन्दगी से चुक जाते हैं  उसी दिन से दुनियादारी की मुर्गियाँ  रोज़-रोज़ चली आती हैं  चुगने हमारा बचपन 
पिता का नहीं होना  बेपता हो जाना नहीं होता है  लापता हो जाना भी नहीं होता है 
पिता का नहीं होना  हमारी ज़िन्दगी में चस्पा कर जाता है  एक ऐसा रिक्त स्थान  जिसे भरना सिर्फ  और सिर्फ पिता को ही आता है।
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मरने से पहले एक कवि का सपना

सामने  भयावह चुनौतियाँ हैं  और  कई यक्ष प्रश्न  एक साथ खड़े हैं ! 
चारों ओर से उठे  अंधड़ों ने  मुझ तक आती  सूर्य-किरणों का रास्ता  रोक लिया है 
पार्श्व से  सपनों के बिलखने के स्वर  तेज़ होते जा रहे हैं  अभी - अभी  मेरे कहने पर  बेटियों ने इन सपनों को  अपनी आँखों से नोच  धूल भरी सड़क पर पटक दिया है 
पत्नी की उदासी भी  नया ठिकाना नहीं ढूँढ पाने के  अफ़सोस के साथ लौट आयी है 
समय ने  मेरे लिये  कड़ी सज़ा मुक़र्रर की है 
समय ने  मेरे बेबाक मेरे दृढ़-निश्चय  मेरे जन-निष्ठ  होने को  अक्षम्य अपराध माना है 
समय ने  मेरी इंसाफ़-पसंदगी को  घोषित किया है मानव-द्रोह  मेरी मुस्कराहट को   धर्म - विरोधी करार दिया है  मेरी जीजिविषा को  चरम अनैतिक कृत्य माना है  मेरे प्रयोगों को  असामाजिक और विद्वेष-पूर्ण  कार्रवाई की संज्ञा दी है 
आसमान के सारे देवता  समय के  समस्त फैसलों से  सहमत हैं  मेरे सभी मित्र और शत्रु  देवताओं की कतार में खड़े हो  एक - सी - एक फब्तियाँ  मेरी ओर उछाल रहे हैं  लगता है देवताओं ने उन्हें भी  आखिर मेरे खिलाफ़ बरगला ही लिया है 
जीवन की  समर-भूमि में मैं  अकेला और निहत्था  मित्रों …