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जय भीम कावडे काका, जय भीम


गाड़ेघाट* के मुहाने पर
आपको देख विस्मित होती आँखें
आत्मीयता से भर उठेंगी
जैसे ही आप उनसे कावडे काका के घर का पता पूछेंगे

यों गाड़ेघाट पूरे नागपुर जिले में 'अम्मा की दरगाह' के लिए मशहूर है
लेकिन इधर कावडे काका की वजह से इस गाँव का नाम
कई लोगों के लिए आदरणीय हो गया है

५६ साल पुरानी देह में रहते हैं कावडे काका
लेकिन उनके उत्साह और बुद्धि और मेधा और हिम्मत का 
उनकी देह से कोई जोड़ बैठ ही नहीं पाया अब तक
इसलिए आप देखते ही कहेंगे
काका आप तो ३८-४० से ज्यादा के नहीं लगते

गाड़ेघाट अम्मा की दरगाह और कावडे काका के अलावा भी
कुछ अन्य वजहों से जाना जाता है इस हल्क़े** में
जैसे यहाँ के रेती घाट
ठेकेदार यहाँ से रेती निकालते समय
इतने तल्लीन हो जाते हैं
कि हर साल चार फुट की तय जगह
की बजाय १२-१५-१८-२० फुट तक खोह करते हैं
और आराम से रेती ले जाकर पैसा कमाते हैं
रायल्टी चार फुट की, बाकी का 'माल' अपने बाप का
ठेकेदारों की इस प्रवृति को
तहसीलदार और कलेक्टर की स्थायी हरी झंडी मिली हुई है

ठेकेदार की करतूतों की सजा भुगतती है नदी
कन्हान नदी कि जिसके किनारे बसा है गाड़ेघाट
और इसी गाड़ेघाट में है अम्मा की दरगाह और कावडे काका का घर

जो लोग दरगाह में आते हैं
वे कन्हान नदी में जरूर नहाते हैं
और नहाते समय यदि वे उन गड्ढों में चले गए
जिसे ठेकेदार ने हराम की कमाई के लिए खोद रखा है 
तो उन्हें बचाने फिर अम्मा जी कि दुआ नहीं
कावडे काका की हिम्मत काम आती है

कावडे काका ने
सैकड़ों लोगों को डूबने से बचाया है
उन्हें भी जो माहिर तैराक थे
उन्हें भी जिन्हें पानी लगता था
कि नदी में नहाने के लिए तैरना आना जरूरी नहीं

अभी हाल ही 
किसी की शिकायत पर
ठेकेदारों की धांधली की जांच करने आये तहसीलदार की आँख के सामने
डूबने लगे दो जायरीन अम्मा की दरगाह के सामने
बचाओ-बचाओ की आर्त पुकार ने तहसीलदार के होश फाक्ता कर दिए
उन गड्ढों में यदि वे दोनों जायरीन डूब जाते
तो तहसीलदार के नौकरी और इज्ज़त का डूबना भी तय था
तभी किसी ने तहसीलदार को कावडे काका के बारे में बताया
तहसीलदार ने काका को बुला लाने का हुक्म जारी किया
तो किसी ने तहसीलदार को बताया कि
काका तो उन दोनों डूबने वालों को बचाने की कवायद में जुटे हुए हैं

एक मल्लाह उस गड्ढे में उतर कर
उलटे पैर ही लौट आया था ऊपर
काका ने उसे डांट कर घर भगाया
और घर से
साथ लाई गई रस्सी के सहारे
दोनों बच्चों को
उस २० फुट गड्ढे से
सकुशल बाहर निकाला

दोनों बच्चों को जीवित देख
तहसीलदार को अपना रुतबा याद आया
दोनों बच्चों के डपटते हुए
उसने पूछा कि घर से अम्मा की दरगाह के लिए आते हो कि नदी में नहाने
जवाब में कावडे काका ने तहसीलदार से पूछ लिया कि साहब
आप ठेकेदारों को चार फुट की बजाय
बीस फुट का गड्ढा करने की इजाज़त क्यों देते हो?
तहसीलदार ने झट
कावडे काका को गले लगाते हुए
कहा, 'यार तुमने मेरी नौकरी बचा ली'

