सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

प्रवाह



जैसे दो किनारों के सहारे आगे बढ़ती है नदी 
किनारे न हों तो भटक जाएगी नदी
किनारे नदी के भटकाव को रोकते हैं
और रखते हैं प्रवाहमान उसे

किनारे न हों तो दूर तक कहीं फ़ैल कर नदी ठहर जायेगी...

स्वाभाविक तरीके से गतिमान रहना है तो दो की जरूरत अपरिहार्य है
दो पैर हों तो चाल स्वाभाविक होगी
दो हाथ हों तो उलट-पलट आसान होगी 

उलट-पलट से एक किस्सा याद आया

कोई दस बरस पहले की बात है
मैं एक पारिवारिक शादी में शरीक होने ननिहाल गया था.
वहाँ जो खानसामा थे, उनसे मेरी दोस्ती हो गई.
मैं उनसे अलग-अलग व्यंजन बनाना सीखता...

एक शाम बड़े से चूल्हे पर एक बड़े कड़ाह में वे आलू और कद्दू के सब्जी बना रहा थे
उनके दोनों हाथ में सब्जी चलाने के लिए औज़ार थे...
मैंने उनसे पूछा, 'सब्जी चलाने के लिए दो-दो औज़ार क्यों...'
वे हँसते हुए बोले, 'एक उलटने के लिए एक पलटने के लिए...'
मैंने पूछा, 'उलटने-पलटने!! मतलब?'

मेरे गालों को छूकर उन्होंने कहा, 'जिस दिन उलटने-पलटने की उपयोगिता समझ जाओगे, अपने साथ-साथ औरों का जीवन भी  आसान बना दोगे...' 

नाव, नाविक और समुद्र

समग्र चैतन्य - पुष्पेन्द्र फाल्गुन मित्र ने कहा, ‘समंदर कितना भी ताकतवर हो, बिना छेद की नाव को नहीं डुबो सकता है.’ तो मैंने एक क...