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सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि

११ मई २०११ को नागपुर के दीनानाथ हाईस्कूल में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की १५० वीं जयंती के निमित्त युवा कवियों के विचार नामक कार्यक्रम आयोजित हुआ. इसमें श्री अरिंदम घोष, श्रीमती इला कुमार, श्रीमती अलका त्यागी, श्री अमित कल्ला के अलावा मैंने यानि पुष्पेन्द्र फाल्गुन ने भी अपने विचार रखे. मैंने वहाँ जो कहा, वह आपके पेशे-खिदमत है. पढ़कर कृपया अपनी राय से अवगत कराएं...

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कालजयी काव्यकृति गीतांजलि को यदि मुझे एक वाक्य में अभिव्यक्त करना हो तो मैं कहूँगा, 'सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि।' गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के किसी कविता की ही पंक्तियां हैं;
सत्य ये कठिन
कठिनेरे भालोबासिलाम
से कखनो करे ना बंचना
(सत्य तो कठिन है, लेकिन इस कठिन से ही मैंने प्रेम किया, क्योंकि यह सत्य कभी वंचना नहीं करता।)

      गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का समूचा साहित्य फिर चाहे वह काव्य हो, नाटय हो, कथा-कादंबरी हो, हर कहीं सत्य ही उद्भाषित होता है, सत्य ही उद्धाटित होता है, सत्य की ही पक्षधरता है। गीतांजलि में सत्य की पक्षधरता के साथ-साथ सत्य प्राप्ति के उपाय सर्वाधिक प्रखर हैं। प्रखरत…

अंतस-पतंगें

आप लोगों की नजर एक कविता, शीर्षक है 'अंतस-पतंगें'


परत-दर-परत उघारता हूँ अंतस उधेड़बुन के हर अंतराल पर फुर्र से उड़ पड़ती है एक पतंग  अवकाश के बेरंग आकाश में.
पतंगों के धाराप्रवाह उड़ानों से उत्साहित टटोलता हूँ अपना मर्म मानस पाता हूँ वहाँ अटकी पड़ी असंख्य पतंगें कहीं गुच्छ-गुच्छ कहीं इक्का-दुक्का.
अंतस की काई में उँगलियाँ उजास का जरिया बनती हैं अंगुल भर उजास भड़भड़ा देता है अस्तित्व पतंगें घोषित कर देती हैं बगावत स्पर्श ने पिघला दी समय की बर्फ जगा दी मुक्ति की अपरिहार्य आकांक्षा. 
पतंगों की समवेत अभिलाषा अंतस में पैदा करती है प्रसव-वेदना एक-एक कर कोख से उन्मुक्त हो पतंगें नापने लगती हैं आसमान लाख प्रयास भी नहीं काट पाती है किसी भी पतंग की गर्भनाल.
गर्भनाल ही बनती जाती है डोर अंतस रूपांतरित होने लगता है एक महाकाय चकरी में जिसमे लिपटी डोर साहूकारी ब्याज सी अनंतता का अभिशाप लिए गूंथती रहती है देह-संस्कार.
हवाबद्ध हर पतंग के  निजी इतिहास और संस्कृति की पनाहगाह अंतस सौन्दर्यबोध की उत्कंठा में उदास तलाश रही है वह कैनवास कि जिसके आगोश में पतंगे तय कर सकें अपनी मंजिल उन्मुक्त और निर्भय.

