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सापेक्ष - निरपेक्ष

धरती अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य अपनी धुरी पर। धुरी पर घूमने के लिए आकार का वर्तुल होना यानी गोल होना ज़रूरी है। गोल की बजाय चौकोना-तिकोना हुआ तो धुरी लगाएंगे कहाँ! तब तो कोने परस्पर काबिलियत को लेकर ही झगड़ते रहेंगे और धुरी बेचारी लगने के इंतज़ार में पड़ी-पड़ी सड़ जाएगी। लेकिन आकार भर गोल अथवा वर्तुल होने मात्र से इस बात की कतई गारंटी नहीं कि आपमें धुरी लग ही जाएगी। मैंने कइओं गोल-गोल, इधर-उधर ढनगते-लुढ़कते देखे हैं। कई गोल तो धुरी के इंतज़ार में दुनिया से ही गोल हो जाते हैं। पता नहीं कि धरती, सूर्य आदि नवग्रहों ने धुरी का जुगाड़ कैसे और कहाँ से किया, लेकिन भूगोल और विज्ञान की किताबें लिखी जाने के पहले से ही अपनी-अपनी धुरी पर ये सारे ग्रह घूम रहे हैं, तभी तो इन किताबों के लेखकों ने इनका जिक्र इनकी धुरियों के साथ किया। मेरे गोपनीय सूत्रों के मुताबिक धरती, सूर्य आदि नवग्रहों ने दुनिया भर के धर्म-ग्रंथों के लिखे जाने के बाद और गैलेलियो नामक उस शख्स के जन्म के बीच में किसी समय अपने-अपने लिए धुरी का जुगाड़ किया होगा, काश कि इन गोल-मटोलों ने धुरी का जुगाड़ धर्म-ग्रंथों के लिखे जाने के …