गुरुवार, 23 जून 2011

इन कविताओं को पढ़ा जाए...

१९९५ की सर्दियों की एक सुबह ननिहाल में बैठे-बैठे 'फूट' पड़ीं ये कविताएं. आकार में ये कविताएं अत्यंत छोटी हैं, लेकिन एक ही 'मूड' में लिखी गईं हैं. ये सभी कविताएं 'सो जाओ रात' संग्रह में संकलित हैं. आज इन्हें बहुत सालों बाद पढ़ रहा था, तो लगा कि आप मित्रों से भी इन्हें साझा किया जाये...

प्रश्न

दर्पण निहारने का
कार्यक्रम
**

उत्तर

जिसे
ढूँढा जाए
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इच्छा

स्वाद की तलाश में
पीड़ा भोगने की
एक क्रिया
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जीवन

आड़ी-टेढ़ी
लकीरों का
एक लटकता गुच्छ

जिसे खींचने पर
गाँठ पड़ने का भय
सदैव बना रहा
**

माँ

जो जानती है हमारे विषय में वह सब
जो हम नहीं जान पाते कभी

जो हमें दे सकती है वह सब
जिसके आभाव में स्वयम वह
कलपती रही है ता-उम्र

जो सदा हमें छिपाने को तैयार
हम चाहें तो भी, न चाहे तो भी

जिसकी उंगलियाँ जानती हैं बुनना
जिसकी आँखें जानती है डूब जाना
जिसके स्वर में शैली और गुनगुनाहट हो

जो हमेशा चादरों की बात करे.
**

पिता

उन्हें नहीं मालूम
उनकी किस उत्तेजना में बीज था

वे घबराते हैं
यह जानकार कि काबिलियत 
उनके ही अस्तबल का घोड़ा है
संतति को लायक बनाने के लिए
सारी तैयारियां कर चुके हैं वे

और यह सोचकर ही
खुश हो लेते हैं कि उनके बच्चे
नहीं बंधना चाहते हैं उस रस्सी से
कि जिससे बंधते आये हैं वे
और उनके पूर्वज

विरासत में लेकिन
बच्चों के लिए
वे छोड़ जाते हैं
कई-कई मन रस्सियाँ.
**

ईश्वर

दौड़ते हुए लोगों की आकांक्षा
दौड़ने के ख्वाहिशमंदों के लिए एक आकर्षण
दौड़कर थके और पस्त हुए लोगों के लिए
होमियोपैथिक दवा

जो दौड़ न सके
उनके लिए तर्क
दौड़ते-दौड़ते गिर गए जो
उनके लिए प्यास

जिसने अभी चलना नहीं सीखा
उसके लिए जरूरी पाठ्यक्रम

असल में ईश्वर
उपन्यास का एक ऐसा पात्र
जिसके चरित्र पर है
लेखक का सर्वाधिकार.
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मैं

जो अपने विषय में
सोच भी नहीं सकता
**

तुम

जो मेरे विषय में
सोच ही नहीं रखते
**

सच

जिसका कोई ठिकाना न हो
जो ढूंढते हुए ठौर 
पूछ बैठे
आपसे रास्ता
**

झूठ

जिसके विकल्पों के ढेर 
हों अनुपलब्ध
**

दृष्टि

जो देखे हुए को
झुठलाये एक बार
बार-बार
हर बार
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आग

कोने में
ठंडा पडा है चूल्हा
पेट में तेज लगी है आग
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स्त्री

अपने स्तन
और योनि की वजह
जिसे सहना पड़े
लांछन बार-बार
**

पुरुष

असमंजस का शिकार
बार-बार
फिर भी निर्णय के सूत्र पर
उसका ही अधिकार
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भूख

जो मस्तिष्क से पेट के बीच
झूलती रहती हो
बिना लटके
**

नींद

अपलक जो
बुनता रहा भविष्य
उसके सपनों को आ गई नींद.
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दिन

जो पक्षियों के कलरव से जन्में
और फूलों की पंखड़ियों में मुरझा जाए
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रात

सीख गए जो
मजबूरी-लाचारी जैसे शब्द
इनका मतलब उन्हें समझाती है रात
**

हंसी

आँखें रोना चाहती हैं
लेकिन औरों को देख होंटों ने हंस दिया
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रुलाई

घर से दूर है मस्जिद
तो रहा करे
और बच्चे
तू तो रोता ही रह
खुदा का अब मेरे घर
रोज का आना-जाना है.
**

अस्पताल

मृत्यु का 
एक ऐसा प्रतीक्षालय
जहां से
मृत्यु के आगमन-प्रस्थान का पट
नदारद हो
**

मरीज

जो मरेगा
लेकिन अपनी मौत नहीं
**

चिकित्सक

डिग्रियां लेकर
जो दवाइयां बेचे
जो कभी न कहे
यूरेका मैं सीख गया.
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रौशनी

जलने से नहीं होती रौशनी
अँधेरे को खुला छोड़ दो
वह ढूंढ लाएगा
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धुआं

आँखों से
आंसू निकालने की क्षमता के बावजूद
जिसे नसीब न हों आँखें
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विवाह

इच्छा को
अच्छा बनाने का
एक सामाजिक प्रयास
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विद्यालय

पुस्तकों के वजन मापन की 
प्रथम इकाई
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पुत्र

