मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

बंगाली बाबा

कपाल के मूल में धंसी आँखों से
झांकता 
उनका जीवन दर्शन
इस बार भी
उनके पोपले मुंह में
होकर रह गया गोल-गोल, फुस्स-फुस्स

आकाश की धूप को
अपनी छितरी छतरी पर टिकाये
और होंठ के कोर से फिसलती
लार की धार को
गंदले अंगरखे के हवाले करते उन्होंने
नाक से स्वर साध मुझसे पूछा
'बोलो हमी है बंगाली बाबा'

उन्हें
साइकिल की कैरिअर पर बिठा मैंने
पैडलों के सहारे
धकेली थी
उनके घर की तरफ
एक नदी
अंग्रेजों के जमाने का एक पुल
और राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात

रास्ते भर
बीड़ी के 
सुन्न धुएं में मिला
वह
सुनते रहे मुझे
टुकड़ों-टुकड़ों में 
बाउल
रेल की नौकरी छोड़ने की कहानी
और बाबूजी से दोस्ती के किस्से-कोताह

२.
दो शाम
नाश्ते की प्लेट की
जबरन अनदेखी के बाद भी जब
पिताजी को नहीं मिली गंगा
तो उन्होंने मुझे 
बंगाली बाबा को
बुला आने का निर्देश दिया था

दरवाजे पर
बाबा को जूते उतारते देख
पिताजी उछल पड़े थे गंगा से मिलने की कल्पनाकर 
'कब से गायब है गैया मतलब गंगा..'
बाबा के सवाल का जवाब
पिताजी अपने उच्छ्वास से देते हैं

फिर अम्मा
बाबा के आदेश पर
घर भर में दिखाई देने लगीं
आधी पालथी और घुटने पर टिकाये अपने लरजते शरीर को
बाबा फूंकते हैं पीढ़े पर

अक्षत, कनेल के फूल, काजल की डिब्बी
सेंदुर, हरदी, चन्दन और रोली की चौखानी डिब्बी
दो कपूरी और एक बँगला पान का पत्ता
काला तिल और छोटे पात्र में गंगाजल
एक कुश शाखा
और शुद्ध गाय के घी में बूड़ी बाती का दीप
सजता जाता है पीढ़े पर
बाबा की तर्जनी से तय स्थिति में

३.
कनपटी पर
चिपके बालों से टपकता ठंडा पानी
हाफ पैंट के भीतर सुरसुरी पैदा करता है
और मैं
बाएं हथेली में काजल से बनाए गए
गोल परदे पर
हर बार
गंगा को देखने से वंचित रह जाता हूँ

बाबा ताकीद करते हैं पिता से
लड़का चंचल है संभालो इसे
इसके पहले की देर हो
पिताजी का एक झन्नाटेदार तमाचा
पता नहीं कैसे
सुखा देता है मेरे कनपटी पर का पानी

अगली सुबह
पगुराती गंगा के सामने खड़ा कर मुझे
अम्मा
मेरे शरीर पर फिराती हैं बंद मुट्ठी
आख़िरी फेरे के बाद
वह खोलती हैं अपना हाथ बाबा के सामने
बाबा
अम्मा की मुट्ठी से उठाते हैं सिर्फ पांच का नोट
और चिल्लर तमाम

४.
बाबा को घर पहुंचाते वक़्त
मैं जान जाता हूँ कि
उनके घर में हैं दो स्त्रियाँ
उमकी बहू और बेटी
उस रात
सारे सपनों में चुभती रही
बाबा के बेटी की
अदेखी आँखें

बेटी पर लोटते यौवन से चिंतित बाबा
घर के सामने स्थित सिद्ध चौतरे पर
जमाते हैं नौ दिनी मनोकामना सिद्धि डेरा
चौबीस साल के थे तब से
बाबा की सिद्ध हैं माँ काली
चौरासी साल की पकी उम्र में बाबा ने
भले न देखी हो अब तक माँ काली
लेकिन उनका दृढ़ विश्वास है
कि काली उनकी जोगनी से बीस नहीं
अलग नहीं

सिद्ध काली के दम पर
बाबा ढूंढ लाते हैं
लोगों की गुमी गाय, बकरी, मुर्गी
ठीक कर देते हैं
पहलवानों का शीघ्रपतन और स्वप्नदोष
कई कम्युनिस्टों को बाबा
पहना आये हैं रंग-बिरंगी अंगूठी
इसी सिद्ध काली के दम

बाबा का लड़का रोज़ कहीं जाता है
लेकिन लौटते वक़्त कमाई नहीं लाता है
बहू का दिन मोहल्ले के दिलफेंक मजनुयों के बीच कट जाता है
बाबा पका लेते हैं चूल्हे पर दोनों जून खाना
कहते हैं जोगनी से क्या मदद लेना
इस बेचारी को तो करना ही है जिंदगी भर

बाबा के काँधे पर लटकती मूंज
तब उनके अंगूठों में फंस जाती है
जब जोगनी उन्हें देती है उलाहना
भात जलाने
और अपने लिए वर नहीं खोज पाने के लिए

बाबा जोगनी को दस बरस पहले
कुछ नशेड़ियों से मुक्त करा लाये थे
सिद्ध काली के दम पर नहीं
सिद्ध काली के डर से

५.
मनोकामना सिद्धि के नौवें दिन बाबा 
लोगों के गुमे जानवरों को बेटे और बहू के लिए छोड़
सिद्ध काली के चौतरे पर ही सिधार गए
जोगनी ने तेज़ बहते आंसुओं को जल्दी-जल्दी पोंछते हुए
बाबा की देह से छपटकर इतना ही कहा था
'मेरी शादी करके यमराज का भैसा ढूँढने नहीं जा सकते थे बाबा...'

६.
उस दिन से
नहीं सुनी किसी ने
जोगनी की आवाज़

उस अँधेरे-छोटे कमरे में जब
कोई नोचता है उसकी देह
तो जोगनी
सामने की दीवार पर टंगी
बाबा की तस्वीर में खो जाती है
बरसों पुरानी फ्रेम से घिरे बाबा
जाने कब से बीड़ी फूंक रहे हैं उस तस्वीर में



(वर्ष २००७ में प्रकाशित मेरे कविता संग्रह 'सो जाओ रात से')

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