सोमवार, 29 जुलाई 2019

खान-पान के अहम् फाल्गुन नियम

प्रतीकात्मक पेंटिंग : पुष्पेन्द्र फाल्गुन 
इन्टरनेट या टेलीविजन पर आभासी स्वरुप में हो या वास्तविक रुप में आहार अथवा खान-पान को लेकर तोता रटंत दोहराव ही दिखाई देते हैं. हम जो भी खाते या पीते हैं उसका हमारे शरीर पर वात-पित्त-कफ के स्वरुप में ही दोष उत्पन्न होता है और कुछ नहीं. शरीर के किसी भी अवयव में, रक्त में, मास-मज्जा या मेरु में जितने भी रोग होते हैं उन सभी के मूल में वात-पित्त-कफ ही है.
#वात_पित्त_कफ
हमारे मनीषियों ने ऋतुओं के साथ-साथ तिथि और वार के हिसाब से खान-पान के नियम सुझाए थे. तय है कि यह किसी एक विद्वान् द्वारा बनाए नियम नहीं थे और किसी एक खास अवधि में या फिर सीमित अवधि के लिए नहीं बनाए गए थे. मैंने इन सभी नियमों का कई-कई बार अध्ययन किया और मूल निकष पर पहुँचा. मूल निकष यही है कि हमारे खान-पान ऐसे हों कि जिससे शरीर में वात-पित्त-कफ के त्रिदोष उपद्रव न करने पाएं.
#कहाँ_से_क्या_क्या
सबसे पहले खान-पान में प्रयुक्त कुछ तत्वों को समझिए, जैसे, हम जो भी खाते हैं वह तो बेलवर्गीय है या पौधे पर उगने-लगने वाला या फिर जमीन के भीतर उपजने वाला कंद-मूल. हैं न!
दूसरा, हम ऐसी चीजें भी खाते हैं जो पशुधन से हम तक पहुँचता है, जैसे दूध, अंडा या मांस.
तीसरी बात पेय पदार्थ से जुडी है, पीने के लिए हम पानी, शरबत, शराब जैसी चीजों का इस्तेमाल करते हैं.
#नियमन
चन्द्रमा की दशा पर तिथियों का निर्धारण है. प्रतिपदा से अमावस्या या प्रतिपदा से पूर्णिमा. हैं न!
पूर्णिमा का मतलब उस रोज चन्द्रमा धरती के बहुत करीब होता है. अमावस्या मतलब चन्द्रमा धरती से ज्यादा दूर होता है. मनीषियों ने पाया कि इन दोनों ही अवस्था में मनुष्य का मन बेहद विचलित हुआ करता है, इसलिए इस समय पर स्निग्धता देने वाले चीजों के सेवन को वर्जित किया, जैसे अमावस्या-पूर्णिमा पर तेल, तिल या दही के इस्तेमाल से बचने की सलाह. मतलब कि पाचन में जो-जो भी चीजें भारी होती हैं, उसका सेवन नहीं करना चाहिए. मैं इस नियम को इस तरह समझ पाया, दरअसल, कृषि आधारित व्यवस्था में एकादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और अमावस्या या पूर्णिमा पर परिश्रम क्रमशः शिथिल होता जाता था. भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि पद्धति चन्द्र की स्थिति पर निर्धारित थी, इसीलिए एक मास / महीने के आठ रोज शिथिल घोषित किए गए थे, उन आठ दिनों में गरिष्ठ यानी पचाने में समय लेने वाले पदार्थों के सेवन को त्याज्य बताया गया. इधर के कुछ विद्वानों ने जब देखा कि तिथि के अनुसार खान-पान के निर्धारण को लेकर जब वे फंस रहे हैं तो उन्होंने उन आठ दिनों के साथ इतवार को भी जोड़ दिया. खैर, यह बात समझने वाले समझ ही जाएँगे.
बहरहाल! मैं जितना समझ पाया कि प्राचीन विद्वानों से लेकर वर्तमान आहार विशेषज्ञ सब जो कहना चाहते हैं वह यह है -
#जब भी खाली पेट ज्यादा समय तक रहें उसके बाद कभी भी बेलवर्गीय उपज जैसे कद्दू, लौकी, तुरई आदि न खाएं.
#बेलवर्गीय उपज जब भी खाएं तो उसके अगले रोज या उस रोज भी फल जरुर खाएं, ध्यान रखें कि फल मतलब फल. फल जब खाएं तो उसके अगले रोज बेलवर्गीय उपज नहीं बल्कि #फसलीय उपज जैसे बैंगन, भिन्डी आदि जरुर खाएं, फिर उसके अगले रोज बेलवर्गीय उपज. क्रम समझ लीजिए, बेलवर्गीय उपज, उसके अगले रोज केला आदि फल, फिर बैंगन, भिन्डी, परवल आदि सब्जी. इस क्रम को कभी नहीं बदलना चाहिए. किसी कारण से यदि यह क्रम चूक जाए या टूट जाए तो एक दिन का अन्तराल रखें और उस दिन ने बेलवर्गीय कुछ खाएं, न फल और न फसलीय कुछ. उस रोज प्याज-नमक से काम चलाएं.
एक बात और ख्याल रखें कि विद्वानों और आहार विशेषज्ञों की नजर में बेल और नारियल भी फल हैं.
#गरु_बनाम_पुष्टि
जब भी दही-घी आदि का सेवन करें उसके अगले रोज बेलवर्गीय कोई भी चीज न खाएं, बल्कि फल आदि खा सकते हैं. दही-घी के बाद कम से कम ३६ घंटे तक कद्दू, लौकी, मूली, गाजर, आलू, प्याज, लहसुन, अदरक के सेवन से बचना चाहिए. न तो दही के साथ यह सब खाना चाहिए और न ही खाने के कम से कम ३६ से ४८ घंटे बाद तक. फल के भरपूर सेवन के पश्चात भी एकदम से बेलवर्गीय चीजों पर नहीं जाना चाहिए, पहले फसलीय और फिर बेलवर्गीय, फिर फल, फिर फसलीय...
#ताड़वर्गीय
बेल, नारियल, ताड़ आदि फलों के सेवन लिए भी खास नियम हैं. जब भी इस वर्ग के फल खाएं कसैली चीजों का सेवन न करें, यानी बेल, नारियल आदि खाने के बाद कभी भी करेला, आंवला जैसे पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए. यही नहीं ताड़वर्गीय के साथ ताड़वर्गीय नहीं खाना चाहिए, मतलब नारियल के साथ बेल या बेल के साथ नारियल यानी आज नारियल खाए तो कल बेल नहीं खाना है या फिर आज बेल खाए तो कल नारियल नहीं.
#नींबूवर्गीय
संतरा, मोसंबी, नींबू सबकी एक ही प्रजाति है. नींबूवर्गीय के साथ कभी दही या तिल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. कई लोग दूध में नींबू डालकर उसे फाड़ते हैं और दही-पनीर आदि बनाते हैं. नींबू से फाड़े गए दूध से बनी दही-पनीर खाने से पित्त के साथ कफ भी इतना बढ़ जाता है शरीर में कि जिससे शरीर में पहले से रहने वाले कैंसर के जीवाणु बेहद संगठित तौर पर सक्रिय हो जाते हैं.
#अंतिमबात
चबाकर खाने वाली चीजों को खूब चबाकर मतलब प्रति कौर ३२ बार जरुर चबाना चाहिए. दिन में कम से कम चार बार जरुर कुछ न कुछ पाचक खाना या पीना ही चाहिए. दो बार के खाने के बीच छह घंटे से ज्यादा का अन्तराल नहीं होना चाहिए. कुछ और न खा पाए तो एक धेला गुड खाकर भरपेट पानी पी लेना चाहिए. यह जरुर ध्यान में रखिए कि कभी भी सिर्फ पानी नहीं पीना चाहिए, प्रत्येक बार पानी पीने के पहले मुँह में जरुर कुछ चबाकर खाना चाहिए.
पुष्पेन्द्र फाल्गुन फाल्गुन विश्व

रविवार, 28 जुलाई 2019

पत्तल में भोजन के कुछ रोचक तथ्य फाल्गुन के नजरिए से...

