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सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि


११ मई २०११ को नागपुर के दीनानाथ हाईस्कूल में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की १५० वीं जयंती के निमित्त युवा कवियों के विचार नामक कार्यक्रम आयोजित हुआ. इसमें श्री अरिंदम घोष, श्रीमती इला कुमार, श्रीमती अलका त्यागी, श्री अमित कल्ला के अलावा मैंने यानि पुष्पेन्द्र फाल्गुन ने भी अपने विचार रखे. मैंने वहाँ जो कहा, वह आपके पेशे-खिदमत है. पढ़कर कृपया अपनी राय से अवगत कराएं...

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कालजयी काव्यकृति गीतांजलि को यदि मुझे एक वाक्य में अभिव्यक्त करना हो तो मैं कहूँगा, 'सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि।' गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के किसी कविता की ही पंक्तियां हैं;
सत्य ये कठिन
कठिनेरे भालोबासिलाम
से कखनो करे ना बंचना
(सत्य तो कठिन है, लेकिन इस कठिन से ही मैंने प्रेम किया, क्योंकि यह सत्य कभी वंचना नहीं करता।)

      गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का समूचा साहित्य फिर चाहे वह काव्य हो, नाटय हो, कथा-कादंबरी हो, हर कहीं सत्य ही उद्भाषित होता है, सत्य ही उद्धाटित होता है, सत्य की ही पक्षधरता है। गीतांजलि में सत्य की पक्षधरता के साथ-साथ सत्य प्राप्ति के उपाय सर्वाधिक प्रखर हैं। प्रखरता से यहाँ मेरा तात्पर्य स्पष्टता से है।

जैसा कि आप सभी विज्ञजन जानते ही हैं कि सार्थक साहित्य समस्याओं को उजागर करने के साथ उस पर विमर्श करता है और उस समस्या से निजात के उपाय बताता है। उपाय और उपदेश का फर्क ही साहित्य की कोटि निर्धारित करता है। गीतांजलि इसीलिए सर्वोच्च कोटि की साहित्यिक कृति है कि इसमें उपदेश नहीं है उपाय है; अहंकार से मुक्ति के उपाय क्योंकि अहंकार ही सत्य की राह में सबसे बड़ी बाधा है।

वह अहंकारी कौन है, कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ किस अहंकार की बात कर रहे हैं? उन्हीं की एक कविता की पंक्तियां हैं;
फूल फुटे, आमि आर देखिते न पाइ!
पाखि गाहे, मोर काछे गाहे ना से आर!
(फूल खिलते हैं, पक्षी गाते हैं, लेकिन हृदय अपने में ही इतना व्यस्त है कि वह यह सब देख-सुनकर भी अनदेखा-अनसुना करता है।)

और जब हृदय प्रकृति के सौंदर्य, उल्लास एवं अनुपमता की उपेक्षा करता है, तो वह भला उस सत्य को क्या देखेगा-समझेगा, जिसकी बात गुरुदेव रवीन्द्रनाथ कर रहे हैं! इसीलिए पूरी गीतांजलि में रवीन्द्रनाथ अहंकार के तिरोहण की बात करते हैं, लेकिन उपदेशात्मक लहजे में नहीं, बल्कि प्रार्थी भाव में। गीतांजलि की इस कविता में कवि अपने अहंकार के नाश की बात करते हैं। कवि कहते हैं;
मेरा मस्तक अपनी चरण-धूलि तल में झुका दे!
प्रभु! मेरे समस्त अहंकार को ऑंखों के पानी में डुबा दे!
अपने झूठे महत्व की रक्षा करते हुए मैं केवल अपनी लघुता दिखाता हूँ
अपने ही को घेर मैं घूमता-घूमता प्रतिपल मरता हूँ
प्रभु! मेरे समस्त अहंकार को ऑंखों के पानी में डुबा दे!
मात्र अपने निजी कार्यों से ही मैं खुद को प्रचारित न करूं
तू अपनी इच्छा मेरे जीवन के माध्यम से पूरी कर
मैं तुझसे चरम शांति की भीख मांगता हूँ
प्राणों में तेरी परम कांति मांगता हूँ
मुझे ओट देता मेरे हृदय कमल में तू खड़ा रह
प्रभु! मेरे समस्त अहंकार को ऑंखों के पानी में डुबा दे!

