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March, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक फूल की बात...

बगीचे में एक फूल खिला. हवा के झोंकों ने उसकी खुशबू चहुँ दिशि बिखेर दी. भौरों और तितलियों में तो जैसे उस फूल की करीबी पाने की होड़ लग गई. बगीचे में आने वाले मनुष्यों को भी फूल की ताजगी और खुशबू ने आकर्षित किया. जो भी उस फूल को देखता, देखता ही रह जाता. उस शाम बगीचे में उस फूल को देखने के लिए शहर भर की भीड़ आयी. कुछ उत्साही नौजवानों ने उस बगिया के माली की तारीफ़ की. नौजवानों को तारीफ करते देख, बुजुर्गों ने भी माली की तारीफ की. बुजुर्गों को तारीफ करते देख, बच्चों ने भी माली की तारीफ की. तारीफ की बात जब एक कलाकार ने सुनी, तो उसने भी फूल को एक नज़र देख, माली के सम्मान में कसीदे पढ़े. राजनीतिक दलों ने भी माली को अपने-अपने मंच पर सम्मानित करने की घोषणा की. एक व्यक्ति ने माली की इसलिए खिचाई की कि उसके हिसाब से फूल सही ढंग से नहीं खिल पाया था और क्योंकि माली ने समुचित तकनीक से उस फूल के पौध की देखभाल नहीं की थी, इसलिए फूल समय से पहले और कम-खूबसूरती में खिल पाया था, इस वजह से उस फूल को उतना 'अटेंशन' नहीं मिल पाया, जिसका वह फूल हक़दार था. इस तरह कुछ मनुष्यों ने फूल को भुलाकर माली की तारीफ…

चंद्रकांत देवताले : अंतर्बाह्य कवि - प्रफुल्ल शिलेदार

हिन्दी कवि चंद्रकांत देवताले को आज 26 मार्च को नाशिक के यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विश्वविद्यालय के कुसुमाग्रज अध्यासन की ओर से 'कुसुमाग्रज राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार 2011'प्रदान किया जाएगा। वरिष्ठ कवि एवं अनुवादक विष्णु खरे उन्हें यह पुरस्कार सौपेंगे। पिछले महीने ही श्री देवताले को ग्वालियर में प्रथम कविता समय सम्मान से नवाजा गया था। हमारे समय के इस 'वरिष्ठ' लेकिन महत्वपूर्ण कवि की कविताओं की समर्थता का खाका खींच रहे हैं, चर्चित युवा मराठी कवि प्रफुल्ल शिलेदार। मूल मराठी से अनुवाद किया है युवा हिन्दी कवि पुष्पेन्द्र फाल्गुन ने।
पिछले पचास साल से भी अधिक समय से कविता लिख रहे चंद्रकांत देवताले उम्र के उस मुकाम पर हैं, जिसे बुजुर्गियत कहा जाता है, और जहाँ पहुँचते ही आम लेखक कवि अपनी 'वरिष्ठता' पर धन्य हो उठते हैं और अपनी सर्जनशीलता भूलकर आर्शीवाद देने की भूमिका में जम जाते हैं। खुद अपने विघटन के चश्मदीद होते हैं और अपनी महिमा-मंडन की कोशिश में जुटे रहते हैं। लेकिन चंद्रकांत देवताले इस तरह की बातों से चिढ़ते हैं। 2010 में उनका ग्यारहवां कविता संग्रह 'पत्थ…