तस्वीर गूगल फोटोस से साभार 
पत्तल में भोजन से सेहत सुधरेगी और आपका आरोग्य बढ़ेगा, साथ ही लुप्त हो चुके इस व्यवसाय के जरिए अनेक लोग गृह उद्योग को आजीविका का साधन बना पाएंगे... इन्टरनेट पर इस सम्बन्ध में खूब प्रचार किया जा रहा है, यह अच्छी बात है लेकिन सही तरीके से इस बाबत न बताने के कारण लोग दरअसल इसके उपयोग को उतना तवज्जो नहीं दे रहे हैं, जितना इसे मिलना चाहिए... मैं एक विनम्र कोशिश कर रहा हूँ...
हमारे देश में कभी ढाई हजार से अधिक वनस्पतियों की पत्तियों से तैयार किए जाने वाले पत्तलों और उनसे होने वाले लाभ के विषय में परंपरागत ज्ञान उपलब्ध है. हमारी परम्परा की हर क्रिया-प्रक्रिया आरोग्य और स्वास्थ्य की दृष्टि से शामिल रही है, दुर्भाग्य से अंग्रेजी शिक्षा और संस्कृति ने हमें अपनी परम्पराओं से पूरी तरह न सिर्फ दूर कर दिया है बल्कि हम अपनी परंपरा से ही घृणा करने को प्रगतिशीलता समझने लगे हैं. बहरहाल, इस समय हमारे देश में केले की पत्तियों के आलावा सुपारी की पत्तियों से बने पत्तल पुनः अपनी जगह समाज में वापस बना रहे हैं.
दक्षिण भारत में केले की पत्तियों पर भोजन परोसने का नियम रहा है, आज भी इस रीति का पालन वहां होता है, पत्तल या पत्तियों में खाने का क्या फायदा है यह किसी भी मँहगे होटल में जाकर देखिए, वहां खाना केले के पत्तों या फिर सुपारी के पत्तलों में परोसने का चलन बढ़ रहा है. जर्मनी जैसे अतिविकसित देश तो अब पत्तल में खाना खाने को राष्ट्रीय दायित्व की तरह प्रचारित कर रहे हैं.
कुछ बातें पत्तल या पत्तियों पर भोजन के विषय में आपको जरुर जानना चाहिए...
#पलाश के पत्तल में भोजन करने से हमारा पाचनतंत्र मजबूत होता है और यदि पाचन तंत्र की कोई भी बीमारी हो तो वह महज चालीस दिनों तक पलाश के पत्तल पर रोजाना खाना खाने से ठीक हो जाएगी. यह दावा नहीं है, आप इसका प्रयोग कर देखिए और फिर खुद दावे करने लगेंगे.
#पलाश के पत्तल की और विशेषता है, वह यह कि यह रक्त भी शुद्ध करता है लेकिन इसके लिए सफ़ेद फूल वाले पलाश के पेड़ का पत्तों से बनी पत्तल का इस्तेमाल करना चाहिए या फिर रेतीले क्षेत्र में होने वाली पलाश के पत्तों की पत्तल इस्तेमाल करनी चाहिए. लाल पलाश के फूल वाले पेड़ की पत्तल मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड में बहुतायत से इस्तेमाल होती रही है. सफ़ेद फूल वाले पलाश के पेड़ के पत्तों से बनी पत्तल पर यदि बवासीर (पाइल्स) का रोगी नब्बे से एक सौ बीस दिनों तक नियमित दोनों जून भोजन करे तो उसका बवासीर हमेशा- हमेशा के लिए ठीक हो जाता है, यहाँ तक कि मस्से भी गलकर गिर जाते हैं.
#सुपारी के पत्तों से बने पत्तल में भोजन करने से चाहे किसी भी तरह का रक्तदोष हो, पैंतालिस से पचपन दिन में ठीक हो जाता है, जिन महिलाओं को श्वेतप्रदर (सफ़ेद पानी) की शिकायत होती है, उन्हें सुपारी के पत्ते से बने पत्तल पर खाने से बहुत फायदा होता है, महिलाओं की अनियमित मासिक पारी और जब यह पारी बंद होने वाली रहती है तब यदि नियमित सुपारी के पत्ते से बनी पत्तल पर भोजन किया जाए तो बहुत फायदा होता है. एनीमिया में भी इस पत्तल पर खाने से क्या फायदा होता है, इस रोग से पीड़ित खाएं और पूरी दुनिया को बताएं. इतना ही नहीं, अवसाद और मानसिक तनाव से निजात के लिए सुपारी के पत्ते से बने पत्तल पर ही भोजन करना-कराना चाहिए.
#करंज के पत्तों से बनी पत्तल भी बवासीर के लिए रामबाण मानी जाती है. करंज के पत्तों से बनी पत्तल को जोड़ के दर्द से छुटकारा दिलाने वाला माना जाता रहा है. मनुष्य के शरीर से अतिरिक्त अम्ल सोखने में इस पत्ते के पत्तल का कोई तोड़ नहीं है.
#केले के पत्ते पर भोजन करने से शरीर में कभी सूखा रोग नहीं होता और हड्डियों तथा मांसपेशियों से जुड़ी हर दिक्कत ठीक होती है, लेकिन यदि किसी को इस समय फेफड़े से जुड़ा कोई रोग है तो उसे पहले पलाश के पत्तल पर भोजन करना चाहिए और करीब तीन महीने तक पलाश के पत्तल के नियमित प्रयोग के बाद ही केले के पत्ते पर भोजन करना चाहिए, कभी-कभार केले का पत्ता इस्तेमाल करने में कोई हानि नहीं है.
#गिलोय के पत्ते से बने दोने में पानी या चाय पीने से लीवर की सूजन समाप्त हो जाती है और पाचन क्षमता बढ़ने लगती है.
#बंगला पान के पत्तों से बने दोने में शहद और अदरक के रस के साथ पानी पीने से गंभीर से गंभीर हृदय रोग एक सौ बीस दिन में जड़ से समाप्त हो जाते हैं.
ऐसे न जाने कितने ही उपहार प्रकृति ने हमें दिए हैं. आप में से कोई चाहे तो किसी तरह के शिविर आदि का आयोजन कर मुझे आमंत्रित करे, मैं इस विषय पर पूर्ण अधिकार के साथ घण्टों मार्गदर्शन कर सकता हूँ. विशेष परिस्थितियों में निजी परामर्श के लिए भी उपलब्ध होता हूँ.
पुष्पेन्द्र फाल्गुन फाल्गुन विश्व

वर्षा ऋतु के लिए फाल्गुन टिप्स...

फोटोग्राफ : अरुणेन्द्र मिश्र 
कुछ मित्रों ने कहा कि वर्षा ऋतु में किस तरह से प्राकृतिक जीवन शैली अपनायी जाए ताकि सपरिवार सेहतमंद रहते हुए इस मौसम में होने वाले रोगों से बचा जा सके. वैसे भी पिछली दो रात से बादल लगातार झड़ी लगाए हुए हैं.
जितनी मेरी समझ है उसके अनुसार निम्न तरीके से आहार-विहार और जीवन रहे तो सेहत और प्रसन्नता दोनों अक्षुण्ण रहेंगे...
#दक्षिणायन
इस समय सूर्य दक्षिणायन हैं, मध्य जुलाई से 21 दिसम्बर तक सूर्य दक्षिणायन रहते हैं, अतः चन्द्र ज्यादा बलवान हो जाते हैं. हमारे समस्त प्राचीन ग्रंथों में श्रावण से कार्तिक तक दूध और दूध से बने पदार्थों से परहेज इतने सकारात्मक तरीके से कराया गया है कि आमजन परहेज भी कर लें और उन्हें समझ भी नहीं आए कि दूध अथवा दूध से बने पदार्थों से उन्हें बचाने की कोई शास्त्रीय कवायद हो रही है. याद कीजिए कि कितने तीज-त्यौहार जुलाई से दिसम्बर के बीच भारतीय उप महाद्वीप में हैं और दूध का इन त्योहारों में किस तरह और कितना-कितना इस्तेमाल है. कहने का मतलब कि आज से दिसम्बर तक दूध से जितना हो सके परहेज करिए. दूध, दही, छाछ जैसे पदार्थ से बचने की सलाह होती है लेकिन पुराना घी इस समय बहुत लाभकारी होता है, लेकिन घी कम से कम १२ साल पुराना हो तो श्रेयस्कर है, हालाँकि आज के समय में इतना पुराना घी मिलना, अंधे को आँख मिलने जैसा है, लेकिन यदि पुराना घी न भी मिले तो भी हमेशा घी गर्म ही इस्तेमाल करना चाहिए. जिन्हें फेफड़े या श्वसन रोग हैं उन्हें दूध और दूध से बने प्रत्येक पदार्थ के साथ घी से पूरी तरह परहेज करना चाहिए.
#मच्छर
पूरे साल में सूर्य के दक्षिणायन काल में सबसे ज्यादा कीट-पतंगे उत्पन्न होते हैं. मच्छर भी एक कीट है. औषधि विक्रेताओं और आधुनिक चिकित्सकों को तो जैसे इन मच्छरों ने रामबाण प्रदान कर दिया हो, बहरहाल, विषय परिवर्तन से बचते हुए यहाँ मैं यही कहना चाहता हूँ कि मच्छरों से बचने के लिए रासायनिक तरीकों जैसे कॉइल या लिक्विड रेपेल्लेंट के इस्तेमाल से यदि बचा जा सके तो बेहतर होगा. मच्छर भगाने के लिए नीम्बू और लौंग का इस्तेमाल कीजिए. नीम्बू काटकर उस पर दो लौंग रख दीजिए जहाँ से मच्छरों के आने की आशंका आपको लगती है और फिर देखिए कि क्या होता है!
#कसैला_और_नमकीन
आहार में पुराने चावल से बना भात या पुराने गेंहू से बनी रोटी ही खानी चाहिए. नाशपाती, करेला, गुड़ और अदरक प्रतिदिन के भोजन में किसी न किसी तरह से होना ही चाहिए. देखा गया है कि बारिश होते ही पकौड़े तलने और खाने का चलन बन-बढ़ गया है, लेकिन बेसन इस मौसम में बेहद नुकसानदायक है, तले पदार्थ भी जितना हो सके टाले जाने चाहिए. लेकिन फिर भी यदि मन नहीं मानता है तो तलने के पहले तेल में मेथी के दाने डालकर कुछ देर पकाना चाहिए, फिर चाहें तो मेथी के दाने रहने दें और उसी में पकौड़े तल लें लेकिन यदि ऐसा लगे कि मेथी के दाने निकाल देना चाहिए तो जरुर छन्नी से मेथी दाने किसी कटोरी में निकाल लें और फिर उन दानों को बाद में सब्जी बनाने में इस्तेमाल कर लें, मेथी के दाने जब कुछ देर तेल में पक जाते हैं तो तेल का लिनोलिक एसिड बहुत हद तक पतला हो जाता है जिससे शरीर को नुकसान कम से कम होता है. यदि नारियल या फिर जैतून के तेल में सूर्य के दक्षिणायन रहते कुछ भी तला या पकाया जाए तो फिर सेहतयाबी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. बेसन से बने पदार्थ ही खाने हो तो बीकानेरी पद्धति से बने नमकीन पदार्थ ही इस दौरान खाने चाहिए. एक बात और यह कि वर्षा और शीत ऋतु में नमकीन पदार्थ हमेशा शाम में ही खाना चाहिए. कसैले पदार्थ सुबह या फिर रात में ही खाने चाहिए, शाम में नहीं. एक बात और, यदि संभव हो तो इस दौरान सेंधा नमक का ही इस्तेमाल करें.
#देहदुःख
मध्य जुलाई से २१ दिसम्बर तक जितना हो सके स्त्री-पुरुष को अपने कामतत्व पर नियंत्रण रखना चाहिए. हमारे मनीषी विद्वानों ने इसीलिए वर्ष के सारे तीज-त्यौहार इसी दौरान रचे ताकि दाम्पत्य स्वरुप में पति-पत्नी जा ही न पाएं. खासकर कार्तिक पूर्णिमा के बाद ही इस स्थिति में जाने की सुविधा या सहूलियत या अवसर बन सके. दुर्भाग्य से कामतत्व को इन्हीं महीनों में बढ़ाने के लिए आज का बाजार मुस्तैद है. 'तेरी दो टकिये की नौकरी और लाखों का सावन जाए' जैसे गानों को खूब प्रचारित किया जाता है. हमारे लोक जीवन ने सेहत के महत्त्व को इतना बखूबी समझा था कि जीवन से जुड़े हर तत्व को उसी लिहाज से रेखांकित किया था. श्रावण से कार्तिक तक यदि स्त्री-पुरुष कामतत्व या दाम्पत्य सुख से परहेज करें तो न उन्हें रोग होगा न उन पर बुढ़ापा जल्दी तारी होगा. यदि आज तक आपने यह प्रयोग नहीं किया तो अभी करें. जिन महिलाओं को वात विकार अथवा जिन्हें भी घुटनों में दर्द की शिकायत है और यदि वे काम सुख के लिए लालायित रहते हैं तो श्रावण से कार्तिक महीने इस लालच से बचें और बताएं कि मध्य नवम्बर से अगले जुलाई तक उनके घुटनों, कमर का दर्द गायब रहा या नहीं तथा वात विकार से उन्हें निजात मिली या नहीं.
पुष्पेन्द्र फाल्गुन फाल्गुन विश्व