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प्रवाह

जैसे दो किनारों के सहारे आगे बढ़ती है नदी  किनारे न हों तो भटक जाएगी नदी किनारे नदी के भटकाव को रोकते हैं और रखते हैं प्रवाहमान उसे
किनारे न हों तो दूर तक कहीं फ़ैल कर नदी ठहर जायेगी...
स्वाभाविक तरीके से गतिमान रहना है तो दो की जरूरत अपरिहार्य है दो पैर हों तो चाल स्वाभाविक होगी दो हाथ हों तो उलट-पलट आसान होगी 
उलट-पलट से एक किस्सा याद आया
कोई दस बरस पहले की बात है मैं एक पारिवारिक शादी में शरीक होने ननिहाल गया था. वहाँ जो खानसामा थे, उनसे मेरी दोस्ती हो गई. मैं उनसे अलग-अलग व्यंजन बनाना सीखता...
एक शाम बड़े से चूल्हे पर एक बड़े कड़ाह में वे आलू और कद्दू के सब्जी बना रहा थे उनके दोनों हाथ में सब्जी चलाने के लिए औज़ार थे... मैंने उनसे पूछा, 'सब्जी चलाने के लिए दो-दो औज़ार क्यों...' वे हँसते हुए बोले, 'एक उलटने के लिए एक पलटने के लिए...' मैंने पूछा, 'उलटने-पलटने!! मतलब?'
मेरे गालों को छूकर उन्होंने कहा, 'जिस दिन उलटने-पलटने की उपयोगिता समझ जाओगे, अपने साथ-साथ औरों का जीवन भी  आसान बना दोगे...'

फर्क

"क्या आपको सचमुच फर्क नहीं पड़ता!!" मैंने हैरत से उस बुजुर्ग फ़कीर से पूछा था. लगभग हँसते हुए लेकिन अत्यंत दृढ़ स्वर में उन्होंने कहा था, "नहीं."
मेरे रुआंसे चेहरे को देखकर उन्हें फिर हंसी आ रही थी. लेकिन उन्होंने हंसी को ज़ब्त करने का अभिनय किया. मैंने लम्बी सांस खींचकर उनसे पूछा, "तो फिर किस बात से फर्क पड़ता है?"
चमकती आँखों और मुस्कुराते होठों के मालिक उस फकीर ने कहा, "इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक, आप आत्मा और परमात्मा को मानते हैं या नहीं, आप कर्मकांडी हैं या नहीं, आप साम्यवादी  हैं या नहीं, फर्क इस बात से पड़ता है कि आपका चित्त निर्मल है या नहीं. यदि आपके आस्तिक अथवा नास्तिक होने से आपका चित्त निर्मल हो जाता हो तो आप शौक से आस्तिकता अथवा नास्तिकता का ढोल बजाइए. लेकिन यदि आपका चित्त निर्मल नहीं हैं तो फिर किसी को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक, साम्यवादी हैं या भाग्यवादी, कर्मकांडी हैं या कर्मवादी..."
वह बूढ़ा फ़कीर अपनी बात खत्मकर कब का जा चुका था और मैं अपनी हैरत को संभालने के तरीके ढूँढने में…

स्कूल जाने के पहले एक बच्ची की प्रार्थना

"हे भगवान्, अब आप हमारे क्लास के बच्चों के गाल और हाथ की रक्षा करना. कल टीचर को नया डस्टर मिल गया है, इस साल का डस्टर बड़ा मज़बूत और मोटा है और टीचर का निशाना भी एक दम पक्का है. अपनी सीट से बैठे-बैठे ही वे किसी का भी गाल लाल कर सकती हैं. कुछ ऐसा करो भगवान् कि टीचर से ये डस्टर गुम जाए. या फिर ऐसा करो कि टीचर को लकड़ी मिल जाए, कम से कम लकड़ी कि मार सही जा सकती है क्योंकि हमें उसके बारे में मालूम होता है. लेकिन ये टीचर तो जुबान पर लकड़ी से मारती है. एक काम करो भगवान् टीचर ही बदल दो..., हाँ भगवानजी, ये टीचर हटाकर कोई ऐसी टीचर हमें दो, जो हमसे प्यार से बातें करे, हमें प्यार से हर बात, हर सबक समझाए और पूछने पर मारे नहीं बताये, समझाए वो भी प्यार से, बिलकुल हमारी मम्मी की तरह..., आप सुन रहे हो न भगवानजी.."

