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ओह!

ओह!

उफ्फ़! आज कितनी गर्मी है. कल से ज्यादा होगा आज का तापमान, पक्का... मूर्खता देखिये की आज हेलमेट लेकर भी नहीं निकला. बस अब जल्दी से घर पहुँच जाऊं. यह अच्छा है की आज सारे सिग्नल ग्रीन ही मिल रहे हैं, वर्ना दोपहर के साढ़े बारह बजे इस कड़ी धूप में दो पल को भी रुकना पड़ जाए तो..!! अपनी ही नज़र लगी पुलिस लाइन का सिग्नल रेड हो गया. खैर चलो घर पास ही है. इस ऑटो की बगल में खड़ा हो जाता हूँ. ८९..८८..८७... ओह कब आएगा यह सिग्नल १ पर.. ये ऑटो में बैठे बाबाजी को क्या होगा.. क्या थूक रहा है ये... अरे देखना... ये तो उलटी कर रहा है... और उलटी को बायीं हथेली में उगल कर धीरे से ऑटो के नीचे फेंक रहा है... और दाहिने हाथ से मुझे क्या इशारा कर रहा.. अच्छा गाडी आगे बढाने के लिए कह रह है... ताकि मेरी गाड़ी अथवा मेरे ऊपर उलटी... अरे जल्दी बढ़ाओ गाड़ी..मेरे पीछे वाला चिल्लाया, लेकिन मुझे उस पर गुस्सा आ गया, मैंने गाड़ी वहीं खड़ी की और उतारकर इधर-उधर पानी का इंतजाम देखने लगा, ताकि बाबाजी कम से कम कुल्ला कर के मुंह तो धो ही ले... मुझे पुलिस लाइन के सामने चाय की टापरी दिखी, मैं गाड़ी से चाबी निकल टपरी की तरफ दौड़ा.. और जाते-जाते ऑटो वाले को बगल में लेकर रुकने बोल गया... टपरी से लौटा तो सिग्नल पर दूसरे लोग बत्ती के हरी होने का इंतज़ार कर रहे थे.. पानी का पाउच मैंने बगल के सिग्नल टावर के पास फेंका और अपनी गाड़ी में चाबी लगाकर सिग्नल के ग्रीन होने का इंतज़ार करने लगा... इस गर्मी में ग्रीन कितना सुकून देने वाला रंग है...

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सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि

११ मई २०११ को नागपुर के दीनानाथ हाईस्कूल में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की १५० वीं जयंती के निमित्त युवा कवियों के विचार नामक कार्यक्रम आयोजित हुआ. इसमें श्री अरिंदम घोष, श्रीमती इला कुमार, श्रीमती अलका त्यागी, श्री अमित कल्ला के अलावा मैंने यानि पुष्पेन्द्र फाल्गुन ने भी अपने विचार रखे. मैंने वहाँ जो कहा, वह आपके पेशे-खिदमत है. पढ़कर कृपया अपनी राय से अवगत कराएं...

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कालजयी काव्यकृति गीतांजलि को यदि मुझे एक वाक्य में अभिव्यक्त करना हो तो मैं कहूँगा, 'सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि।' गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के किसी कविता की ही पंक्तियां हैं;
सत्य ये कठिन
कठिनेरे भालोबासिलाम
से कखनो करे ना बंचना
(सत्य तो कठिन है, लेकिन इस कठिन से ही मैंने प्रेम किया, क्योंकि यह सत्य कभी वंचना नहीं करता।)

      गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का समूचा साहित्य फिर चाहे वह काव्य हो, नाटय हो, कथा-कादंबरी हो, हर कहीं सत्य ही उद्भाषित होता है, सत्य ही उद्धाटित होता है, सत्य की ही पक्षधरता है। गीतांजलि में सत्य की पक्षधरता के साथ-साथ सत्य प्राप्ति के उपाय सर्वाधिक प्रखर हैं। प्रखरत…

दूध वाला भैया

वह भैया है या अंकल उसे नहीं पता, बस वह इतना जानता है कि उसका जन्म दूध बेचने के लिए ही हुआ है। बाप-दादा यही करते रहे, सो उसे भी यही करना है। बाप-दादा भी यह जानते थे कि उसे यही करना है, इसीलिए जब वह सातवीं क्लास में अपने मास्साहब की कलाई काट कर घर भाग आया था, तो वे दोनों जोर से हँस पड़े थे।
वह रोज गाँव से शहर आता है दूध बेचने। पहले साइकिल से आता था, लेकिन इधर एक साल पहले जब उसने दाढ़ी वाले नेताजी के मुंह से विकास का नाम और मतलब सुना था, तब से वह रात दिन अपने विकास की फ़िक्र में घुलने लगा था, लिहाजा उसके बाप ने उसकी शादी कर दहेज़ में एक मोटरसाइकिल मांग ली। तो वह अब दूध बेचने मोटरसाइकिल पर गाँव से शहर आता है।
अभी चार-पांच दिन पहले की बात है। अखबार में छपा था कि भीषण गर्मी पड़ रही है। तापमान ४७ डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था। उस दिन, वह अपनी मोटरसाइकिल से दूध देने शहर की और भागा जा रहा था। अचानक शहर से दस किलोमीटर पहले उसकी मोटरसाइकिल भुक-भुक कर बंद पड़ गई। अभी वह नीचे उत्तर कर यह समझने की कोशिश ही कर रहा था कि कल रात दस बजे तक अच्छी चलने वाली मोटरसाइकिल, आज अचानक क्यों बंद पड़ गई कि सड़क से गुज…

मेरी दिनचर्या

जिस रोज़ मैं गलतियां करता हूँ, उस रोज़ मैं दूसरों की गलतियां सहजता से नज़रंदाज़ कर देता हूँ... जिस रोज़ मैं गलतियां नहीं करता, दूसरों की एक गलती भी मुझे नागवार गुजरती है... :) :)) :)))