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

स्वास्थ्य के सम्बन्ध में जानकारी देने वाले पुरातन गणितीय शास्त्र का नाम ही है ज्योतिष्य

अक्सर आमजन ज्योतिषी के पास अपने आमजीवन की समस्याओं के निदान और निराकरण के लिए जाते हैं. विवाह, क्लेश, आर्थिक आभाव, व्यापार में घाटा, बेरोजगारी आदि के लिए ज्योतिषी से समाधान व उपाय पूछते हैं, मजेदार बात है कि ज्योतिषी उन्हें संतुष्ट भी करते हैं. जबकि ज्योतिष्य शास्त्र की किसी भी विधा में या किसी भी अंग-उपांग में इस तरह की कोई विधान है ही नहीं.
स्वास्थ्य को मानव-जीवन की संपदा कहा गया है. ज्योतिष्य समेत तमाम पुरातन परम्पराएं स्वास्थ्य की सजगता और स्वास्थ्य की महत्ता प्रतिपादित करने के लिए ही रची गयीं. लेकिन मनुष्य की महत्वकांक्षा एवं लालची वृत्ति ने इस स्वास्थ्य सूत्रिका को एक बड़े कारोबार में तब्दील कर दिया. एक अनुमान के अनुसार आज ज्योतिष्य दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता कारोबार है. अकेले भारत में ही करीब पाँच हजार करोड़ का सालाना कारोबार ज्योतिषी कर रहे हैं. लेकिन ज्योतिषियों के इस कारोबार से न तो भारत सरकार को कोई कर आदि प्राप्त हो रहा है और न ही मानवमात्र का कोई कल्याण. क्योंकि कारोबार बनाने के चक्कर में ज्योतिषी इस गणितीय सूत्र में बिद्ध सूत्रों को कबका कहीं दफना चुके हैं. आज ज्योतिषी मतलब धन-दौलत-ऐश्वर्य-वैभव या मनमाफिक जिन्दगी का कोई सफल शॉर्टकट नुस्खा देने वाला ज्ञानी, जबकि असल में ज्योतिषी औरों की मूर्ख बनाकर धन-दौलत-ऐश्वर्य-वैभव या स्वयं के लिए मनमाफिक जिंदगी बनाने वाला धूर्त और चालाक शख्स मात्र है.
ज्योतिष्य शास्त्र एक व्यक्ति के देह, बुद्धि, मन, मेधा, स्मृति और तदानुसार उसके जीवन के विविध कालखंड में इनमें उपस्थित होने वाली भिन्न-भिन्न अवस्थाओं की जानकारी अलग-अलग तरीके से दिया करता है. जीवन में अलग-अलग समय पर देह, मन, बुद्धि, स्मृति आदि पर होने वाले प्रभाव, घात, आघात तथा इनका सामना करने और इनसे उबरने की पद्धति की व्याख्या करता है. प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्याख्या सर्वथा अनूठी होती है. एक व्यक्ति के लिए प्रतिपादित पद्धति किसी और के किसी काम की नहीं होती है.
एक बच्चे की कुंडली से उसके किशोरावस्था, यौवन, प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था के प्रत्येक चरण में शरीर, मन, मस्तिष्क के स्वास्थ्य की अवस्था का ज्ञान होता है तथा यह भी मालूम होता है कि उस अवस्था विशेष की दुरुहता से कैसे पार पाकर आगे बढ़ा जाए. यह कहना आतिशयोक्ति नहीं होगी कि ज्योतिष्य शास्त्र जीवन को निर्बाध बनाने का गणितीय सूत्र है जिसकी व्याख्या विरले ही कर सकते हैं. सच्चा और नीयतमंद ज्योतिषी जिसे मिल जाए या कहें कि जो भी व्यक्ति ऐसे ज्योतिषी तक पहुँच जाता है, उसका जीवन धन्य ही समझें.
संपर्क -
पुष्पेन्द्र फाल्गुन
9922774236

  