कविता

वह एक अट्ठाइस-तीस के दरमियानी नौजवान था। वह मुझे रोजाना मिलता बाग में फूलों को देखकर मुस्कुराता हुआ। मैं जब पहुँचता वहाँ तो वह बस मुस्कुरा रहा होता मैं जब लौटता वहाँ से तो भी वह बस मुस्कुरा रहा होता। एक दिन बगीचे के चौकीदार ने बताया 'वह आँखों से नहीं देख सकता' मैंने देखा, वह उस समय भी देख रहा था फूलों को। मुझे करीब पाकर वह बोला, 'मुस्कुराने के लिए भला आँखों का भी कोई काम है' उसकी बात सुनकर मैं जोर से हँस पड़ा था इतनी जोर से कि मेरी हँसी की आवाज सुनकर उसने अपनी मुस्कुराहट को और चौड़ा कर लिया था और फिर मेरे साथ वह भी जोर - जोर से हँसने लग पड़ा था इतनी जोर से कि बगीचे का बूटा-बूटा मुस्कुरा पड़ा था।
बगीचे जाने के नाम से ही अब मेरे लबों पर कौंध पड़ती मुस्कुराहट वहाँ वह दिखाई देता तो मुस्कुराहट हँसी में बदलती और फिर रोज-रोज हमारे साथ मुस्कुराती यह दुनिया।
एक दिन मैंने उसे बताया कि मैं लिखता हूँ कविता तो वह उदास हो गया वह उदास हो गया तो मैं उदास हो गया मैं उदास हो गया तो मेरी कविता उदास हो गई फिर हमारी उदासी से उदास हो गई यह दुनिया और एक दिन उदास-उदास स्वर में अत्यंत वेदना के साथ उसने पूछा मुझसे '…

रंग-आनंद

१० वर्षीय दिया मिश्र की पेंटिंग 'कलर्स एंड कलर'
यह समय का तिलिस्म है कि जन्मजात कौशल कि मुस्कुराते ही मेरे खिल उठते है जहान् के सारे रंग।
इक तुम्हारे प्यार का रंग इक तुम्हारे धिक्कार का रंग इक तुम्हारे इसरार  का रंग इक तुम्हारे अबरार का रंग
इक तुम्हारे हौंसलों का रंग इक तुम्हारे मौसमों का रंग इक तुम्हारे चोचलों का रंग इक तुम्हारे जुल्मों का रंग
इक तुम्हारे खेलने का रंग इक तुम्हारे धकेलने का रंग इक तुम्हारे खोलने का रंग इक तुम्हारे बिखेरने का रंग
इक तुम्हारे खुशी का रंग इक तुम्हारे हँसी का रंग इक तुम्हारे कुशी का रंग इक तुम्हारे फँसी का रंग
इक तुम्हारे ताकत का रंग इक तुम्हारे हिकारत का रंग इक तुम्हारे लानत का रंग इक तुम्हारे सियासत का रंग
इक तुम्हारे बोझ का रंग इक तुम्हारे सोच का रंग इक तुम्हारे सोझ का रंग इक तुम्हारे मोच का रंग
और ये सारे रंग बमक उठते हैं जब तुम भी मुस्कुराते हो, मेरी मुस्कुराहटों में!
- पुष्पेन्द्र फाल्गुन

मेरा सपना तो देर तक चला पापा...

आज रविवार, स्कूल से छुट्टी का दिन, छोटी बिटिया सुबह देर तक सोती रही, उठी तो मैंने कहा, 'कितना सोती हो तुम सिया, तुम्हारी दोनों बहनें कब से उठ गयीं...' मेरी बात काटते हुए सिया ने कहा, 'उनका जल्दी ख़त्म हो गया होगा, लेकिन मेरा सपना तो देर तक चला पापा...'

परछाई

हवा के रुख समय के साथ प्रगति और प्रणति के खिलाफ उगती पनपती मचलती और इठलाती है परछाई
इतिहास में  किसी भी परछाई का जिक्र नहीं मिलता।
(शीघ्र प्रकाश्य कविता संग्रह 'चेतुल' से)

रोशनी

आग में नहीं भूख में होती है रोशनी
आशाएँ कभी राख नहीं होती
बालसुलभ रहती है हिम्मत, ताउम्र
जरूरत अविष्कार की जननी नहीं, पिता है
लौ लगे जीवन ही अँधेरे का रोशनदान बन पाएंगे।
(शीघ्र प्रकाश्य कविता संग्रह 'चेतुल' से)

