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सापेक्ष - निरपेक्ष

कुमारी दिया की डिजिटल पेंटिंग 'तिलिस्म'
 

धरती अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य अपनी धुरी पर। धुरी पर घूमने के लिए आकार का वर्तुल होना यानी गोल होना ज़रूरी है। गोल की बजाय चौकोना-तिकोना हुआ तो धुरी लगाएंगे कहाँ! तब तो कोने परस्पर काबिलियत को लेकर ही झगड़ते रहेंगे और धुरी बेचारी लगने के इंतज़ार में पड़ी-पड़ी सड़ जाएगी। लेकिन आकार भर गोल अथवा वर्तुल होने मात्र से इस बात की कतई गारंटी नहीं कि आपमें धुरी लग ही जाएगी। मैंने कइओं गोल-गोल, इधर-उधर ढनगते-लुढ़कते देखे हैं। कई गोल तो धुरी के इंतज़ार में दुनिया से ही गोल हो जाते हैं। पता नहीं कि धरती, सूर्य आदि नवग्रहों ने धुरी का जुगाड़ कैसे और कहाँ से किया, लेकिन भूगोल और विज्ञान की किताबें लिखी जाने के पहले से ही अपनी-अपनी धुरी पर ये सारे ग्रह घूम रहे हैं, तभी तो इन किताबों के लेखकों ने इनका जिक्र इनकी धुरियों के साथ किया। मेरे गोपनीय सूत्रों के मुताबिक धरती, सूर्य आदि नवग्रहों ने दुनिया भर के धर्म-ग्रंथों के लिखे जाने के बाद और गैलेलियो नामक उस शख्स के जन्म के बीच में किसी समय अपने-अपने लिए धुरी का जुगाड़ किया होगा, काश कि इन गोल-मटोलों ने धुरी का जुगाड़ धर्म-ग्रंथों के लिखे जाने के पहले कर लिया होता तो धर्म-ग्रंथों में धुरी का जिक्र मिलता और हमारे परदादा के परदादा के परदादा गैलेलियो महान को बेवक्त मौत को गले न लगाना पड़ता। वैसे मेरे गोपनीय सूत्रों का कहना है कि गैलेलियो जी की जान सिर्फ इसलिए ले ली गई कि धरती का आकार और उसकी धुरी ढूँढने के बाद गैलेलियो, महान धर्मों की धुरी ढूँढने वाले थे, जिससे धर्म की दूकान पर पक्का और मज़बूत ताला लग जाने का खतरा था। कुछ धर्म के जानकारों ने अपने पूर्वर्तियों के इस कृत्य की यह कहकर आलोचना की है कि डर की वजह से गैलेलियो की जान लेने की बजाय उस ताले को छिपाना ज्यादा हितकारी काम होता। 
बहरहाल, जो हो गया वही धर्म की तर्ज़ पर हम गैलेलियो का किस्सा तर्क करते हैं और अपनी मूल धुरी यानी धरती की धुरी पर आते हैं।
धरती की धुरी ने कई सिद्धांतों को जन्म दिया। अपनी धुरी पर घूमती धरती जब सूर्य के रु-ब-रु होती है, तो उस-उस जगह दिन हो जाता है, जिस-जिस जगह सूर्य की नज़र पड़ जाती है। सूर्य की नज़र से तत्काल वंचित क्षेत्रों को रात की आगोश में रहने को मजबूर होना पड़ता है। अफ़वाह तो यह भी है कि जहाँ दिन है, वहाँ रात भी हो सकती है, क्योंकि सारा धुरी का चक्कर है, लेकिन कृपया अफवाहों पर ध्यान न दें, यह सच तो हम सभी जानते हैं कि जिसके हिस्से में पहले धूप आई, उसने रोशनी को अपनी बाँदी बना लिया, जो धुरी के वजह से पहली बार अँधेरे में रह गए, वो अब तक अँधेरे में जीने को अभिशप्त हैं। दिखाई तो यह भी देता है कि धरती, सूर्य आदि नवग्रह अँधेरों के बाशिंदों के साथ अत्याचार करते हैं, जब अँधेरे की बारी आती है उजाला पाने की, तो ये नवग्रह अपनी-अपनी धुरी पर उल्टा घूम जाते हैं।
लेकिन इसी धुरी की वजह से सापेक्षता का सिद्धांत जन्मा। इस सिद्धांत ने अच्छाई-बुराई, सच-झूठ, न्याय-अन्याय, कर्त्तव्य-अधिकार, रात-दिन, आस्तिकता-नास्तिकता सब कुछ को सापेक्षता के दायरे में ला घसीटा। सापेक्षता मतलब  सम्बंधित। सापेक्षता के सिद्धांत की वजह से अच्छा-बुरा, सच-झूठ, न्याय-अन्याय, रात-दिन, कर्त्तव्य-अधिकार, आस्तिक-नास्तिक एक-दूसरे के समधी हो गए। क्योंकि सिद्धांत की लाज रखनी है इसलिए सिद्धान्तकारों ने यह व्यवस्था दी है कि आप अपनी ज़रुरत और हैसियत के मुताबिक़ घराती या बाराती हो सकते हैं, किन्तु यदि आप बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाने हैं, तो आपकी खैर नहीं, सिद्धान्तकारों ने आपको निरपेक्ष होने की सज़ा दी है। निरपेक्ष होने का मतलब ऐसा वर्तुलाकार जिसमें धुरी के लिए अपार संभावनाएं थी, लेकिन धुरी लगवाने की हिम्मत नहीं थी, इसीलिए वह दुनिया में बिन पेंदे का कहलाया।

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अभी चार-पांच दिन पहले की बात है। अखबार में छपा था कि भीषण गर्मी पड़ रही है। तापमान ४७ डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था। उस दिन, वह अपनी मोटरसाइकिल से दूध देने शहर की और भागा जा रहा था। अचानक शहर से दस किलोमीटर पहले उसकी मोटरसाइकिल भुक-भुक कर बंद पड़ गई। अभी वह नीचे उत्तर कर यह समझने की कोशिश ही कर रहा था कि कल रात दस बजे तक अच्छी चलने वाली मोटरसाइकिल, आज अचानक क्यों बंद पड़ गई कि सड़क से गुज…

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जिस रोज़ मैं गलतियां करता हूँ, उस रोज़ मैं दूसरों की गलतियां सहजता से नज़रंदाज़ कर देता हूँ... जिस रोज़ मैं गलतियां नहीं करता, दूसरों की एक गलती भी मुझे नागवार गुजरती है... :) :)) :)))