रविवार, 24 सितंबर 2017

नाव, नाविक और समुद्र

समग्र चैतन्य - पुष्पेन्द्र फाल्गुन




मित्र ने कहा, ‘समंदर कितना भी ताकतवर हो, बिना छेद की नाव को नहीं डुबो सकता है.’
तो मैंने एक कहानी की कल्पना की. कहानी में नाव, नाविक और समंदर (समुद्र) मुख्य किरदार थे.
एक बार सात नाविकों का दल विशेष अभियान पर समुद्र में भेजा गया. भेजने वाले किनारे पर रुक उन नाविकों की वापसी का इंतजार कर रहे थे. उन्हें, भेजे गए नाविकों में से एक नाविक अगले दिन समुद्र की लहरों से टक्कर लेकर किनारे की तरफ आने के लिए हाथ-पैर मारता हुआ दिखाई दिया, बचाव दल भेजकर उस नाविक को बचाया गया. किनारे लाए जाने पर उसने बताया कि अभियान पर निकलने के बाद जब शाम हो रही थी, तब नाव समुद्री तूफ़ान की चपेट में आ गयी, तो वह नाविक नाव से कूद गया और किसी तरह अपनी जान बचाने में सफल रहा. उस नाविक की बात सुनकर, अभियान के नियोजनकर्ताओं को दुःख हुआ, उन्हें लगा कि अभियान पर भेजे गए अन्य छह नाविक शायद तूफ़ान की भेंट चढ़ गए. वे सभी उदास बैठे थे कि उन्हें सुमद्र की लहरों पर दूर एक व्यक्ति डूबता दिखाई दिया. तुरंत बचाव दल भेजा गया, मालूम हुआ कि अभियान पर गए नाविकों में से ही वह एक था. उसे भी बचाकर लाया गया. उसने बताया कि समुद्री तूफ़ान देखकर एक साथी नाव से कूद गया, लेकिन हम छह नाविकों ने मिलकर अपनी सूझ-बूझ से उस तूफ़ान का मुकाबला किया और आगे बढ़ गए. कुछ और आगे जाने पर समुद्री डाकुओं ने हमें घेर लिया और हम पर गोलियां बरसाने लगे, तो मैंने नाव से कूदकर अपनी जान बचायी. उसके अनुसार शेष पांच नाविक समुद्री डाकुओं की गोलियों का शिकार हो गए होंगे.
अभियान पर भेजने वाले फिर उदास हो गए. अगले दिन अभियानकर्ताओं ने वहां से तंबू उखाड़कर अपने-अपने घरों को ओर लौटने का निश्चय किया. तंबू उखाड़े जा रहे थे कि इतने में एक और नाविक समुद्र की लहरों के झकोलों के साथ किनारे पर फेंका गया. किसी तरह उसे भी बचाया गया. उसने बताया कि समुद्री डाकुओं की गोलियों से नाव में एक छेद हो गया था. नाव के डूबने का खतरा बन गया था, इसलिए मैंने कूदकर अपनी जान बचायी. अभियानकर्ताओं को शेष चार साथी नाविकों के लौट आने की उम्मीद बिलकुल नहीं थी. लिहाजा, अभियानकर्ताओं ने समुद्र को छोड़, शहर का रुख कर लिया.
समय बीता. लगभग दो साल बाद, अभियानकर्ताओं को मालूम हुआ कि उनके द्वारा अभियान पर भेजे गए शेष चार नाविक समुद्र किनारे देखे गए. अभियानकर्ता सदलबल समुद्र किनारे पहुँचे. उन्होंने देखा कि शेष रह गए चारो नाविक जीवित हैं और सकुशल अभियान समाप्त कर लौट आए हैं. चारों तरफ ख़ुशी की लहर दौड़ गयी. इस ख़ुशी की लहर ने अभियानकर्ताओं को प्रसन्न कर दिया. यही तो अभियान था. किसी तरह दो साल तक नाव को बचाए रखा जाए. अभियानकर्ताओं ने उन शेष चार नाविकों से पूछा, ‘डर नहीं लगा डूबने का, नाव में छेद हो गया था?’
उन चार में से एक ने कहा, ‘डर कैसा!’ दूसरे ने कहा, ‘हम, लोगों का डर दूर करने निकले थे, तो क्या खुद ही डरकर भाग खड़े होते!’ तीसरे ने कहा, ‘जमाने के डर को दूर करने से पहले हमें अपना डर दूर करना था.’ चौथे ने कहा, ‘और इस डर को जीतने का एकमात्र तरीका था, अभियान को जारी रखना...’
एक शहरी ने पूछा,’नाव के छेद से समुद्र का पानी तो आया होगा न?’
‘हाँ, आया था,’ उन चारो नाविकों ने कहा, ‘मगर हमने बारी-बारी से छेद को बंद करने की कोशिश की और इस प्रयत्न के बावजूद जो पानी छेद से रिसकर नाव में आता रहा, बाकी तीन नाविक उसे नाव से बाहर उलीचते रहे...’
देश नाव है, नागरिक नाविक और समुद्र इस देश की राजनीति...

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रविवार, 10 सितंबर 2017

मुकदमा




समय की अदालत में इस समय एक महत्वपूर्ण मुकदमा चल रहा है. यह विचारधारा का मुकदमा है और समूचे विश्व की इस मुक़दमे के फैसले पर नजर है. लेकिन लगता है फैसला आने में अभी बहुत देर है, बहुत-बहुत देर.
दोनों पक्षों के पास तर्क-वितर्क, सबूतों और गवाहों, सवालों और जवाबों के आगार हैं, जिसमें से वे हर तारीख पर एक से एक अस्त्र-शस्त्र निकालकर अपने प्रतिद्वंद्वियों पर चलाते हैं कि मुकदमे का न्यायाधीश समय भी आवाक रह जाता है.
यह मुकदमा वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच है.
हर तारीख पर दोनों की ताकत बढ़ती जाती है. दोनों के पक्षधर मुकदमे में बड़ी संख्या में शरीक होते हैं और समय के समक्ष की जा रही अपनी-अपनी पुरजोर पैरवी का अनुमोदन जोर-जोर से तालियाँ बजाकर करते हैं. दोनों ही पक्ष की तालियों की अलग –अलग आवाज होती है. वामपंथियों की तालियों में अति कठोरता है तो दक्षिणपंथियों की तालियों में अति उग्रता.
दोनों पक्षों के पास अदालत में पेश करने के लिए कई ऐतिहासिक हवाले हैं, सामयिक दलीलें हैं, अख़बारों की कतरन और दस्तावेज हैं. दोनों ही पक्ष अत्यंत कुशलता और चालाकी से एक-दूसरे के समस्त दावों-प्रतिदावों को ख़ारिज करते रहते हैं. अनुमोदन और तालियों के लिए दोनों के पास अपनी-अपनी भीड़ है ही.
इधर, कुछ समय से दोनों ने अपने-अपने पक्षधरों को चिन्हित करना शुरु किया है. दोनों पक्ष यूँ तो एक-दूसरे के घनघोर विरोधी हैं लेकिन, इस बात पर दोनों एकमत से सहमत हैं कि अपने-अपने पक्षधरों को चिन्हित करना जरुरी है ताकि दोस्त और दुश्मन की पहचान साफ़ हो सके. असल में यह पहचान इसलिए कि दोनों पक्षों का अनुमान है कि जिसकी संख्याबल ज्यादा होगी, समय उसके पक्ष में फैसला देगा, उसे ही असली विचारधारा घोषित करेगा. इस अनुमान की कोई ठोस वजह दोनों के पास नहीं थी लेकिन, जब दक्षिणपंथ ने ऐसा करना शुरु किया तो, वामपंथ ने भी ऐसा ही करना लाजमी समझा.
इस पहचान के लिए दोनों एक से एक अनूठे तरीके अपनाते हैं, जैसे नारे और उद्घोष, लेखन और साहित्य, कला और संस्कृति, पर फिर भी पूरी तरह से पहचान मुमकिन नहीं होने पाती. इस बीच, किसी ने रंग का सहारा लेने की सलाह दी है.  

तय हुआ कि मुकदमे की अगली पेशी से वामपंथी लाल रंग और दक्षिणपंथी केसरिया रंग में रंगे नजर आएंगे. अगली तारीख पर अदालत हमेशा की तरह खचाखच भरी थी, लेकिन, लोगों के चेहरे बहुरंगी नजर आ रहे थे. लाल और केसरिया के साथ हरे, पीले, नीले और सफेद रंग में रंगे लोग भी नजर आ रहे थे. यह बहुरंगी जामा दोनों पक्षों में बहुतायत में नजर आ रहा था, इससे दोनों पक्षों को अपने ‘असल’ समर्थक पहचानने में खासी दिक्कत हो रही थी.
एक बार फिर दोनों पक्ष एकमत हुए और तय किया गया कि दोनों पक्ष बिना जोर-जबरदस्ती के अपने-अपने मूल रंग के इतर के रंगों को अपने में मिलाने की जुगत करेंगे. दोनों ने इसके लिए अपने-अपने तरीके से प्रयास करने शुरु किए. प्रयास जारी है, इस बीच अदालत में कुछ ऐसे लोग भी देखे गए जो किसी भी रंग में रंगे हुए नहीं थे. दोनों पक्षों ने इसे अपने-अपने विचारधारा की तौहीन घोषित किया और इन रंग से परे लोगों को रंग में रंग जाने की चेतावनी जारी कर दी. साथ ही यह धमकी भी दी कि यदि ये रंग से परे लोगों ने उनके-उनके विशेष रंग को स्वीकार नहीं किया तो जीतने के बाद उनकी दुर्गति अनिवार्यतः की जाएगी.
जब इन रंग से परे लोगों ने किसी भी रंग को स्वीकारने से इंकार किया तो अदालत में पैरवी कर, दोनों पक्षों ने इन्हें मुकदमे से दूर रखने की मांग की. न्यायाधीश ने दोनों पक्षों के दबाव में इन रंग से परे लोगों को अदालत से बाहर जाने और मुकदमे से बेदखल रहने का हुक्म दिया. जब इन रंग से परे लोगों को अदालत से बाहर किया जाने लगा तो उनमें से एक जो सबसे बुजुर्ग था, उसे देखकर न्यायाधीश ने सवाल किया, ‘आप लोग कौन हैं? यहाँ क्या कर रहे हैं?’
उस बुजुर्ग ने कहा, ‘हम इंसानियत हैं और यहाँ प्रेम की संभावना तलाश कर रहे थे...’

उस दिन के बाद से समय की उस अदालत में इंसानियत और प्रेम के संभावनाओं की तलाश के बिना ही वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच मुकदमा जारी है, देखिए फैसला कब आता है!

मंगलवार, 2 मई 2017

इधर फेसबुक पर चर्चित हुयी कुछ रचनाएं ...