बापू का चश्मा

सेवाग्राम आश्रम से बापू का चश्मा क्या चोरी हुआ, हाय तौबा मचाने वालों की तो निकल पड़ी. किसी ने सेवाग्राम आश्रम समिति को जमकर कोसा कि उन लोगों ने आखिर इतने महीनों तक चश्मे की चोरी छिपाए क्यों रखी? तो किसी ने पुलिस विभाग को कोसा कि अभी तक चश्मे का कोई सुराग नहीं लग सका.  लेकिन कोई भी उस चोर के बारे में क्यों नहीं सोचता! वह बेचारा तो बापू का चश्मा चुरा कर कितना पछता रहा होगा? क्योंकि न तो वह उसे पहन सकता है, न बेच सकता है!! पहनेगा तो बापू की नज़र से दुनिया देखनी पड़ेगी!! और बेचेगा तो एक ऐसी चोरी के लिए पकड़ा जाएगा, जिसकी लिए न जाने के लिए कितने लोग उसे दुआएं दे रहे होंगे कि अच्छा हुआ बापू का चश्मा गया, आज नज़र गई है... कल नजरिया भी चला ही जाएगा... अब यदि चोर पकड़ा गया तो बापू के नज़रिए के जाने की आस लगाए बैठे तमाम लोगों की बद्दुआएं उसकी झोली में!! मुझे तुमसे सहानुभूति है चोर जी...

काका का एल्बम

कल इसी कविता को किसी और तरीके से लिखा था. आज  'कविता लेखन' पर अग्रज कवि-आलोचक नन्द भारद्वाज जी के मार्गदर्शन के बाद कल की कविता 'जय भीम कावडे काका, जय भीम' को कुछ इस तरह लिखा है. आप सुधीजनों से  तवज्जों चाहता हूँ ...


तनि-तनि से पंख हैं उस सफ़ेद तितली के जिन्हें मासूमियत से हिलाकर प्रदर्शित करती है वह अपना प्रेम हालांकि सैकड़ों पैरों वाला वह जंतु उसे कतई नहीं पसंद  लेकिन क्या करे काका के एल्बम में उसके लिए जगह ही यहाँ थी
काका के एल्बम में नाचते हैं मयूर गूंजते हैं भौरे सहमकर टंगा पड़ा है एक सफ़ेद उल्लू  और माजरे को समझने की कोशिश करता एक हिरन शावक इधर ही देखर रहा है
कुछ फूल और पत्तियों  और किस्म-किस्म की औषधियों की गुफ्तगूँ  आपको सुननी ही पड़ेगी साहेबान यदि आप देखेंगे काका का एल्बम तो
काका के एल्बम में सबकुछ अच्छा-अच्छा और सुन्दर नहीं है कुछ बदसूरत और वीभत्स चेहरे भी देखने पड़ेंगे आपको ये उन चेहरों के अंतिम अवशेष हैं जिन्हें कुचलकर भाग गए हैं बस-ट्रक जैसे अति भारी वाहन या कर-जीप जैसे कम वजनी वाहन  या फिर मोटर साइकल या स्कूटर जैसे हल्की गाड़ियाँ  
इन चेहरों की पहचान बनाए रखने की ठोस वजह है…