        गीतांजलि में इसी तरह की कविताएं हैं। अहंकार से मुक्ति की कामना। अहंकार से मुक्ति की याचना। अहंकार से मुक्ति की प्रार्थना। क्योंकि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ मानते हैं कि अहंकार ही असल में तमाम समस्याओं की जड़ है। फिर चाहे वह समस्याएं व्यक्ति की अंतर्गत समस्याएं हों कि सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक।

      लेकिन गुरुदेव जानते हैं कि अहंकार से मुक्ति इतनी सहज नहीं है, इसीलिए गीतांजलि में वे अहंकार से मुक्त होने की कामना रखने वालों के लिए एक हिदायत भी लिए चलते हैं और वह हिदायत है कि बिचौलियों से सावधान। बिचौलिए मतलब पंडे-पुरोहित। धर्म के बिचौलिए। गीतांजलि की ही यह कविता देखिए;
उसने तेरी नाव तक पहुँचने से पूर्व, राह में ही मुझे पकड़कर
मुझसे पूरी कीमत वसूल कर ली
घाट पर पहुँचा तो देखता हूँ कि नदी पार जाने के लिए मेरे पास एक कौड़ी भी शेष नहीं है
तेरे ही काम के बहाने उसने मुझे बुलाया और रास्ते में ही तन-मन-धन नष्ट कर दिया
और जो थोड़ा-बहुत मेरे पास था, उसका अपहरण कर लिया
आज जब मैंने उन बहुरूपी वंचकों को पहचान लिया
उन्होंने भी मुझे शषक्तहीन जान लिया
भय और लज्जा से उनकी ऑंखे झुकी हुई नहीं थी
आज वे सिर ऊँचा उठाकर गर्व से रास्ता रोके खड़े थे।

       तो बिचौलिए, धर्म के बिचौलिए अहंकार मुक्ति की आपकी कामना को ताड़ जाएंगे और आपकी इस कामना को आपकी कमजोरी बना देंगे। इसलिए धर्म के मार्ग से अहंकार मुक्ति का उपाय आपको नहीं अपनाना है। तो फिर किस तरह? रवीन्द्रनाथ गीतांजलि में इस सवाल का भी जवाब देते हैं। अहंकार की मुक्ति के लिए रवीन्द्रनाथ अनुभूति का मार्ग अख्तियार करने की सूचना देते हैं। कैसी अनुभूति? प्रेम की अनुभूति। जब प्रेम की अनुभूति होती है, तो हृदय आनंद से लबालब हो उठता है। सब तरफ उपस्थित और व्याप्त सौंदर्य हमारा ध्यान खींचते हैं। गीतांजलि की यह कविता देखिए;
आकाश में आलोक कमल खिला है
उसकी पंखुड़ियाँ खिल-खिल कर सब दिशाओं में बिखर गई हैं
उससे ढंक गया अहंकार का गहरा काला पानी
पुष्प के मध्य भाग में स्वर्ण का कोष है
मैं वहाँ आनंद से बैठा हूँ और मुझे घेरकर आलोक शतदल धीरे-धीरे विकसित हो रहा है
आकाश में पवन की तरंगे उठी हैं, चारों ओर से गीतों की लहरें उमड़ रही हैं
प्राण चतुर्दिक दौड़ रहा है, नृत्य कर रहा है, थिरक उठा है।
गगन पूरित आलोक सबको स्पर्श कर रहा है
इस प्राण सागर में गोता लगाकर उसे अपने वक्ष में भर रहा हूँ मैं
घूम-घूम के हवा मुझे घेर बह जाती है
आंचल पसार पृथ्वी भी दसों दिशाओं से प्राण संचित कर अपने हृदय में पूर रही है
जहाँ-जहाँ भी प्राणधारी जीव रहते हैं, सबको उसने पुकारा है
सबके हाथों में, पात्रों में अन्न बांट दिया है
मेरा मन भी गीत और गंध से भर गया
मैं अतीव आनंद से स्वर्ण कोष में बैठा हूँ
पृथ्वी ने मुझे अपने आंचल से घेर लिया है और अपने हृदय में बिठाया है
प्रकाश! मैं तुझे नमस्कार करता हूँ, मेरा अपराध नष्ट कर
मेरे माथे पर पिता का वरद हाथ रख
पवन! मैं तुझे नमस्कार करता हूँ, मेरा विषाद नष्ट कर
मेरे समस्त शरीर पर फैला दे पिता का आर्शीवाद
भू-माता मैं तुझे नमस्कार करता हूँ, मेरे समस्त मनोरथ पूर्ण कर
घर-घर में भर जाए पिता का आर्शीवाद।