अनुभव

यदि कोई अनुभव आपके भीतर जिज्ञासा पैदा नहीं करता तो सावधान क्योंकि जिसे आप अनुभव समझ रहे हैं वह दरअसल में एक सीख मात्र है
एक सीख, एक सबक बस
और कई बार जीवन में हम सीख और अनुभव का फर्क नहीं समझते और सीख को, सबक को ही अनुभव मान बैठते हैं और उसके आधार पर अपने फलसफे भी गढ़ते जाते हैं सिद्धांत भी रचते जाते हैं सीख में ही इतने तल्लीन और गुम हो जाते हैं की उसे ही अनुभव सिद्ध करने में अपना सारा कौशल, सारी क्षमता लगा देते हैं अपने इर्द-गिर्द देखिए आपको ऐसे तमाम लोग मिल जाएँगे और दर्पण में देखेंगे तो.....
इसीलिए अनुभव और सीख का फर्क समझिए अनुभव वही है,  जो आपके भीतर  उसी विषय के बारे में  और जिज्ञासा पैदा करे  कि जिसका आपने अनुभव किया है.

सिया की 'गुड़िया'

मेरी सबसे छोटी बिटिया सिया दहलीज़ पर खड़ी जाने क्या सोच रही है, क्या वह अपने भवितव्य को लेकर चिंतित है! उसके पैरों पर सूर्य किरणें कुछ इस तरह से बिखरी हैं कि मानों उसे रश्मियों के रथ पर लेकर परी-लोक जाना चाहती हों. बिटिया भी तो 'बैग' लेकर तैयार है और उसके 'बैग' से यह कौन झाँक रहा है!, ये तो सिया की 'गुड़िया' है...

इन दिनों उदास हैं अम्मा.....

पिछले पच्चीस साल से अम्मा चाय पिला कर औरों के जीवन में मिठास घोल रही हैं. उनका जीवन हमेशा ही कटु अनुभवों से भरा रहा. पति लम्बे समय तक बीमार रहे और एक दिन बीमारी में ही गुज़र गए. जवान लड़के ने चालीस की उम्र में आत्महत्या कर ली. बचे एक लड़के को जुएँ की लत लगी हुई है. लेकिन इस सबके बावजूद अम्मा की चाय का स्वाद जस का तस बना रहा. मगर इनदिनों उदास हैं अम्मा, चाय का गिलास थमाने से पहले हर किसी से पूछती हैं, 'क्या सबकी आँखों का पानी मर गया है भैया...'

अनुग्रह

मेरी ही तरह हर पुरुष के वजूद की वजह एक स्त्री है.
मेरी ही तरह हर पुरुष जन्मा है अपनी माँ की कोख से
और जन्मते ही उसने पिया है माँ का दूध
एक स्त्री के इस अनुग्रह की याद हम पर बनाए रखती है  ममता की छांह ताउम्र फिर चाहे माँ रहे या न रहे
(शीघ्र प्रकाश्य कविता संग्रह 'चेतुल' से)

