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March, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लघु कथा

थप्पड़ 
यह उस समय की बात है जब शहरों में नए-नए कंक्रीट के जंगल उगने शुरू हुए थे। सड़क के किनारे के पेड़ इसलिए काट दिए गए थे कि उनसे कंक्रीट के तीन, पांच, सात मंजिला इमारतों की शोभा बिगड़ती थी। घरों के भीतर के पेड़ इसलिए काटे गए थे कि उनसे इन इमारतों को ऊँचा बनाने में अवरोध होता था। लेकिन हथेली की पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती है, सो शहर में ऐसे लोग भी थे, जो न अपने घरों को इमारत बना रहे थे, न ही घर के सामने अथवा भीतर के पेड़ काट रहे थे।  मैं एक रोज शहर के इसी वृक्ष-वल्लरी मोहल्ले से गुजर रहा था। मार्च का महीना था। इस मोहल्ले में तरह-तरह के पेड़ थे। आम के वृक्षों पर बौर थी। अशोक के वृक्ष पतझड़ से त्रस्त थे। गुलमोहर खिले-खिले झूम रहे थे। बोगनविलिया मानों इस मोहल्ले का तोरण थी। एक घर के सामने सात-आठ वर्ष की एक बच्ची उछल-उछल कर अमरूद तोड़ने का प्रयास कर रही थी। उस घर के सामने अमरूद का पेड़ कच्चे-पके अमरूदों से लदा पड़ा था और सिर्फ एक ही बच्ची अमरूद खाने को उतावली थी! मोहल्ले के बाकी बच्चे कहाँ थे? हो सकता है मोहल्ले में बच्चे ही न हों? या फिर हो सकता है उन बच्चों के माता-पिता ने उन्हें…