         तो प्रेम की अनुभूति हमारे हृदय को सदभावना से भर देती है। लेकिन इसी समय, इसी अनुभूति के साथ हमारे भीतर उतरता है भय। कैसा भय? अहंकार छूट रहा है। चूर-चूर हो नष्ट हो रहा है। लेकिन उसका हमारे हृदय में इतने लंबे समय तक निवास रहा है, भला वह आसानी से छोड़ेगा हमे? हम तो अब उसे छोड़ना चाहते हैं, लेकिन क्या वह आसानी से छोड़ेगा हमें? नहीं, वह हमें डराएगा। लेकिन हमें डरना नहीं। प्रेम की अनुभूति से जो उदात्त जीवन की गंध हमें मिली है। हमें उस पर ही ध्यान लगाए रखना है। हमें लड़ना नहीं है अपने अहंकार से। क्योंकि जब हम लड़ने लगते हैं, तो जीत के उन्माद की आशंका या फिर हारने का भय हमें लगातार कमजोर बनाए रहता है। इसीलिए हमें प्रेम का रास्ता अपनाना है। प्रेम का हाथ यदि हम थामे रहेंगे तो अहंकार अपने आप तिरोहित होकर समाप्त हो जाएगा। यदि अहंकार के जाने का भय हो तो ईश्वर पर आस्था रखने से अहंकार से मुक्ति का मार्ग सुगम होगा। फिर जब हम अहंकार मुक्त हो जाएं और प्रेम से हमारा रोम-रोम पग जाए तो हमें क्या करना चाहिए? रवीन्द्रनाथ गीतांजलि के पाठकों को अधर में नहीं छोड़ते। ऐसा नहीं कि आप अहंकार से मुक्त हो गए। प्रेम की शाश्वत अनुभूतियों से तर हो गए तो काम खत्म हो गया। नहीं। रवीन्द्रनाथ जानते थे कि असल दिक्कत तो यहीं से शुरु होती है। प्रेम पगा मनुष्य असल में भक्ति में डूबने लगता है। उसे लगता है कि भक्ति ही सबकुछ है; लेकिन रवीन्द्रनाथ प्रेम में डूबे मनुष्य को सचेत करते हैं, उसे चैतन्य बनाते हैं, उसे ताकीद करते है कि सत्य की तरफ बढ़ो, सत्य प्राप्त करो और वह सत्य क्या है?
गीतांजलि की यह कविता देखिए;
पुजारी, भजन, पूजन, साधन, आराधना
इस सबको किनारे रख दे
द्वार बंद करके देवालय के कोने में क्यों बैठा है?
अपने मन के अंधकार में छिपा बैठा, तू कौन सी पूजा में मग्न है?
आँखें खोलकर जरा देख तो सही, तेरा देवता देवालय में नहीं है
जहाँ कठोर जमीन को नरम करके किसान खेती कर रहे हैं
जहाँ मजदूर पत्थर फोड़कर रास्ता तैयार कर रहे हैं।
तेरा देवता वहीं चला गया है
वे धूप-बरसात में सदा एक समान झुलसते हैं,
उनके दोनों हाथ मिट्टी में सने हैं
अपने सुंदर परिधान त्यागकर उनकी तरह मिट्टी भरे रास्तों से जा
तेरा देवता देवालय में नहीं है
भजन, पूजन, साधन को किनारे रख दे
मुक्ति? अरे मुक्ति कहां है
कहां मिलेगी मुक्ति
अपने सृष्टि बंध से प्रभु स्वयं बधे हैं
ध्यान पूजा को किनारे रख दे
फूल की डाली को छोड़ दे। वस्त्रों को फटने दे, धूल धुसरित होने दे
उनके साथ काम करते हुए पसीना बहने दे