जय भीम कावडे काका, जय भीम

गाड़ेघाट* के मुहाने पर आपको देख विस्मित होती आँखें आत्मीयता से भर उठेंगी जैसे ही आप उनसे कावडे काका के घर का पता पूछेंगे
यों गाड़ेघाट पूरे नागपुर जिले में 'अम्मा की दरगाह' के लिए मशहूर है लेकिन इधर कावडे काका की वजह से इस गाँव का नाम कई लोगों के लिए आदरणीय हो गया है
५६ साल पुरानी देह में रहते हैं कावडे काका लेकिन उनके उत्साह और बुद्धि और मेधा और हिम्मत का  उनकी देह से कोई जोड़ बैठ ही नहीं पाया अब तक इसलिए आप देखते ही कहेंगे काका आप तो ३८-४० से ज्यादा के नहीं लगते
गाड़ेघाट अम्मा की दरगाह और कावडे काका के अलावा भी कुछ अन्य वजहों से जाना जाता है इस हल्क़े** में जैसे यहाँ के रेती घाट ठेकेदार यहाँ से रेती निकालते समय इतने तल्लीन हो जाते हैं कि हर साल चार फुट की तय जगह की बजाय १२-१५-१८-२० फुट तक खोह करते हैं और आराम से रेती ले जाकर पैसा कमाते हैं रायल्टी चार फुट की, बाकी का 'माल' अपने बाप का ठेकेदारों की इस प्रवृति को
तहसीलदार और कलेक्टर की स्थायी हरी झंडी मिली हुई है
ठेकेदार की करतूतों की सजा भुगतती है नदी कन्हान नदी कि जिसके किनारे बसा है गाड़ेघाट और इसी गाड़ेघाट में है अम्मा की दरगाह और कावडे का…

इन कविताओं को पढ़ा जाए...

१९९५ की सर्दियों की एक सुबह ननिहाल में बैठे-बैठे 'फूट' पड़ीं ये कविताएं. आकार में ये कविताएं अत्यंत छोटी हैं, लेकिन एक ही 'मूड' में लिखी गईं हैं. ये सभी कविताएं 'सो जाओ रात' संग्रह में संकलित हैं. आज इन्हें बहुत सालों बाद पढ़ रहा था, तो लगा कि आप मित्रों से भी इन्हें साझा किया जाये...
प्रश्न
दर्पण निहारने का कार्यक्रम **
उत्तर
जिसे ढूँढा जाए **
इच्छा
स्वाद की तलाश में पीड़ा भोगने की एक क्रिया **
जीवन
आड़ी-टेढ़ी लकीरों का एक लटकता गुच्छ
जिसे खींचने पर गाँठ पड़ने का भय सदैव बना रहा **
माँ
जो जानती है हमारे विषय में वह सब जो हम नहीं जान पाते कभी
जो हमें दे सकती है वह सब जिसके आभाव में स्वयम वह कलपती रही है ता-उम्र
जो सदा हमें छिपाने को तैयार हम चाहें तो भी, न चाहे तो भी
जिसकी उंगलियाँ जानती हैं बुनना जिसकी आँखें जानती है डूब जाना जिसके स्वर में शैली और गुनगुनाहट हो
जो हमेशा चादरों की बात करे. **
पिता
उन्हें नहीं मालूम उनकी किस उत्तेजना में बीज था
वे घबराते हैं यह जानकार कि काबिलियत  उनके ही अस्तबल का घोड़ा है संतति को लायक बनाने के लिए सारी तैयारियां कर चुके हैं वे
और यह सोचकर ही खुश हो लेते हैं कि उनके बच्…

टूट जाना ही बेहतर...

( सुभाष तुलसीता का रेखांकन  )
हालाँकि  टूटने के बाद  बिखरने का डर बना रहता है,  लेकिन मैं सोचता हूँ  कि टूट ही जाऊं तो बेहतर होगा 
आखिर कब तक बिखरने के डर से न टूटने का अभिनय करता फिरूंगा
आप मित्रों से अनुरोध है कि मैं बिखरने लगूँ यदि, तो कृपया मुझे समेटने की कोशिश बिलकुल न कीजियेगा. हालाँकि मैं जानता हूँ किसी के बिखराव का चश्मदीद होना आसान नहीं होता हमारा अहम् हमें न बिखरने की ही इजाज़त देता है और न ही बिखराव के दर्शक होने की लेकिन कद्रदानों-मेहरबानों  मुझे बिखरने देना टूट-टूट कर बिखरने देना चूर-चूर होकर बिखरने देना फूट-फूट कर बिखरने देना
मत रोकना मत टोकना हाँ नज़र जरूर रखना कि कोई मेरे बिखराव का अफसाना न बना ले कोई मेरे बिखराव को अपने शिगूफों का ठिकाना न बना ले कोई मेरे बिखराव पर अपनी रोटियां न सेक ले कोई मेरे बिखराव की बोटियाँ न नोच ले
ये क्या मैं तो सच-मुच टूट रहा हूँ...!!! ???