संभावना

भावनाओं से नहीं संभावनाओं से जीवन संचालित होना चाहिए. 
जीवन में संभावनाएं होंगी तभी बेहतरी के लिए, बेहतरी की ओर हमारे कदम उठेंगे-बढ़ेंगे. 
संभावना क्षमताओं को कुंद नहीं होने देती,  उन्हें क्षीजने नहीं देती. 
संभावनाओं की कोई जात नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, कोई वर्ण नहीं होता, कोई गोत्र नहीं होता. 
संभावनाएं बस संभावनाएं होती हैं. 
हर संभावना अपनी कोख में एक और संभावना लिए....सदैव संभावित रहती है. . संभावनाओं से प्रेम करने पर ही अपनी विराटता का एहसास होता है. 
संभावनाओं के प्रेम में पड़ने पर ही हम अपने भीतर उदात्तता और उदारता को प्रवाहित कर पाते हैं. 
संभावना हमें इमानदारी और बेईमानी की कारोबारीय परिभाषा से मुक्त कराती है. 
संभावना हमारे भीतर से हर किस्म की फांक मिटाती है.
संभावना अपने-पराये के भेद से निजात दिलाती है.
संभावना हमें जीवन बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती है, अपना ही नहीं, अपनों का, समूची कायनात का, समूची प्रजातिओं का, जड़ का, चेतन का.
संभावना हमें चैतन्य बनाती है,  संभावना हमें सर्जक बनाती है, संभावना हमें रचनाशील बनाती है,  संभावना हमें गतिशील बनाती है,  संभावना हमें प्रगतिशील बनाती है…

डरपोक हम

कितना डरते हैं हम, हर बात पर, हर समय, बस डर और डर  ऐसा करने में डर, वैसा करने डर यह करने में डर, वह करने में डर ऐसा बोलने में डर, वैसा सुनने में डर यह बताने में डर, वह पूछने में डर यह दिखाने में डर, वह देखने में डर उफ्फ, कितना डरते हैं हम और हर क्षण बस मुर्दा होकर जीते हैं मुर्दा जीवन, मुर्दा इंसान, मुर्दा इंसानियत
गब्बर अंकल दशकों पहले कह गए हैं 'जो डर गया, समझो मर गया'
हालांकि गब्बर अंकल भी मर गए हैं लेकिन डरते हुए नहीं मरे जो डरता है, वह हर क्षण मरता है हर कदम पर मरता है, हर शै मरता है
मौत से पहले मरना बंद करो अब डरना बंद करो
सोचो कि हमारी तरह ही यदि ये पेड़ डरते तो बताओ क्या कभी ये बढ़ते फलते-फूलते छाया देते-ऑक्सीजन देते
सोचो कि हमारी तरह ही यदि ये नदी डरती तो बताओ क्या ये कभी बढ़ती सागर से मिलती और हमारा जीवन क्या इतना पानीदार हो पाता
डर हमारी प्रगति रोकता है डर हमारी नियति रोकता है
डर हमें यथास्थितिवादी बनाता है डर हमें फरियादी बनाता है
डरना बुरा नहीं डर से चिपके रहना बुरा है डर से उबरने की कोशिश ही नहीं करना बुरा है
जो डर से उबरने की रंचमात्र भी कोशिश करते हैं एक पल में ही वे डर को डरा रहे होते हैं
आइये ड…

ख्वाब

तुम्हें देने के लिए मेरे पास है एक ख्वाब
एक ख्वाब जिसका मेरी नज़रें कर रही हैं बोसा
एक ख्वाब जिसका तुम्हारी नज़रें कर रही हैं बोसा

मुक्ति की कामना

दाल दरते हुए सोचती हैं संजय गनोरकर के शिल्प की सारी महिलायें कि पुरुष लिंग ही असल में उनके समस्त विपदाओं की जड़ है और यह भी सोचती हैं कैसे इस जड़ से पाएं  मुक्ति
दाल दरती हुई महिलाओं को देखकर मैं सोचता हूँ कि क्या वे सचमुच यही सोच रही होंगी.....
(संजय गनोरकर अमरावती में रहते हैं और देश के प्रतिष्ठित शिल्पकार हैं)