       पूरी गीतांजलि का सार यही है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ पूरी गीतांजलि में अहंकार से मुक्ति की कामना करते हैं और फिर यह जान लेते हैं कि असल मुक्ति श्रम में है, लेकिन श्रम, बिना प्रेम के अधूरा है। इसीलिए वे इंसान को पहले अहंकार से मुक्त होने, प्रेममय होने और फिर श्रम के लिए प्रेरित करते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए वे ईश्वर को साधन बनाते हैं, साध्य नहीं। प्रेमिल हृदय के श्रम से ही मनुष्य असल में समाज में अपनी उपयोगिता और कर्मठता सिद्ध करता है। यही श्रम की महत्ता है और यही प्रेम की भी महत्ता है। कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ गीतांजलि में इस महत्व को पूरी सफलता से सर्जित कर जाते हैं।

        मजेदार बात यह है कि जिस समय रवीन्द्रनाथ गीतांजलि के जरिए समूची दुनिया के समक्ष श्रम की महत्ता प्रतिपादित कर रहे थे। उस समय दुनिया में परस्पर एक-दूसरे पर वर्चस्व की होड़ मची हुई थी। यह बीसवीं शताब्दी के आरंभ का समय था। इंग्लैण्ड, फ्रांस, इटली, जर्मनी, रूस, जैसे देश अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे।

       जिस समय रवीन्द्रनाथ ने बांग्ला गीतांजलि से 51, गीतिमाल्य से 17, नैवेद्य से 16, खेया से 11, शिशु से 3 तथा चैतालि, स्मरण, कल्पना, उत्सर्ग और अचलायतन नामक अपने बांग्ला काव्य संकलनों से एक-एक कविताएं लेकर उन्हें अंगरेजी में अनूदित कर अंगरेजी गीतांजलि की रचना की, उस समय विश्व पटल पर प्रथम विश्व-युद्ध दस्तक दे रहा था। इंग्लैण्ड के तमाम साहित्यकार विश्व-युद्ध की दस्तक सुन रहे थे और 1912 में जब रवीन्द्रनाथ अंगरेजी गीतांजलि के साथ लंदन पहुँचते हैं, तो मानों अंगरेजी के इन मशहूर साहित्यकारों को इस संकट से निपटने की कोई कुंजी मिल जाती है। गीतांजलि में जिस तरह से कवीन्द्र रवीन्द्र आध्यात्मिकता के ताने-बाने में श्रम को मूल्यांकित करते है, वह विश्व भर के प्रमुख साहित्य साधकों को न सिर्फ चौंकाता है, उन्हें गहरे तक प्रभावित भी करता है।

      लंदन में रहनेवाले मशहूर चित्रकार, साहित्य मर्मज्ञ और विचारक विलियम रोदेन्स्टाइन, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं से सबसे पहले मुत्तासिर होते हैं। उन्होंने अंगरेजी पत्रिका 'मॉडर्न रिव्यू' में भगिनी निवेदिता द्वारा अंगरेजी में अनूदित काबुलीवाला कहानी पढ़ी थी और इसके शिल्प, कथ्यादि के चमत्कार से वह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शांतिनिकेतन पत्र भेजकर यह पूछा कि क्या रवीन्द्रनाथ की इस तरह की और दस कहानियां हैं? जवाब में शांतिनिकेतन के शिक्षक अजीतकुमार चक्रवर्ती ने रोदेन्स्टाइन को रवीन्द्रनाथ की अंगरेजी में अनुवादित कुछ कविताएं भेज दी।