क्यों जरूरी है फाल्गुन विश्व का प्रकाशन?

इसलिए जरूरी है फाल्गुन विश्व का प्रकाशन -
- ताकि प्रतिरोध और असहमतियों की आवाजों के लिए जगह बची रहे.
- ताकि रूबरू होता रहे आम पाठक अपने समय-सत्ता-समाज से.
- ताकि मुझे जीने का मकसद मिले.
- ताकि तुम्हें जीने का मकसद मिले.
- ताकि बेहतर दुनिया बनाने का हमारा सपना आकार पाए...
- ताकि संभावनाएं अशेष रहें
- ताकि विडम्बनाएं मुक्ति पायें
- ताकि समता और इन्साफ हमारे समाज का चरित्र बनें
- ताकि हर कोई बन सके अपना दीपक स्वयं, ''अत्त दीपो भव"
आइये मिलजुलकर इस अभियान को आगे बढ़ाएं
फाल्गुन विश्व पढ़े-पढ़ाएं
एक अंक - मूल्य १० रूपए मात्र
सालाना ग्राहकी महज १०० रूपए में 
आजीवन सदस्यता शुल्क - १,००० रूपए मात्र
अंक पाने के लिए editorfalgunvishwa@gmail.com पर मेल करें.
सालाना ग्राहक अथवा आजीवन सदस्य बनने के इच्छुक सीधे फाल्गुन विश्व के खाते में अपनी राशि जमा करा सकते हैं.  खाते का विवरण इस प्रकार है. फाल्गुन विश्व खाता क्रमांक 3122623992  सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया शाखा कन्हान, नागपुर
कृपया बैंक में राशि जमा कराने के पश्चात अपना नाम और पता मोबाइल क्रमांक 09372727259  पर एस.एम्.एस. करें.
आइये हमकदम बनें, हमनवा बनें बेहत…

क्योंकि कामठे जी सोते रहे, इसलिए सैकड़ों लोग जागते रहे...

अच्छा हुआ आप यहाँ नहीं हैं, हमारे साथ. अरे साहब हम इस समय महाराष्ट्र की उपराजधानी यानी नागपुर जिले के एक छोटे से गाँव कन्हान में हैं. कन्हान के तुकराम नगर मोहल्ले में किराए से रहते हैं अपन. यदि आप भी कल मेरे साथ यहाँ होते, तो रात भर आपको जागना पड़ता. जी जागना इसलिए पड़ता क्योंकि कामठे साहब सोये हुए थे.  अब ये कामठे साहब के सोने की वजह से अपने जागने का क्या मतलब? यही पूछना चाहते हैं न आप? तो साहेबान  जान लीजिये की कामठे साहब वो शख्स हैं की जिनकी मर्जी की बिना इनदिनों रातों में सो पाना नामुमकिन हैं. कामठे साहब सोते रहेंगे तो मच्छर आपके यहाँ अपने पूरे कुटुंब के साथ डेरा डाल देंगे. बारिश का मौसम है साहेबान, उमस भी इनदिनों क्या कमाल की होती है, फिर चाहे रात हो या दिन, उमस तो अँधेरा-उजाला देखकर होती नहीं. कामठे साहब, हमारे 'इलाके' के कतिपय गणमान्य 'लाइनमैनों' में से एक 'लाइनमैन' हैं!! जी लाइनमैन!!! लाइनमैन यानी ऐसा व्यक्ति जो आपकी रात खराब कर सकता है, आपके सपनों को चकनाचूर कर सकता है.  पिछली रात यानी १५ जून की रात पूरी दुनिया चंद्रग्रहण का मजा ले रही थी. ये गलती अपन ने भ…