कि कहीं बड़ी होती है भीतर की दुनिया

बाहर की दुनिया से कहीं-कहीं बड़ी होती है भीतर की दुनिया
भीतर की दुनिया में बड़े होकर ही हुआ जा सकता है इंसान पायी जा सकती है इंसानियत भीतर की दुनिया में बड़े होकर ही बनाई जा सकती है बाहर की दुनिया और बेहतर और सुन्दर और जीने लायक
भीतर की दुनिया में बड़े होकर ही खिला जा सकता है जैसे फूल उड़ा जा सकता है जैसे तितली
भीतर की दुनिया में बड़े होने के लिए अपरिहार्य होती है बाहर की दुनिया और उसकी ज़मीन-उसका आसमान उसकी रोशनी-उसका अँधेरा उसकी हवा-उसका पानी उसकी संस्कृति-उसका इतिहास
जो भीतर से बड़े नहीं होते वे बाहर की दुनिया में रह जाते हैं चार-अंगुश्त छोटे हर समय, हर जरूरत, हर मौके 
(शीघ्र प्रकाश्य कविता संग्रह 'चेतुल' से)

खड़े होना है अपने ही खिलाफ

जब तक नहीं खड़े होंगे हम अपने भीतर के सामंत के खिलाफ तब तक हम बने ही रहेंगे,  मालिक, नौकर, बागी, प्रशंसक या चाहे जो, लेकिन पुख्ता हुक्म के गुलाम हुक्म देने के गुलाम,  हुक्म मानने के गुलाम ज्यादा उदार हुए तो हुक्म देते हुए  बिल्कुल फुसफुसाते हुए लोकतंत्र का हवाला भी दे देंगे ज्यादा समझदार हुए तो हुक्म मानते हुए  हुक्म न मानने वालों की फेरहिस्त का बोसा करेंगे चुप-छिप कर हुक्म देने वाले को हुक्म मानने वाले से श्रेष्ठ समझेंगे या फिर हुक्म मानने वाले को हुक्म देने वाले से बेहतर कहेंगे इस तरह धीरे-धीरे एक दिन  हम भी हो जाएंगे पूर्णकालिक मालिक, नौकर, बागी, प्रशंसक या चाहे जो लेकिन पुख्ता हुक्म के गुलाम इसलिए जिन्हें यह मालूम हैं कि उनके भीतर जरा भी है खिलाफत की आग खड़े होना होगा उन्हें सबसे पहले अपने भीतर के सामंतवाद और अपने भीतर के सामंत के खिलाफ

ये खन्ना जी हैं, नहीं रघुबीर सिंह हैं

नागपुर, संतरा नगरी नागपुर, आदिवासी गोंड राजाओं द्वारा तीन सौ साल पहले बसाया गया एक ऐसा शहर जिसकी तासीर में वह सबकुछ है, जो एक शहर को शहर बनाए रखने के लिए होनी चाहिए. रघुबीर सिंह चालीस की उम्र में नागपुर आये. पिता इन्हें ट्रांसपोर्ट व्यवसायी बनाना चाहते थे, लेकिन वे इस दांवपेंच भरे व्यवसाय से दूर ही रहना चाहते थे. रघुबीर सिंह का परिवार तकसीम के बाद रावलपिंडी से पहले दिल्ली और फिर जबलपुर आया. सभी भाई अलग-अलग पेशों में 'फिट' हो गए. तकसीम के समय तक रघुबीर सिंह, बर्मा में इंजीनिअरिंग मिलिटरी सर्विस में बतौर इंजीनिअर कार्यरत थे. वहाँ ड्यूटी के दौरान हुए हादसे के बाद अँगरेज़ आला अधिकारियों और जापानी सहयोगियों द्वारा दिखाई गई उपेक्षा और बेपरवाही से बगावत कर उन्होंने नौकरी त्याग दी. जबलपुर आये.  पिता ने ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जोड़ लिया. उनदिनों नागपुर मध्यप्रदेश की राजधानी था. रघुबीर सिंह की लारियाँ नागपुर से सामान लेकर जबलपुर आया-जाया करतीं. ब्रेक- डाउन अथवा वसूली के लिए उन्हें भी नागपुर आना-जाना पड़ता. उनदिनों अपनी बुलेट मोटर साइकल से रघुबीर सिंह खन्ना महज साढ़े चार घंटे में लगभग पौन…