कविता : एक बयान

तुम्हारी रसोई में वह जो बचा हुआ खाना है न! वही जिसे तुम मोहल्ले वालों की नजर बचाकर कूड़ेदान में फेंक आए हो, बस उतने ही खाने के लिए उस रोते हुए मासूम की माँ किसी शराबी के साथ फुटपाथ पर सो जाने को मजबूर है। बस उतने से ही खाने ने न जाने कितने ही चेहरों के निर्दोषपन को हर लिया है। बस उतने से खाने ने न जाने कितने दिलों को अलग-अलग धूरियों पर पहुंचा दिया है!
वो जो एक छोटी सी गड्डी तुमने अभी- अभी अपनी आलमारी की तिजोरी में हलके हाथों से फेंकी है न! बस उतने से ही पैसे के लिए न जाने कितने ही किसानों ने आत्महत्याएं की है! रोज न जाने कितने ही आँखों के सपने टूटे हैं बस उतने ही पैसों के लिए। बस उतने से ही पैसों के फर्क ने न जाने कितने ही वर्ग-संघर्ष पैदा किए और करते जा रहे हैं!
०००००
तुम्हें स्वाद के लिए खाना है, उन्हें भूख के लिए
तुम्हें घूमना-फिरना है, मनोरंजन करना है, फैशन में बने रहना है; उन्हें अपनी जरूरतें पूरी करनी है
तुम्हें जिंदगी के सारे सुख भोगने हैं, उन्हें किसी तरह ज़िंदा रहना है
तुम कहते हो कि सब कुछ तुमने अपनी योग्यताओं से अर्जित किया है और अर्जन ही तुम्हारी सफलता है, उन्हें लगता है कि उन्हें बराबर मौके नहीं मिले, योग्य बनने का अवसर नहीं दिया गया, अर्जन की जगह अर्चन ही जिंदगी का सूत्र बना दिया गया...
०००००
तुम डकारते हो और सहानुभूति, करुणा, दया, क्षमा, सेहतमंदी, अक्लमन्दी, इंक़लाब, क्रांति, समानता, बराबरी जैसे शब्दों के अंबार लगा देते हो
उनके पास खिन्नता, दुःख, पीड़ा, संकट, तकलीफों, उदासियों और अनमनेपन के कई छोटे-बड़े पहाड़ हैं, जिन पर उतरते चढ़ते वे तुम्हारे प्रवचनों पर तालियां और सीटियां बजाते रहते हैं
०००००
तुम्हें लगता है तुम बस उनके ही बारे में सोचते हो
उन्हें लगता है कि तुम उनके सहारे अपने आप को स्थापित करने की जुगत में लगे रहते हो, कभी कला में, कभी शिल्प में, कभी साहित्य में, कभी बहस और मुबाहिसों में तो कभी-कभी कॉफ़ी हॉउसों में
०००००
तुम्हारे पास इतनी अक्ल पैदा हो ही जाती है कि तुम देह-अदेह के विभक्तिकरण और व्याकरण को समझ जाने का दम्भ भरने लगते हो, दैहिक सौंदर्य के साथ मानसिक सौंदर्य और उसके सेहत के शास्त्र तुम तैयार कर लेने का मुगालता आसानी से पाल सकते हो
उनके लिए देह ज़िंदा रहने का बायस है, मानस अपनी जरुरत को पहचानने और पकड़ने की चीज तथा सेहत और सौंदर्य ज़िन्दगी में एकाध बार किये जाने वाला तीर्थ
०००००
तुम किसी को मरते हुए देखते हो और सोचते हो कि मृत्यु देखी
तुम शरीर की हरकतों को विवेक की संज्ञा देते हो
तुम्हारे लिए अँधेरा और रौशनी एक-दूसरे के विपर्यास हैं
तुम खुद भी एक दिन मर जाते हो
०००००
उन्हें तो ज़िंदा ही मर-मर कर रहना होता है
मुझे तो ज़िंदा ही मर-मर कर रहना होता है
___________________________
पुष्पेन्द्र फाल्गुन, अक्षय तृतीया, 2017
#एक_बयान

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कविता 2 : मैं कलम मज़दूर

मैं कलम मज़दूर यही मेरा परिचय
एक बेहतर और सच्ची दुनिया बनाने का
स्वप्न भर नहीं देखता मैं
ईमानदारी से उस स्वप्न को पूरा करने की जद्दोज़हद में
सींचता हूँ अपना आज अपने लहू से
दुनिया के हर मज़दूर की तरह
उदासीनता मेरे चेहरे का स्थायी ठिकाना है
हालाँकि उदासी भी है मेरे चेहरे पर कुछ-कुछ अमिट होती हुई
तुम्हारे तिरस्कार और उपेक्षा से नहीं
बेहद कम मिलती मजूरी से भी नहीं
उदासी इसलिए है कि
तुम्हें अभी तक एहसास नहीं करा पाया मैं
कि आने वाले कल का
सूरज, धरती, पानी, हवा, चिरैया
हम सब की साझा है
हम सब की आशा है
मैं जानता हूँ कि
तुम मेरी सहजता को मेरी कमजोरी समझते हो
मुझ पर मेरे हालात पर हँसते हो, लतीफे गढ़ते हो
मेरे बच्चों की उम्मीदों पर टेढ़ी नज़र रखते हो
अपनी गोल-मोल बातों से तुम बारम्बार मुझे छलते हो
मौका मिलते ही मुझे याचक सिद्ध करना तुम्हारा धर्म है जानता हूँ
फिर भी तुम्हें बख्शता हूँ कि कहीं इंसानियत तुमसे नाराज न हो जाए
तुम्हारे लिए उतना ही सुन्दर
उतना ही बेहतर रचता - परसता हूँ
जितना कि उसे होना ही चाहिए
मैं कलम मज़दूर हूँ
इसलिए नीयतमंद हूँ
उतना ही नीयतमंद
कि जितना नीयतमंद हो सकता है
एक मजदूर, एक किसान, एक कवि, एक स्वप्नद्रष्टा
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पुष्पेन्द्र फाल्गुन, मई दिवस, 2017
#मैं_कलम_मजदूर
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हिन्दी के प्रसिद्ध कवि- चित्रकार भाई रोहित रूसिया पर लिखी यह कविता

कविता 3 : इस शख्स को गौरैया भी पहचानती है

१).
उनकी छरहरी काया में श्रित वय दृष्टि
जब किसी बेहतरीन कविता पर जाकर ठहर जाती है
तब उनके साथ चलती गौरैया भी चहक कर वही रुक जाती है

वह कविता को अपने सधे हाथों से पेंटिंग की शक्ल देते हैं
गौरैया उस पेंटिंग में ठीक उसी जगह जाकर बैठ जाती है
जहाँ कविता में बिंब अपने सघन रुप में मौजूद होता है

आप गौरैया के जरिए
रोहित रूसिया के चित्रों में
आसानी से पहचान सकते हैं
देश के किसी भी बड़े कवि की कविताओं के बिंब

गौरैया
रोहित रूसिया को भी अच्छी तरह पहचानती है

२).
काष्ठ छापों में कुरेदकर सहेजी गई जाने कितनी पारंपरिक कलाएं
दशकों से जेसे रोहित रूसिया की आस में सहती रही धूप,पानी, सर्दी और अवहेलना
पकड़कर उनकी उंगलियां गौरैया ले गई थी
छपने को आतुर उन काष्ठाकुंद कलाओं के पास

रूप देना रोहित को आता ही है
कॉटन फैब के नाम से जो भी हैं अपरिचित
उनकी आँखें
देखना एक दिन,
दर्जनों कारीगरों के घरों के चूल्हे से उठते धुएं में
ढूँढ़ेंगी अपने पैरहन के विन्यास

३).
दूर सतपुड़ा की पहाड़ियों से रोज सुबह के सूरज के साथ
उतरती है न जानें कितनी ही जरूरतें
जिन्हें जल्दी होती है रोहित या उनके भाई तक पहुँचने की
दोनों रुसिया भाई
सामाजिकता के भरोसे को बरसों से निभाते हुए
पूरी करती जाते हैं सारी जरूरतें उस सूरज की
जिसे शाम ढलने से पहले वापस सतपुड़ा की पहाड़ियों पर लौट जाना है

4).
पिता से विरासत में मिली हैं उन्हें कूची और किताबें
माँ से संवेदना के संरक्षण की सीख उनकी थाती है
संगत ने उनकी समझ को कई-कई आयाम दिए हैं
आशा उनकी दिनचर्या को नए वितान देती है
कविता से प्यार
गौरैया भूलने नहीं देती
और उनके नवगीत के ताजा शोले
दुनिया के हर अन्याय के खिलाफ मशाल बन जाते हैं

5).
हो सकता है कि आप न पहचानते हों रोहित रूसिया को
गौरैया इस शख्स को भली-भांति पहचानती है

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पुष्पेन्द्र फाल्गुन
02052016