एक जून को फाल्गुन विश्व की पहली वर्षगाँठ है

आगामी एक जून को फाल्गुन विश्व की पहली वर्षगाँठ है. यों १७ जुलाई २००९ को फाल्गुन विश्व एक साप्ताहिक के तौर पर पाठकों से रू-ब-रू हुआ था, लेकिन एक सांस्कृतिक-वैचारिक पत्रिका को हर सप्ताह सिर्फ उत्साह और जिद के भरोसे नहीं प्रकाशित किया जा सकता. मार्च २०१० में पत्रिका बंद हो गई. लेकिन जून २०१० में हमने मासिक के तौर पर वापसी की. रंगीन आवरण में हमने फाल्गुन विश्व का प्रवेशांक प्रकाशित किया. महज ५०० प्रतियां छपी गई. इससे ज्यादा छपने का पैसा ही नहीं था. प्रवेशांक को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया लेकिन जुलाई का अंक छापने के लिए जरूरी धन एकत्रित नहीं हो पाया, लिहाजा जुलाई और अगस्त का अंक संयुक्त रूप से प्रकाशित करने का निर्णय हुआ. लेकिन अगस्त में भी जरूरी धन में कमी रह गई, सो जुलाई-अगस्त और सितम्बर का संयुक्त अंक प्रकाशित हुआ. लेकिन आवरण ब्लैक-वाइट रहा. इस बार भी प्रतियां ५०० ही छपी गई. पाठकों ने इस अंक को भी तहेदिल से स्वीकार किया.

अक्तूबर में कुछ मित्रों के सुझाव पर सदस्यता मुहिम चलाई गई. महज दस रुपये में साल भर पत्रिका देने की बात हुई. यह योजना बनी की यदि देश भर में पत्रिका के दस हज़ार पाठक इस मुह…

ये हैं सबीहा खुर्शीद, नहीं डाक्टर सबीहा खुर्शीद.

ये हैं सबीहा खुर्शीद, नहीं डाक्टर सबीहा खुर्शीद. नागपुर के पास एक छोटे से कस्बे कामठी में रहती हैं. सबीहा ने हाल ही 'उर्दू में माहिया निगारी' पर पी.एचडी. हासिल की है. इस विषय पर अनुसंधान करने वाली वे देश और दुनिया की पहली शख्सियत हैं. पंजाब में लोकगीत के तौर पर माहिया की बड़ी प्रतिष्ठा है. लेकिन पंजाबी में माहिया के आगाज़, इर्तेका और उर्दू में इसके इब्तेदा के साथ उर्दू में होने वाले वजन और मेज़ाज़ को सबीहा ने अपने अनुसन्धान का विषय बनाया. उन्होंने माहिए के लिए किये जाने वाले तजुर्बात को भी निशान ज़द किया और माहिया कहने वालों को उनके इलाकाई हवाले से उजागर किया है. सबीहा के अनुसन्धान में मगरीबी दुनिया के माहिया निगार, हिन्दुस्तान के माहिया निगार, पकिस्तान के माहिया निगार तफसील से अपनी जगह बनाए हुए हैं. उर्दू माहिए के बानी हिम्मत राय शर्मा और इस तहरीक के रूह-ए-रवां हैदर कुरैशी तक, सभी से सबीहा आपका परिचय पूरी शिद्दत के साथ कराती हैं.
सबीहा एक बुनकर के घर पैदा हुईं और तमाम जद्दोजहद के साथ अपनी शिक्षा को उन्होंने एक मुक्कल मुकाम तक पहुंचाया है. अपने घर में पढ़ने-लिखने का जुनून रखने…

कहाँ हो तुम?

