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प्रवाह



जैसे दो किनारों के सहारे आगे बढ़ती है नदी 
किनारे न हों तो भटक जाएगी नदी
किनारे नदी के भटकाव को रोकते हैं
और रखते हैं प्रवाहमान उसे

किनारे न हों तो दूर तक कहीं फ़ैल कर नदी ठहर जायेगी...

स्वाभाविक तरीके से गतिमान रहना है तो दो की जरूरत अपरिहार्य है
दो पैर हों तो चाल स्वाभाविक होगी
दो हाथ हों तो उलट-पलट आसान होगी 

उलट-पलट से एक किस्सा याद आया

कोई दस बरस पहले की बात है
मैं एक पारिवारिक शादी में शरीक होने ननिहाल गया था.
वहाँ जो खानसामा थे, उनसे मेरी दोस्ती हो गई.
मैं उनसे अलग-अलग व्यंजन बनाना सीखता...

एक शाम बड़े से चूल्हे पर एक बड़े कड़ाह में वे आलू और कद्दू के सब्जी बना रहा थे
उनके दोनों हाथ में सब्जी चलाने के लिए औज़ार थे...
मैंने उनसे पूछा, 'सब्जी चलाने के लिए दो-दो औज़ार क्यों...'
वे हँसते हुए बोले, 'एक उलटने के लिए एक पलटने के लिए...'
मैंने पूछा, 'उलटने-पलटने!! मतलब?'

मेरे गालों को छूकर उन्होंने कहा, 'जिस दिन उलटने-पलटने की उपयोगिता समझ जाओगे, अपने साथ-साथ औरों का जीवन भी  आसान बना दोगे...' 

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सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि

११ मई २०११ को नागपुर के दीनानाथ हाईस्कूल में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की १५० वीं जयंती के निमित्त युवा कवियों के विचार नामक कार्यक्रम आयोजित हुआ. इसमें श्री अरिंदम घोष, श्रीमती इला कुमार, श्रीमती अलका त्यागी, श्री अमित कल्ला के अलावा मैंने यानि पुष्पेन्द्र फाल्गुन ने भी अपने विचार रखे. मैंने वहाँ जो कहा, वह आपके पेशे-खिदमत है. पढ़कर कृपया अपनी राय से अवगत कराएं...

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कालजयी काव्यकृति गीतांजलि को यदि मुझे एक वाक्य में अभिव्यक्त करना हो तो मैं कहूँगा, 'सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि।' गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के किसी कविता की ही पंक्तियां हैं;
सत्य ये कठिन
कठिनेरे भालोबासिलाम
से कखनो करे ना बंचना
(सत्य तो कठिन है, लेकिन इस कठिन से ही मैंने प्रेम किया, क्योंकि यह सत्य कभी वंचना नहीं करता।)

      गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का समूचा साहित्य फिर चाहे वह काव्य हो, नाटय हो, कथा-कादंबरी हो, हर कहीं सत्य ही उद्भाषित होता है, सत्य ही उद्धाटित होता है, सत्य की ही पक्षधरता है। गीतांजलि में सत्य की पक्षधरता के साथ-साथ सत्य प्राप्ति के उपाय सर्वाधिक प्रखर हैं। प्रखरत…

दूध वाला भैया

वह भैया है या अंकल उसे नहीं पता, बस वह इतना जानता है कि उसका जन्म दूध बेचने के लिए ही हुआ है। बाप-दादा यही करते रहे, सो उसे भी यही करना है। बाप-दादा भी यह जानते थे कि उसे यही करना है, इसीलिए जब वह सातवीं क्लास में अपने मास्साहब की कलाई काट कर घर भाग आया था, तो वे दोनों जोर से हँस पड़े थे।
वह रोज गाँव से शहर आता है दूध बेचने। पहले साइकिल से आता था, लेकिन इधर एक साल पहले जब उसने दाढ़ी वाले नेताजी के मुंह से विकास का नाम और मतलब सुना था, तब से वह रात दिन अपने विकास की फ़िक्र में घुलने लगा था, लिहाजा उसके बाप ने उसकी शादी कर दहेज़ में एक मोटरसाइकिल मांग ली। तो वह अब दूध बेचने मोटरसाइकिल पर गाँव से शहर आता है।
अभी चार-पांच दिन पहले की बात है। अखबार में छपा था कि भीषण गर्मी पड़ रही है। तापमान ४७ डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था। उस दिन, वह अपनी मोटरसाइकिल से दूध देने शहर की और भागा जा रहा था। अचानक शहर से दस किलोमीटर पहले उसकी मोटरसाइकिल भुक-भुक कर बंद पड़ गई। अभी वह नीचे उत्तर कर यह समझने की कोशिश ही कर रहा था कि कल रात दस बजे तक अच्छी चलने वाली मोटरसाइकिल, आज अचानक क्यों बंद पड़ गई कि सड़क से गुज…

मेरी दिनचर्या

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