शनिवार, 18 जून 2011

टूट जाना ही बेहतर...

( सुभाष तुलसीता का रेखांकन  )

हालाँकि 
टूटने के बाद 
बिखरने का डर बना रहता है, 
लेकिन मैं सोचता हूँ 
कि टूट ही जाऊं तो बेहतर होगा 

आखिर कब तक बिखरने के डर से
न टूटने का अभिनय करता फिरूंगा

आप मित्रों से अनुरोध है कि मैं बिखरने लगूँ यदि, तो कृपया मुझे समेटने की कोशिश बिलकुल न कीजियेगा.
हालाँकि मैं जानता हूँ
किसी के बिखराव का चश्मदीद होना आसान नहीं होता
हमारा अहम् हमें न बिखरने की ही इजाज़त देता है और न ही बिखराव के दर्शक होने की
लेकिन कद्रदानों-मेहरबानों 
मुझे बिखरने देना
टूट-टूट कर बिखरने देना
चूर-चूर होकर बिखरने देना
फूट-फूट कर बिखरने देना

मत रोकना
मत टोकना
हाँ नज़र जरूर रखना कि
कोई मेरे बिखराव का अफसाना न बना ले
कोई मेरे बिखराव को अपने शिगूफों का ठिकाना न बना ले
कोई मेरे बिखराव पर अपनी रोटियां न सेक ले
कोई मेरे बिखराव की बोटियाँ न नोच ले

ये क्या
मैं तो सच-मुच टूट रहा हूँ...!!! ???

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