       बाद में जब रवीन्द्रनाथ लंदन पहुँचे और उन्हें जो घर किराए पर मिला वह रोदेन्स्टाइन के घर के समीप था। रोदेन्स्टाइन ने ही अंगरेजी गीतांजलि की पांडुलिपि बै्रडले, स्टापफोर्ड ए. क्रुक एवं डब्ल्यू. बी. येट्स के पास अभिमत जानने के अभिप्राय से प्रेषित की। सभी गीतांजलि की सहजता और बोधगम्यता से चकित थे। रोदेन्स्टाइन के माध्यम से ही रवीन्द्रनाथ का परिचय एच.जी. वेल्स, ब्रटेड रसेल, लूइस डिकिंसन से हुआ था। रोदेन्स्टाइन ने ही अपने निवास पर 30 जून 1912 को एक गोष्ठी आयोजित की जिसमें येट्स, मेस्फील्ड, एमालिन अंडरहिल, एजरा पाउंड, मिस सिंकलेयर, ऑर्नेस्ट रीज, राबर्ट ट्रेवलिन, इत्यादि प्रमुख साहित्यिक-विचारक शामिल हुए। इसी गोष्ठी में पहली बार येट्स ने गीतांजलि की कुछ कविताएं सुनाई। 10 जुलाई 1912 को लंदन के ट्रकेडारो होटल में रवीन्द्रनाथ टैगोर के अंभिनंदनार्थ एक सभा आयोजित हुई। इस सभा में भी रवीन्द्रनाथ की कविताओं का पाठ येट्स ने किया। अब तक रवीन्द्रनाथ लंदन में प्रसिध्दि पा चुके थे। कई पत्र-पत्रिकाओं ने उन पर लेखादि प्रकाशित किए। 1912 के अगस्त के अंत में गीतांजलि का अंगरेजी अनुवाद इंडिया सोसाइटी नामक संस्था ने मुद्रित कर प्रकाशित किया और अपने सदस्यों में उसे प्रसारित किया। 1912 के नवंबर में अंगरेजी गीतांजलि का समग्र प्रकाशन हुआ। इसकी भूमिका येट्स ने लिखी थी और आवरण पर रोदेन्स्टाइन द्वारा रवीन्द्रनाथ का बनाया हुआ चित्र था।
      अंगरेजी गीतांजलि रोदेन्स्टाइन को समर्पित है। 

      बाद में मैकमिलन एंड कंपनी नामक प्रकाशन संस्थान ने मार्च 1913 में इस प्रकाशित कर दुनिया के सम्मुख प्रस्तुत किया। हालांकि तब तक गीतांजलि की कविताएं पश्चिम की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी थी। शिकागो से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका 'पोएट्री' ने भी गीतांजलि की छहः कविताएं दिसंबर 1912 में प्रकाशित की।

      मैकमिलन एंड कंपनी द्वारा प्रकाशित गीतांजलि की सारी प्रतियां एक महीने में ही बिक गई थी। 1913 की सितंबर में गीतांजलि को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई। उसके बाद करीब आठ-नौ साल तक गीतांजलि अंगरेजी में सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तकों में शामिल रही।

      पश्चिम में गीतांजलि को हाथों-हाथ लेने की वजह वहाँ का वातावरण था। लगभग सभी पश्चिमी देश संक्रमण की अवस्था से गुजर रहे थे। एक तरफ औद्योगिकीकरण के चलते बेरोजगारी और बाजार का संकट था, तिस पर इन संकटों को झेलते वहाँ के सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव। उस समय के बुद्धिजीवियों को यह एहसास था कि यदि गीतांजलि का समुचित तरीके से पाठ वहाँ की जनता के बीच हो तो बहुत हद तक तत्कालिक कुप्रभावों को टाला जा सकता है अथवा उससे बचा जा सकता है, दुर्भाग्य से गीतांजलि को नोबेल मिलने के बाद इस तरह की कोशिशों पर विराम लग गया। वहाँ पश्चिम में भी। यहाँ भारत में भी।

-पुष्पेन्द्र फाल्गुन 

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