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परिवर्तित अस्तित्व

(मशहूर चित्रकार सुभाष तुलसीता का एक रेखांकन) 

नहीं लिखा होता
तलवार की धार पर
की किसकी गर्दन
बनेगी उसका भोजन

सिक्कों पर भी नहीं होता
किसी विशेष उपभोक्ता का नाम

तलवार और सिक्कों का वजूद
निर्भर करता है उन हाथों पर
जो करते हैं उनका उपयोग
और उपयोग के प्रयोग

टिकाऊ
 न तलवार की धार है
 न सिक्कों की खनक

दो चार गर्दन के साथ कट जाती है धार
दो पांच जेब में ही गुम जाती है खनक

धार और खनक का नहीं होना
प्रभावित करता है
इतिहास को

इतिहासज्ञ
ढूंढ़-ढूंढ़ कर लाते हैं
उन गर्दनों को और उन करतलों को
जिन्होंने निगल ली है धार और खनक

जाने किस लाचारीवश
इतिहासकार
उचित नहीं समझते
उन हाथों का उल्लेख
जो उपयोजक रहे हैं
धार और खनक के
जो हमेशा करते रहे हैं पलायन
परिवर्तित अस्तित्व की आड़ में

इतिहास गवाह है
उपयोग ने कभी नहीं माना
क्यों और कैसे का प्रयोग

(वर्ष २००७ में प्रकाशित कविता संग्रह 'सो जाओ रात' से) 

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