मंगलवार, 26 मई 2015

दूध वाला भैया


वह भैया है या अंकल उसे नहीं पता, बस वह इतना जानता है कि उसका जन्म दूध बेचने के लिए ही हुआ है। बाप-दादा यही करते रहे, सो उसे भी यही करना है। बाप-दादा भी यह जानते थे कि उसे यही करना है, इसीलिए जब वह सातवीं क्लास में अपने मास्साहब की कलाई काट कर घर भाग आया था, तो वे दोनों जोर से हँस पड़े थे।
वह रोज गाँव से शहर आता है दूध बेचने। पहले साइकिल से आता था, लेकिन इधर एक साल पहले जब उसने दाढ़ी वाले नेताजी के मुंह से विकास का नाम और मतलब सुना था, तब से वह रात दिन अपने विकास की फ़िक्र में घुलने लगा था, लिहाजा उसके बाप ने उसकी शादी कर दहेज़ में एक मोटरसाइकिल मांग ली। तो वह अब दूध बेचने मोटरसाइकिल पर गाँव से शहर आता है।
अभी चार-पांच दिन पहले की बात है। अखबार में छपा था कि भीषण गर्मी पड़ रही है। तापमान ४७ डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था। उस दिन, वह अपनी मोटरसाइकिल से दूध देने शहर की और भागा जा रहा था। अचानक शहर से दस किलोमीटर पहले उसकी मोटरसाइकिल भुक-भुक कर बंद पड़ गई। अभी वह नीचे उत्तर कर यह समझने की कोशिश ही कर रहा था कि कल रात दस बजे तक अच्छी चलने वाली मोटरसाइकिल, आज अचानक क्यों बंद पड़ गई कि सड़क से गुजरते लोगों ने उसको समझने की मुश्किल का सामना करने से बचा लिया।
एक मोटरसाइकिल-गीर  ने कहा, 'प्लग में कचरा गया होगा।' दूसरे ने कहा, 'गाड़ी ने एयर लिया होगा। गर्मी में अक्सर ऐसा होता है।' तीसरे ने कहा, 'पेट्रोल में कचरा होगा।' पेट्रोल शब्द सुनते ही उसे ध्यान आया कि कल शाम को शहर से लौटते समय उसने पेट्रोल भराया ही नहीं था। उसने पेट्रोल टंकी खोल कर देखा, टंकी छूँछी थी। पेट्रोल पंप जरा दूर था। सलाह वीरों को जब मालूम हुआ कि बन्दे की टंकी में पेट्रोल नहीं है, तो वे चुपचाप खिसक भागे।
पेट्रोल पंप तक मोटरसाइकिल को खींच कर ले जाने के अलावा उसके पास कोई चारा न था। वह मोटरसाइकिल खींचने लगा। कुछ ही मीटर उसने मोटरसाइकिल खींची थी कि एक ख्याल से उसका मगज जगमगाने लगा।  उसने मोटरसाइकिल खड़ी कर, गाड़ी के हैंडल से दूध का एक लीटर वाला डिब्बा निकाला, गाड़ी के पेट्रोल टंकी का ढक्कन खोला और दूध का डिब्बा उसमें उड़ेल  दिया। एक लीटर दूध पेट्रोल टंकी में डालने के बाद उसने सोचा, दूध जब आदमी को दौड़ा देता है, तो यह तो मशीन है। सोचने के बाद वह मोटरसाइकिल की किक मारने में जुट गया। उसने पच्चीसों मिनट किक मारने के बाद मान लिया कि दूध सिर्फ इंसानों और बिल्लियों और कुत्तों के लिए होता है, मशीनों के लिए नहीं।
वह फिर मोटरसाइकिल को धक्का मारने लगा। थोड़ी दूर पर उसे दो लड़के बस का इंतजार करते मिले। उसने फिर अपनी बुद्धि को तकलीफ देने की योजना बनाई। उसने उन दोनों युवकों से कहा, 'यदि तुम लोग दो किलोमीटर दूर पेट्रोल पंप तक मेरी मोटरसाइकिल को धक्का लगाओ तो मैं तुम दोनों को एक-एक लीटर दूध पीने को दूंगा।' लड़के शायद भूखे थे। उन्होंने झट उसका प्रस्ताव मान लिया। दोनों ने बारी-बारी से खींचकर मोटरसाइकिल पेट्रोल पंप तक पहुंचा दी। उसने भी अपना वादा पूरा करते हुए दो लीटर का डिब्बा मोटरसाइकिल के हैंडल से निकालकर उन दोनों को लड़कों को देते हुए कहा, 'तुम दोनों यह डिब्बा खाली करो, मैं तब तक पेट्रोल भरा कर आता हूँ।' वह सड़क पार कर पेट्रोल पंप ले गया मोटरसाइकिल। दोनों लड़के सड़क के इस पार के ढाबे चले गए दूध का डिब्बा लेकर। ढाबे वाले को चालीस की जगह तीस रूपए के भाव से दो लीटर दूध मिल गया। खाली डिब्बा लेकर वे दोनों लड़के वापस उसी जगह पर लौट आए।
पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भराने के बाद से वह मोटरसाइकिल शुरू करने का यत्न कर रहा था। लेकिन मोटरसाइकिल चालू होने का नाम ही नहीं ले रही थी। वे दोनों लड़के उसे देख रहे थे। वह मोटरसाइकिल खींच कर सड़क के इस पार आ गया। दोनों लड़कों से अपना खाली डिब्बा लेकर उन्हें धन्यवाद किया। लड़के चले गए। वह डिब्बे को हैंडल पर लटकाकर फिर से किक मारकर मोटरसाइकिल शुरू करने की कोशिश करने लगा। हारकर वह ढाबे की बगल वाले मोटर मैकेनिक के पास मोटरसाइकिल ले गया। मैकेनिक ने चेक करने के बाद बताया कि पेट्रोल टंकी में बड़ी मात्रा में पानी है। पूरी टंकी निकाल कर साफ़ करना पड़ेगा। वह बहुत दुखी हुआ। उसने वही से चिल्लाकर पेट्रोल पंप के मालिक को भद्दी-भद्दी गलियां दी। हाथ नचाकर पूछा कि आखिर वह पेट्रोल में पानी क्यों मिलता है।
खीझकर वह ढाबे में आकर बैठ गया। ढाबे वाले सरदार जी से कहा, 'बाउजी, चाय पिलाओ।' ढाबे के मालिक ने सोचा कि पैकेट के दूध की बजाय उस दूध से चाय बनाता हूँ, जिसे थोड़ी देर पहले दो लड़के दे गए हैं। शायद इस मुंडे का गरम मूड कुछ ठंडा पड़ जाये।
उसी दूध से चाय बनी। दारजी ने खुद उसे चाय परोसी।  उसने चाय का घूँट मुंह में भरते ही थूंक दिया। चिल्लाकर कहा, 'क्या बाउजी, सिर्फ पानी की चाय बनाई है क्या?'
सरदारजी से सोचा, 'मैंने तो जी प्योर दूध की चाय बनाई थी।'

#नई_लोक-कथाएं_सीरीज_१ 

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

मलयालम के प्रख्यात कवि कुरिपुज्झा श्रीकुमार (के. श्रीकुमार) की कविताएँ

जी, के. श्रीकुमार का यह चित्र मैंने खींचा है 



१). छुट्टी

हे भगवान !
गणित के अध्यापक
छुट्टी पर होने चाहिए

गणित अध्यापक आए
डाँट भी पड़ी

भगवान छुट्टी पर थे।


२).  सिद्धांत

कविता पढ़ी
जरा भी समझ में नहीं आयी

तब इस सिद्धांत का जन्म हुआ
"पढ़ने पर जो समझ न आए
वही होती है कविता।"


3).  भगत सिंह

भगत सिंह फांसी पर चढ़ाए गए
फांसी पर लटक कर वे मर गए
क्यों?
भगत सिंह नास्तिक थे क्या?
अगर वे नास्तिक थे
तो मैं भी नास्तिक हूँ।


४).  पंख

भीतर एक पंख है
नील चिड़िया के आँसूं से भीगा हुआ एक पंख
मेरे खून में डुबकी लगाते हुए
पंख एक दर्दीला गीत लिख गया मेरे चेहरे पर
पंख को तेज झोंका उड़ा ले गया
मैं अकेले बैठ रोने लगा।


५).  अवार्ड

शिक्षक वासुकुट्टी को
सर्वश्रेष्ठ शिक्षक का अवार्ड मिला
गाजे-बाजे के साथ उनको लाया गया
उस समारोह में जहाँ उनका सत्कार किया जाएगा

आनंदन शिक्षक ने कहा कि
अवार्ड पाने के लिए शिक्षक वासुकुट्टी ने जो किया है
उसके लिए एक और अवार्ड दिया जाना चाहिए उनको


६).  धार्मिक आख्यान 

कंप्यूटर ऑफ किया
मिक्सी में पीसकर तैयार
और ठंडा करने के लिए फ्रीज में रखे शरबत को पीकर
सिलाई मशीन से सिले कपडे पहनकर
बिजली के बल्ब के रोशनी में
माइक पकड़
वह विज्ञानं के खिलाफ भाषण देने लगा।


७).  सफ़ेद चीख

काली साड़ी
काला ब्लाउज
काली चप्पल
काले किए बाल
हसबैंड की डेड बॉडी के पास बैठ गई
एक सफ़ेद चीख


८).  चप्पल

उनके पास दो जोड़ी चप्पल है
घर के बाहर धार्मिक चप्पल
घर में धर्म विहीन चप्पल।
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लिली जोसफ के साथ मैं और श्रीकुमार जी 

मूल मलयालम से हिंदी अनुवाद किया है लिली जोसफ ने। लिली मुंबई में रहती हैं और इन दिनों के.श्रीकुमार की कविताओं का हिंदी अनुवाद कर रही हैं। लिली से lillyjoseph123@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। 