पिता का उपनाम
**

पुत्री

जिसे देख
पिता की आँखें सिकुड़ती रहें
भय और चिंता से
**

शिक्षक

स्वयं जो जानता है
वही दूसरों से भी कहे जानने
जिन बातों को मारे दर के
खुद नहीं मान पाया
उन्हीं बातों को मान लेने की
नसीहत देता फिरे
**

पुस्तक

अक्षर के काँधे पर
भारी शब्द भीड़
कि जिसके साथ चलती है अविरत
भावनाओं की शवयात्रा
जिसे दो वाक्यों के बीच
खड़े होकर सिर्फ
सिद्धार्थ ही देख सके

काश! वे पढ़ भी लेते
**

प्रयास

आत्म-मनन की दिशा में
एक कदम
**

दिशा

दृष्टि की
कट्टर समर्थक
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असफलता

पिता की गोद में
बैठे बेटे के सिर पर
चोंच मारने का उपक्रम करता कौआ
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फिल्म

खुली आँखों का स्वप्न
खोई हुई आँखों की मंजिल
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बस

जिसे चालाक नहीं
परिचालक चलाता है
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रेल

जिसमे
सफ़र करती हैं
दुश्चिंताएं
शंका
और भय
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गोबर

दैनिक जरूरतों से भरी
एक नारी का शोकगीत
**

विज्ञापन

जिसके विषय में
सदैव बना रहे असमंजस
**

पत्रकार

जो अपनी भूख को
कर सके परिभाषित
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पत्रकारिता

कलम जानती हो
कि बिन स्याही वह अस्तित्वहीन और गैर-महत्त्वपूर्ण है

फिर भी चले बे-मसि
**

शून्य

दिन भर अथक पसीना बहाकर भी
सोना पड़े रात
घुटनों को पेट से सटाकर
**

न्यायालय

जहां न्याय
दो वकीलों के बीच
बहस का मुद्दा हो

जहां न्याय
किसी न किसी कटघरे में ही खड़ा होता हो

जहां न्याय
न्यायाधीश की मर्ज़ी पर आश्रित है

जहां से कभी भी
सुनी जा सकती है
न्याय की चीख
**

वकील

जो न्याय साबित कर सकता हो
जो अन्याय साबित कर सकता हो
जो न्याय को अन्याय साबित कर सकता हो
जो अन्याय को न्याय साबित कर सकता हो
जो नहीं जानता न्याय क्या है-अन्याय क्या है
बस साबित कर सकता हो
**

न्यायाधीश

जो न्याय और अन्याय के बीच करना चाहता हो अंतर
जिसके लिए न्याय वह है जो अन्याय नहीं
जिसके लिए अन्याय वह है जो न्याय नहीं
जो जानता है कि न्याय और अन्याय के बीच वह स्वयं है
लेकिन मानता नहीं
**

ज्ञान

मिटने-मिटाने से होता है आरम्भ जिसका
और पा जाने के एहसास से हो जाता है ख़त्म 
**

धरती

जिसके लिए लड़े जाएँ
सबसे ज्यादा मुकदमें
या फिर की जाएँ हत्याएं
**

आकाश

जहां वांछित हो हवा-पानी
अनुसंधान के रूप में
**

बिस्तर

नींद आने के बाद जरूरी
नींद से जागने के बाद जरूरी
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पर्वत

जहां से ट्रकों
और बसों को गिरने में आसानी हो
जहां मंदिर बनाना कभी भी
घाटे का सौदा नहीं होता
**

समय

जो अपने पास न हो
लेकीन दूसरों की कलाइयों पर
और मुट्ठियों में सदा दिखाई दे
**

जंगल

जहां
वृक्ष निर्भय होकर श्वाश भर सकें
जहां पशुओं के आने-जाने पर
किसी के पेट में दर्द न होता हो
जहां धरती, आकाश, पृथ्वी, वायु और अग्नि की
एक ही इच्छा होती हो कि कोई उन्हें
निर्वासित न कर सकें
**

नदी

जो बहना जानती हो
जो बहाना जानती हो
जो डूबना जानती हो
जो डुबाना जानती हो

जिसमें इतनी सहिष्णुता हो कि
कोई भी उसके किनार बैठ कर फारिग हो सके
**

प्रेमिका

जो कहानियों के लिए जरूरी है
जो हंसकर उद्घाटित करती है कविता
जो हमेशा चाहती है कि कोई उसे हमेशा चाहे
जो देना चाहती है आकुलता को एक नया अर्थ

प्रेमिका सिर्फ स्त्री ही हो सकती है
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कवि

जो सूर्य से ऊष्मा, ऊर्जा और प्रकाश के इतर भी कुछ पाता हो
जो चाहता हो कि पक्षी भी उड़े गगन में पंख हिलाए बिना
जो बिखरा पाता है खुद को अपने आस-पास
जो हमेशा पीना चाहता है गिलास की अंतिम बूँद
जो जानता है कि चाँद
दूज से पूर्णिमा तक और पूर्णिमा से अमावस का सफ़र
करता है नियमित
फिर भी हठ, आग्रह, आन्दोलन करे कि
चाँद की यात्रा
अनियमित की जाए

जो कविताएं लिखे ही नहीं
जिए भी.

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नाव, नाविक और समुद्र

समग्र चैतन्य - पुष्पेन्द्र फाल्गुन मित्र ने कहा, ‘समंदर कितना भी ताकतवर हो, बिना छेद की नाव को नहीं डुबो सकता है.’ तो मैंने एक क...