अब तो तुम्हारी छवि भी स्मृतियों से धूमिल होने लगी है
दिन में एक बार
उस मोड़ से गुजरना ही होता है मुझे
जहां तुम्हें हँसते देखकर
गिर पड़ा था वह सावंला बाइक सवार अपनी होंडा सीडी हंड्रेड से
उस पुल पर से भी
जिस पर न जाने कितनी ही बार
ठहर गया था समय
तुम्हें गुजरते देख

तुम्हें याद है
मुकेश का वह दर्दीला गीत
'दीवानों से ये मत पूछो...'
जिसकी अंतिम दो पंक्तियाँ
मैं अपनी नाक दबा कर गाता था
और तुम गीत के तमाम दर्द को महसूसने के बावजूद
खिलखिला कर हंस पड़ती थी

हिस्लॉप कॉलेज के प्रांगण
में उस रोज जब
बहुत दिनों बाद देखा था मैंने और तुमने
एक-दूसरे को
तो हमारे चेहरे के लाली चुराकर भाग गया था
सूर्य आकाश में
याद है न तुम्हें!

कैसी हो तुम या कैसी होगी?
इस सवाल का जवाब कभी नहीं ढूँढा मैंने
तुम्हें ढूंढते हुए भी
लेकिन मुझे हमेशा अंदेशा लगा रहता है कि
कहीं घट न रही हो
तुम्हारे मुस्कान की लम्बाई इस कठिनतम दौर में

तुम्हारे चेहरे का हर शफा
मैं लगभग भूल चूका हूँ
सिवाय तुम्हारे मुस्कान के
भूल चुका हूँ सारी बातें
सिवाय उस मौन के जिसे
तुमने कभी नहीं तोड़ा
मैंने तोड़ना चाहा तब भी

एक बार और देख लेने की तमन्न…

वह चाहता है

वह चाहता है  कोई आदमी उसे आदमी न कहे मेले में उस रोज घुमा आया है वह अपनी आदमियत
वह चाहता है  उसे मित्र न माना जाए कितने ही मित्रों की जेबें वह कर चुका है छलनी
वह चाहता है  दुनिया भर के लोग अमन और अधिकार से जीवित रहें मरने पर सभी का अभिवादन किया जाए
वह चाहता है   राह चलती स्त्रियाँ यों ही न जाने दें अपनी खुजली वह चाहता है  समाज अपने बवासीर का इलाज़  जल्द से जल्द कराये
हालांकि सब की तरह आप भी उसे पागल कह सकते हैं वह चाहता है
उसे पागल न कहा जाए न माना जाए

(कविता संग्रह 'सो जाओ रात' से) 

१९ मई १९९६ को मेरी उम्र २२ साल की थी और मेरी दुनिया बदल गई थी.

(मेरी शरीक-ए-हयात सुषमा)
२१ बरस का होते ही मैंने समाज को बेहतर बनाने का सपना देखते हुए घर छोड़ दिया था. साथ मौसेरे भाई हेमधर भी थे. हमने तय किया था की बस चलते जायेंगे सन्यासियों की तरह और समाज को समझते-समझाते समूचा जीवन बिताएंगे. कृष्ण जन्माष्टमी की रात हमने चुपके से घर छोड़ा. दोनों भाइयों ने एक-एक चिट्ठी लिखी और अपने-अपने घर के पूजा-घर में 'भगवान् के सिंहासन' में रख आये. 'भगवान् के सिंहासन' में इसलिए कि हम दोनों के पिता सुबह भोर में ही स्नान कर लेते थे और घंटों पूजा घर में बिताते थे. भगवान् को नहलाते समय सिंहासन साफ़ किया जाता था और उस समय उन्हें चिट्ठियां आसानी से मिल सकती थीं. चिट्ठियों में यही लिखा था कि हम लोग अपनी मर्जी से घर छोड़ कर जा रहे हैं और हमें ढूंढने की कोई कोशिश न की जाए... अब से यह दुनिया ही हमारा घर है...  रात बारह बजे घर से निकल कर हम दोनों अधाधुंध पैदल चलते रहे... सुबह होते-होते हम लोग लगभग साठ किलोमीटर पैदल चल चुके थे. महाराष्ट्र बार्डर पार कर हम दोनों मध्यप्रदेश की सीमा में आ गए थे. अपने ज़रा से कानूनी ज्ञान से हम इतना जानते थे की यदि पुलिस की मदद स…