रविवार, 14 सितंबर 2014

देश की भाषा : एक सपना



एक विशाल स्टेडियम से उस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण देश भर के टेलीविज़न चैनलों पर जारी था, जिसे मैं सपने में देख रहा था। कार्यक्रम इतना भव्य था कि स्वप्न में भी मैं पलकें नहीं झपका पा रहा था। खचाखच भरे उस स्टेडियम में सुई रखने भर की भी जगह शेष न थी। विविध भाषाओं वाले इस देश की एक भाषा चुनने के लिए यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था। स्टेडियम में सभी राजमान्य भाषाओं के लिए उनके राज्य के भौगोलिक आकार के लिहाज से दीर्घाएं बनाई गई थीं। उन दीर्घाओं में, उन-उन भाषाओं के लेखक और विद्वतजन विराजमान थे। सभी अपनी-अपनी भाषा को देश की भाषा बनाए जाने की पुरजोर पैरवी कर रहे थे। कोई संस्कृत को प्राचीन और विज्ञानसम्मत भाषा बता रहा था, तो कोई तमिल और मराठी के पक्ष में तार्किक प्रस्ताव रख रहा था। जिस भी लेखक या विद्वान को अपनी बात कहना होता वह स्टेडियम के बीचो-बीच बने मंच पर आता, अपना नाम, अपनी भाषा बताता और तब अपनी भाषा के पक्ष में अपना तर्क प्रस्तुत करता। देश की सभी राजमान्य भाषाओं के प्रतिनिधि बोल चुके थे। संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से आए पर्यवेक्षकों ने पूछा, "क्या कोई और है जो इस स्टेडियम में है और यहाँ आकर अपनी बात रखना चाहता है?"
स्टेडियम में एकदम चुप्पी छा गई, इतनी चुप्पी कि लोग अपने दिल की धड़कन साफ़-साफ़ सुन सकते थे। मैंने हिम्मत कर कहा, "जी, मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ…"
पर्यवेक्षकों को मेरी आवाज़ सुनाई दी, लेकिन मैं उन्हें दिखाई नहीं दे रहा था। लिहाजा, उन्होंने पूछा, "आप कौन हैं? कहाँ हैं? हमें दिखाई क्यों नहीं देते?"
मैंने कहा, "मैं इस देश का आम नागरिक हूँ, देश में हर जगह रहता हूँ, आप तो विदेशी पर्यवेक्षक हैं, मैं तो अपने देश में ही किसी को दिखाई नहीं देता!"
मेरे जवाब से स्टेडियम में खलबली मच गई। अभी तक भाषायी विवाद में उलझे लेखकों और विद्वानों ने एक सुर में कहा कि यह विद्वत परिषद है और यहाँ आम नागरिक को अपना मत व्यक्त करने का कोई अधिकार नहीं है। सभी विद्वानों का साझा सवाल था, "भाषा के बारे में एक नागरिक को भला क्या इल्म?"
लेकिन संयुक राष्ट्र संघ के पर्यवेक्षकों ने कहा, "इस देश के आम नागरिक की बात भी सुनी जानी चाहिए, मानने न मानने का अधिकार आखिर हमारे पास सुरक्षित है।" विद्वतजन पर्यवेक्षकों के राय से सहमत हुए। मुझे मंच पर आने का निर्देश हुआ। मैं जैसे मंच पर पहुंचा, कहीं से आवाज़ आयी, "कहो नागरिक, देश की भाषा के बारे में तुम क्या कहना चाहते हो!" और समूचा स्टेडियम ठहाकों से गूँज उठा। 
मैं जानता था कि मेरे कहे का क्या हश्र होने वाला है, फिर भी मैंने अपनी बात शुरू की, "मैं जानता हूँ कि सवा सौ करोड़ के इस देश में एक भाषा चुनना आसान नहीं, क्योंकि हम भाषा चुनना ही नहीं चाहते। मेरे लिए भाषा वह है जिसके जरिए मैं किसी से भी संवाद साध सकूँ, जुड़ सकूँ, आपके लिए भाषा लिखने-पढ़ने और बोलने भर की चीज है। क्या बुरा होगा यदि ईमान इस देश की भाषा बन जाए, किसी का क्या बिगड़ जाएगा यदि परिश्रम इस देश की भाषा बन जाए। अमन को इस देश की भाषा कौन और क्यों बनने देना चाहता? क्या फर्क पड़ता है यदि ज्ञान और सद्भावना इस देश की भाषा हो? क्यों हम प्रेम और कल्याण को इस देश की भाषा नहीं बनने देना चाहते?"
मैं और भी कुछ कहना चाहता था, लेकिन मैंने महसूस किया कि स्टेडियम में एक भयावह सन्नाटा पसर गया है, लगा जैसे सभी सुनने वाले सुन्न हो गए हों! मैं घबरा गया, देश का आम नागरिक घबराए न तो वह आम नागरिक होने की अपनी योग्यता खो देता है। घबराहट और बेचैनी से मेरी नींद खुल गई।
जागते ही मैंने टेलीविज़न ऑन किया तो देखता हूँ कि टेलीविज़न पर अब भी उस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण जारी है, जिसे पिछले सड़सठ सालों से हम उनीदें देख रहे हैं।  

मंगलवार, 25 मार्च 2014

लघु कथा


थप्पड़ 

कुमारी दिया मिश्रा की डिजिटल पेंटिंग 'सिटी' 

यह उस समय की बात है जब शहरों में नए-नए कंक्रीट के जंगल उगने शुरू हुए थे। सड़क के किनारे के पेड़ इसलिए काट दिए गए थे कि उनसे कंक्रीट के तीन, पांच, सात मंजिला इमारतों की शोभा बिगड़ती थी। घरों के भीतर के पेड़ इसलिए काटे गए थे कि उनसे इन इमारतों को ऊँचा बनाने में अवरोध होता था। लेकिन हथेली की पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती है, सो शहर में ऐसे लोग भी थे, जो न अपने घरों को इमारत बना रहे थे, न ही घर के सामने अथवा भीतर के पेड़ काट रहे थे। 
मैं एक रोज शहर के इसी वृक्ष-वल्लरी मोहल्ले से गुजर रहा था। मार्च का महीना था। इस मोहल्ले में तरह-तरह के पेड़ थे। आम के वृक्षों पर बौर थी। अशोक के वृक्ष पतझड़ से त्रस्त थे। गुलमोहर खिले-खिले झूम रहे थे। बोगनविलिया मानों इस मोहल्ले का तोरण थी। एक घर के सामने सात-आठ वर्ष की एक बच्ची उछल-उछल कर अमरूद तोड़ने का प्रयास कर रही थी। उस घर के सामने अमरूद का पेड़ कच्चे-पके अमरूदों से लदा पड़ा था और सिर्फ एक ही बच्ची अमरूद खाने को उतावली थी! मोहल्ले के बाकी बच्चे कहाँ थे? हो सकता है मोहल्ले में बच्चे ही न हों? या फिर हो सकता है उन बच्चों के माता-पिता ने उन्हें घर से बाहर निकलने ही न दिया हो? इस तरह के तमाम ख्यालों से भरा मैं उस अमरूद के पेड़ के पास तक पहुँच गया। मुझे देख कर बच्ची ने उछलना बंद कर दिया लेकिन अमरूद की ओर देखती ही रही। वह अमरूद मेरी पहुँच में था, सो मैंने हाथ उठाकर उसे तोड़ा और बच्ची को दे दिया। बच्ची ने मुस्कुरा कर थैंक्यू कहा ही था कि उस घर से एक बुजुर्ग निकले। बाहर आते ही उन्होंने मेरे गाल पर थप्पड़ जड़ दिया। मैं हतप्रभ उन्हें देखता भर रह गया। उन बुजुर्ग महाशय ने बच्ची का हाथ पकड़ा और घर के अंदर चलते बने। जाते हुए वे बुदबुदा रहे थे, "ऐसे लोग किसी को भी सीखने नहीं देते, आखिर शहरों में अब फल देने वाले पेड़ ही कितने बचे हैं? अरे कितने बच्चे खुद ही पेड़ से तोड़कर फल खाते हैं? अब तो बाज़ार में ही बिकते हैं फल...."



सोमवार, 2 सितंबर 2013

कहानी विधा के एक प्रखर समकालीन नाम साथी कैलाश वानखेड़े जी के सलाह पर प्रतिष्ठित मराठी कवि प्रसेनजीत गायकवाड़ की मराठी कविताएँ और फिर उनका अंग्रेजी अनुवाद …

1. कवितेच्या गर्भातून

वेदनेला अर्थवाया
शब्द शब्द गोळा केला
एका एका अक्षरासी
तप तप दिस गेला

युगे युगे धुंडाळली
तेव्हा आली एक ओळ
जरा जरा टिचू लागे
दु:ख कल्पांताची खोळ

ओळ ओळ जुळू लागे
देही मनी उठे कळ
झळ लागे रोमरोमी
प्राणातून सळसळ

वेदनांच्या ओझ्याखाली
एका क्षणी निर्वाणलो
कवितेच्या गर्भातून
आणि पुन्हा जन्मा आलो

अंग्रेजी अनुवाद 

From the Embryo of poetry

Gave meaning to anguishes
accumulated each of the word
for every alphabet
a day became years of duodecimal 

Ages to seek
a line emerges
Pullulates bit of stratum 
of deep struck grief

line adds to line
corpus nous crop up contrivance
pilus n pore showers
delight from soul

under the encumbrance of anguishes
in a moment of emancipation
from the embryo of poetry
it is my rebirth

Embryo - womb
Duodecimal - term used for twelve.
Pullulates -  cracks
Corpus - body
Nous - mind

0000

2. माणूस मी...

तुझ्यासवे सुखी
असो तुझा देव
उगा मला भेव, ... दावू नको

तुझिया देवाला
दिला मी आकार
भाग्याचा प्रभार, ... सोपवला

माझ्या मुठीमध्ये
उन, वारा, जल
पाषाणचे बल, ... पायदळी

करीन अव्हाटी
सागरा, पर्वता
आखीन मी रस्ता, ... उन्नतीचा

अदम्य, दुर्दम्य
माझी इच्छाशक्ती
बुध्दी आणि युक्ती,... माणूस मी

अंग्रेजी अनुवाद 

I'm Human

Be blessed 
with your god
your fear of fraud
doesn't bothers me

I shaped 
your God
and handed him
charges of destiny

My fist contains
Warmth, Air, Water
Power of centuries 
are beneath my feet

Will challenge 
Oceans and Mountains
pave up ways
for the progress

Unconquerable, redoubtable 
is my conation
wisdom and device
Human I am  

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3. झाडांनी...

