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मलयालम के प्रख्यात कवि कुरिपुज्झा श्रीकुमार (के. श्रीकुमार) की कविताएँ

१). छुट्टी

हे भगवान !
गणित के अध्यापक
छुट्टी पर होने चाहिए

गणित अध्यापक आए
डाँट भी पड़ी

भगवान छुट्टी पर थे।


२).  सिद्धांत

कविता पढ़ी
जरा भी समझ में नहीं आयी

तब इस सिद्धांत का जन्म हुआ
"पढ़ने पर जो समझ न आए
वही होती है कविता।"


3).  भगत सिंह

भगत सिंह फांसी पर चढ़ाए गए
फांसी पर लटक कर वे मर गए
क्यों?
भगत सिंह नास्तिक थे क्या?
अगर वे नास्तिक थे
तो मैं भी नास्तिक हूँ।


४).  पंख

भीतर एक पंख है
नील चिड़िया के आँसूं से भीगा हुआ एक पंख
मेरे खून में डुबकी लगाते हुए
पंख एक दर्दीला गीत लिख गया मेरे चेहरे पर
पंख को तेज झोंका उड़ा ले गया
मैं अकेले बैठ रोने लगा।


५).  अवार्ड

शिक्षक वासुकुट्टी को
सर्वश्रेष्ठ शिक्षक का अवार्ड मिला
गाजे-बाजे के साथ उनको लाया गया
उस समारोह में जहाँ उनका सत्कार किया जाएगा

आनंदन शिक्षक ने कहा कि
अवार्ड पाने के लिए शिक्षक वासुकुट्टी ने जो किया है
उसके लिए एक और अवार्ड दिया जाना चाहिए उनको


६).  धार्मिक आख्यान 

कंप्यूटर ऑफ किया
मिक्सी में पीसकर तैयार
और ठंडा करने के लिए फ्रीज में रखे शरबत को पीकर
सिलाई मशीन से सिले कपडे पहनकर
बिजली के बल्ब के रोशनी में
माइक पकड़
वह विज्ञानं के ख…

देश की भाषा : एक सपना

एक विशाल स्टेडियम से उस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण देश भर के टेलीविज़न चैनलों पर जारी था, जिसे मैं सपने में देख रहा था। कार्यक्रम इतना भव्य था कि स्वप्न में भी मैं पलकें नहीं झपका पा रहा था। खचाखच भरे उस स्टेडियम में सुई रखने भर की भी जगह शेष न थी। विविध भाषाओं वाले इस देश की एक भाषा चुनने के लिए यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था। स्टेडियम में सभी राजमान्य भाषाओं के लिए उनके राज्य के भौगोलिक आकार के लिहाज से दीर्घाएं बनाई गई थीं। उन दीर्घाओं में, उन-उन भाषाओं के लेखक और विद्वतजन विराजमान थे। सभी अपनी-अपनी भाषा को देश की भाषा बनाए जाने की पुरजोर पैरवी कर रहे थे। कोई संस्कृत को प्राचीन और विज्ञानसम्मत भाषा बता रहा था, तो कोई तमिल और मराठी के पक्ष में तार्किक प्रस्ताव रख रहा था। जिस भी लेखक या विद्वान को अपनी बात कहना होता वह स्टेडियम के बीचो-बीच बने मंच पर आता, अपना नाम, अपनी भाषा बताता और तब अपनी भाषा के पक्ष में अपना तर्क प्रस्तुत करता। देश की सभी राजमान्य भाषाओं के प्रतिनिधि बोल चुके थे। संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से आए पर्यवेक्षकों ने पूछा, "क्या कोई और है जो इस स्टेडियम में है और…

लघु कथा

थप्पड़ 
यह उस समय की बात है जब शहरों में नए-नए कंक्रीट के जंगल उगने शुरू हुए थे। सड़क के किनारे के पेड़ इसलिए काट दिए गए थे कि उनसे कंक्रीट के तीन, पांच, सात मंजिला इमारतों की शोभा बिगड़ती थी। घरों के भीतर के पेड़ इसलिए काटे गए थे कि उनसे इन इमारतों को ऊँचा बनाने में अवरोध होता था। लेकिन हथेली की पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती है, सो शहर में ऐसे लोग भी थे, जो न अपने घरों को इमारत बना रहे थे, न ही घर के सामने अथवा भीतर के पेड़ काट रहे थे।  मैं एक रोज शहर के इसी वृक्ष-वल्लरी मोहल्ले से गुजर रहा था। मार्च का महीना था। इस मोहल्ले में तरह-तरह के पेड़ थे। आम के वृक्षों पर बौर थी। अशोक के वृक्ष पतझड़ से त्रस्त थे। गुलमोहर खिले-खिले झूम रहे थे। बोगनविलिया मानों इस मोहल्ले का तोरण थी। एक घर के सामने सात-आठ वर्ष की एक बच्ची उछल-उछल कर अमरूद तोड़ने का प्रयास कर रही थी। उस घर के सामने अमरूद का पेड़ कच्चे-पके अमरूदों से लदा पड़ा था और सिर्फ एक ही बच्ची अमरूद खाने को उतावली थी! मोहल्ले के बाकी बच्चे कहाँ थे? हो सकता है मोहल्ले में बच्चे ही न हों? या फिर हो सकता है उन बच्चों के माता-पिता ने उन्हें…