कावडे काका के एल्बम में कैद हैं
न जाने कितने ही ऐसे किस्से
और उनकी चश्मदीद तस्वीरें

एल्बम में ही कैद हैं कुछ अफ़सोस भी कि
जिन्हें काका गाहे-बगाहे याद करते रहते हैं
और अपनी मुट्ठियाँ भींचते रहते हैं
ये उन लोगों की तस्वीरें हैं
कि जिन्हें काका नहीं बचा पाए डूबने से
अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद

कावडे काका के एल्बम में
वे चेहरे भी हैं
जो सड़क दुर्घटनाओं में
वीभत्स होकर अपनी पहचान को चुके हैं
लेकिन जी रहें हैं अपनी जिंदगी
कावडे काका की मुस्तैदी की बदौलत 

लेकिन इसके पहले कि लम्बी उसांस के साथ
आप कोई निराशाजनक बयान जारी करने का मन बनाएं
कावडे काका आपके सामने खोल देंगे वह एल्बम
जिसमे मुस्कुरा रहे होंगे किसिम-किसिम के फूल
तरह-तरह के जंतु
भांति-भांति के पक्षी
कुछ दुर्लभ- कई सुलभ
सफ़ेद तितली और उल्लू भी

कावडे काका के पास अखबारों की कतरनों
और तस्वीरों की भरमार है 
कि जिसमे उनके हिम्मत की चर्चा और प्रशस्तियाँ हैं
लेकिन काका आपको यह सब दिखाते हुए
बहुत खुश नहीं होते

बहुत धीरे से बोलते हुए
बताते हैं काका अपने अविवाहित रहने की वजह
और अपनी बड़ी बहन के भी अविवाहित रह जाने का कारण
दोनों ने
अपने से छोटे भाई-बहनों के लिए
जीवन भर खटने का निश्चय किया था
दोनों आज
इस बात से खुश हैं
कि सभी छोटे भाई-बहन अपने-अपने रास्ते पर हैं

काका ने ४० भैंस और २० गाय पाल रखी है
काका ने अपने दम पर खरीदी है पचासों एकड़ जमीन
लेकिन ख़ुशी काका के चेहरे से गायब है

कावडे काका ने सैकड़ों लोगों को जीवन-दान दिया
सैकड़ों परिवारों को बेसहारा होने से बचाया
काका ने डूबने से बचाते वक़्त और बचाने के बाद भी
कभी नहीं पूछा किसी से उसका नाम-और जाति

लेकिन बचने वाले और उसके परिवारजन
कभी नहीं भूलते
पूछना काका का नाम और उनकी जाति
और जाति जानने के बाद यह कहना भी नहीं भूलते
कि अभी मौत नहीं लिखी थे हमारे ....

काका बताएँगे कि
उन पर जो ज्यादातर मुक़दमे चल रहे हैं
वे उन ज्यादतियों की खिलाफत का नतीजा हैं
जो उन्होंने ब्राह्मणों और उच्च जातियों की लड़कियों से
उनके ही लोगों द्वारा किये जाने पर जताया था और लड़कियों को बचाया था

लेकिन रसूखदारों ने उलटे उनपर ही मुक़दमे चपेटे थे
जिन लड़कियों की आबरू बचाई थी उन्होंने
उनके परिजन कहते
कि हमने तो नहीं कहा था कि हमारी बच्ची की आबरू बचाओ

आज भी
औसतन
दो जान
रोज बचाते हैं कावडे काका
लेकिन अब आबरू का टोटका वे कतई नहीं मानते

अब काका
तितलियों
मोरों
भौरों
पक्षियों
जंतुओं
उल्लुओं
और जानवारों की जान बचाने को
ज्यादा तवज्जो देते हैं
कहते हैं कि इधर जाति के नाम पर
लगातार क्या एकाध बार भी
अपमानित होने का कोई खतरा नहीं है बाबा!

मेरे जैसे लोग
कावडे काका के इस जज्बे पर 
सजदा करते हुए कह ही उठते हैं
जय भीम कावडे काका, जय भीम 

* नागपुर जिले का छोटा सा गाँव
** इलाका  

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