वावटळींच्या भूलथापांना
बळी पडू नये झाडांनी,
घासून घेऊ नये फांद्या परस्परांवर,
कारण नसताना उडवू नये ठिणग्या,
वणव्यांना देऊ नये निमंत्रण...

झाडांनी जंगलाचे भान ठेवावे.
जीवनरस पुरवणाऱ्या मुळांकडे लक्ष द्यावे.

मुळे...
हातात हात घालून फुगडत असतात.
झाडांच्या आयुष्यासाठी
खडकाशी झगडत असतात.

झाडांनी आत्ममग्न होऊन क्षणभर
आपला आघार घट्ट करून घ्यावा.
वावटळींच्या भूलथापांना फाटा द्यावा.

अंग्रेजी अनुवाद 

Trees should ...

To the rumours of whirlwinds
trees should not succumb,
should restrict branches from mutual abrasiveness
without reason should not flow sparks
should not invite forest fire...

Trees must have regards for forest
should give attention towards roots
as they are supplier of zest of life

Roots...
tie hand in hand to exalt
for long life of trees 
fighting underground stones

Trees should recollect themselves for moment
to strengthen their foundation
to ignore the rumours of whirlwinds 

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4. दंगल पसरत जाते...

दंगलीला नसतात हात किंवा पाय;
तरीही ती पसरत जाते... अस्ताव्यस्त...
पाण्यावर तेलाचा तवंग पसरावा तशी 
दंगल अफवेवर असते स्वार...

दंगल छापवून आणते वृत्तपत्रांत
स्तंभच्यास्तंभ, रकानेच्यारकाने आणि मुखपृष्ठकथा.
तिच्याच सहकार्याने प्रेक्षणीय होतात
दूरचित्रवाहिन्यांच्या सनसनाटी वृत्तमालिका.
लोकशाहीच्या चौथ्या स्तंभाचा
टीआरपी दंगलच उंचावते.
दंगल नसते दडून
कोण्या पडक्या भिंतीच्या कुबट कोपऱ्यात.
डांबराच्या रिकाम्या पिंपातही असत नाही दंगल.
उंच डोंगराच्या मागे किंवा खोल विहिरीच्या तळाशी 
दंगल लपून बसत नाहीच कघी.
दंगल हळूच डोकावते
दगडाला लेपलेल्या षेंदराच्या भगव्या खोळीतून.
जुनाट वृध्द वृक्षाखाली
भेगाळलेल्या थडग्यावरील फाटक्या हिरव्या चादरीआड
सजग पडून असते दंगल.
काटेरी मुकुटात स्वत:ला गुंतवून
दंगल उडवत असते
वेदनेने विव्हळणाऱ्या येशूची खिल्ली.
कधी कधी बाबासाहेबांच्या दिशादर्शक बोटावरून
बुध्दाच्या पंचशीलाला चिडवत असते दंगल.

दंगल
पंचतारांकित उंच इमारतींच्या वातानुकुलित कमऱ्यातून
शहराच्या हमरस्त्यावर, चौकाचौकावर डोळा ठेवून असते.
झोपडपट्टयांवरही असते तिची मेहरनजर.
दंगलीचेच सण साजरे करतात सरकारी बंदुका.
पोलिसांना लावता येते संचारबंदी
आणि काढून घेता येते
वरीष्ठांनी घातलेल्या शिव्यांची खुन्नस
दंगलीचे निमित्त करून.

दंगलीच्या आशीर्वादाने
श्रीमंतांना शॉपिंगच्या रगाडयातून काढता येते जराशी उसंत,
गरीबांच्या चुलींना मिळते हक्काची विश्रांती.

केवळ दंगलीमुळेच मिळते विचारवंतांच्या मेंदूंना खाद्य...
विशलेषणे आणि चर्चांना येतो उत
पावसाळी कुत्र्यांच्या मुताप्रमाणे...

मेंदूची माती आणि काळजाचा कोळसा झालेले कॅमरामन
दंगल करतात चित्रबध्द;
तरीही सापडत नाही कुणालाच तिचा पत्ता.
दंगल पसरत जाते अस्ताव्यस्त...

अंग्रेजी अनुवाद 

Riot spreads on

Riot has no hands nor legs
then also it spreads... scattered ...
like oily conceit spreads on water
riots rides on rumours...

Riot gets printed in Newspapers
in coloumns to coloumns, pages to pages and as cover stories.
with its assistance televisions sensational serials become spectacular.
The TRP of fourth coloumn of democracy rises due to riots.

Riot never evanesces
in darken side of the fallen wall
nor it remains in the empty drum of an asphalt
riots never hide in back of high mountains or in deep bottom of well

Riot slowly raises its head
from saffron room of vermilion coated stone.
In the broken grave 
under the shade of an ancient old tree
riot lives on alert under the torn green sheet.
Entangled in thorny crown 
riot makes fun of whelming Jesus Christ.
Sometimes by guiding finger of Babasaheb
riot annoy the panchsheel of Buddha.

Riot
from air-conditioner rooms of five starred heightened buildings
watches every road and square of the city
on slums it is extra compassionate.

Official guns celebrate festivals of riot
police is free to impose curfew
and can take revenge of every assaults of their seniors on the occasion of riot.

Due to blessings of riot
wealthy people can take somewhat leisure from shopping rushes
hearth of indigents gets deserving interval.

Riot fertilizes brains of intellectuals
alike fungus  
analysis and discussions get emphasized   

Cameramen whose brain turned into mud and heart into coal make films of riot;
but then nobody could trace its address
riot spreads on Helter-Skelter ...    

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5. तोबा तोबा...

मनुष्यतेवर बसलेला मळ... तोबा तोबा...
उरात माझ्या उठलेली कळ... तोबा तोबा...

असे दुखाने आयुष्याला छळले होते
सुखात सावघ वावरतो पळ... तोबा तोबा...

अबीर-बुक्का दळून झाले झिजले जाते
तरी कळे ना तत्त्वांचा तळ... तोबा तोबा...

नकार तुमचे झेलत आलो, पेलत आलो
रुकार वाटे एक नवा गळ... तोबा तोबा...

कषास सूर्या गमजा करषी ग्रिष्मामध्ये
तुला न ठावी जातीची झळ... तोबा तोबा...

तहान व्याकुळ काठावरती तिष्ठत आहे
हताष वेडा बसलेला हळ... तोबा तोबा...

अरे! समुद्रा, आवर लाटा गर्वोन्नत ह्या
अथांग येथे पोटाची खळ... तोबा तोबा...

अंग्रेजी अनुवाद 

I swear

Seeing sludge seated on humanity
device takes shape in me ... I swear ...

Ages passed in deception in name of grief
exploit every moment of delight with prudence ... I swear ...

Applied enough of Abir-Buka* and frayed 
then also cannot sense basis of abstract ... I swear ...

Your negation made me suffer and drive in
acceptance seems as fishing rod ... I swear ...

In summer O sun your pride is inoperable
you don't know the heat of caste ... I swear ...

Descendent Nympholept is erected manger 
Thirsty anxious waiting on brink ... I swear ...

Hey! ocean control your proud tides there 
here valley in stomach is abysmal ... I swear ...

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6. भुललो आपण

पुचाट अपुले सपाट मेंदू
हृदयाचाही झाला चोथा
श्ुललो आपण कोण बुध्द तो,
कोण कोठला तुकया होता?

कुणी वेचले प्राण क्रुसावर?
कुणी प्राषिला विषघर प्याला?
विष्वमंडळी सत्यासाठी
कुणी त्यागिले मायभूमीला?

समग्र सत्ता सत्य आपले,
माणिक, मोती, सुवर्ण, पैसा.
कसा स्मरावा महावीर नि
सखा आपला कबीर कैसा?

अमुचे अपुले जंती जीवन;
खाणे, व्याणे मरून जाणे.
हवेत आणि पसरून करतल
दे दे दे दे करीत राहणे...

अंग्रेजी अनुवाद 

Memory Loss

Contracitive are our flush brain
heart also squeezed
we have forgotten who Buddha was
who where from was Tukya*?

Who was crucified?
Who drank poison hemlock?
For universal truth
who left his motherland?

Ruby, pearl, gold, money
overall authority is truth for us
How to remember Mahavir
and make friendship with Kabir?

Our own wormy life
eat, breed and to die 
needs so stretch hand
and start begging

*Sant Tukaram (17th Century Marathi poet who deeply and widely influenced marathi literary culture.) 

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All the Poems Translated by P. Falgun from Marathi.

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कवि प्रसेनजीत से संपर्क : मोबाइल - 08806560740
email - prasengaikwad@gmail.com

खान-पान के अहम् फाल्गुन नियम

प्रतीकात्मक पेंटिंग : पुष्पेन्द्र फाल्गुन  इन्टरनेट या टेलीविजन पर आभासी स्वरुप में हो या वास्तविक रुप में आहार अथवा खान-पान को लेकर त...