सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

काका का एल्बम

कल इसी कविता को किसी और तरीके से लिखा था. आज  'कविता लेखन' पर अग्रज कवि-आलोचक नन्द भारद्वाज जी के मार्गदर्शन के बाद कल की कविता 'जय भीम कावडे काका, जय भीम' को कुछ इस तरह लिखा है. आप सुधीजनों से  तवज्जों चाहता हूँ ...



तनि-तनि से पंख हैं उस सफ़ेद तितली के
जिन्हें मासूमियत से हिलाकर प्रदर्शित करती है वह अपना प्रेम
हालांकि सैकड़ों पैरों वाला वह जंतु उसे कतई नहीं पसंद 
लेकिन क्या करे काका के एल्बम में उसके लिए जगह ही यहाँ थी

काका के एल्बम में
नाचते हैं मयूर
गूंजते हैं भौरे
सहमकर टंगा पड़ा है एक सफ़ेद उल्लू 
और माजरे को समझने की कोशिश करता एक हिरन शावक इधर ही देखर रहा है

कुछ फूल और पत्तियों 
और किस्म-किस्म की औषधियों की गुफ्तगूँ 
आपको सुननी ही पड़ेगी साहेबान यदि आप देखेंगे काका का एल्बम तो

काका के एल्बम में सबकुछ अच्छा-अच्छा और सुन्दर नहीं है
कुछ बदसूरत और वीभत्स चेहरे भी देखने पड़ेंगे आपको
ये उन चेहरों के अंतिम अवशेष हैं
जिन्हें कुचलकर भाग गए हैं बस-ट्रक जैसे अति भारी वाहन
या कर-जीप जैसे कम वजनी वाहन 
या फिर मोटर साइकल या स्कूटर जैसे हल्की गाड़ियाँ  

इन चेहरों की पहचान बनाए रखने की ठोस वजह है काका के पास
उस वजह को आप देख पायेंगे उनकी आँखों में जब वे लम्बी-लम्बी उसाँसे भर
एल्बम के एक-एक पन्ने को इस तरह पलट रहे होंगे
जैसे कोई पलटता है जिंदगी की किताब पृष्ठ दर पृष्ठ

काका के एल्बम में खुशियों में भींगी आँखें
और मौत के मुंह से लौटकर आने पर किया जाने वाला 
कसावट और तरावट भरा जोरदार आलिंगन भी है
काका के एल्बम के इस हिस्से का हर क्षण 
उनके अनुभवों और कहानियों से उसी तरह जीवंत है
जैसे दो साल के बच्चे की तुतलाती बोली से जीवंत होती है जिंदगी

काका को पसंद नहीं है
किसी का डूब जाना
फिर वह डूबना
रेत घाट में ठेकेदारों द्वारा
नियमों को धता बताकर किये गए २०-२० फुट के गड्ढे में किसी नौजवान का डूबना हो
कि किसी मवाली की अश्लील टिप्पणियों से शर्म से फिसलती किसी स्त्री का डूबना हो
काका किसी को डूबने नहीं देते
घर से लाई गई रस्सी के सहारे वह बचाते हैं नदी और गड्ढे में डूबने वालों को
नीयत से लाई गई हिम्मत के सहारे वह बचाते हैं नारियों के स्वाभिमान
और उनके भीतर टूटते समाज और सदाचार को

काका के एल्बम में नहीं है उनकी रस्सी और नीयत का एक भी चित्र

नहीं है
'जय भीम कावडे काका, जय भीम' की अनुगूंज
जिसे सुना जा सकता है सिर्फ तभी
जब आप हों काका के साथ पल-दो पल ही सही

काका के एल्बम में नहीं है
वह धूप और छाँह
जिसे भोगा है उन्होंने अविरत ५६ साल
उस बहन की वेदना और ममता भी नहीं
जिसने अपने छोटे भाई-बहनों के लिए नहीं सजाई अपनी मांग
लौटा दिए अपने सपनों को बैरंग

काका के एल्बम में नहीं हैं
वे आशीष और दुआएं
जो बटोरी है उन्होंने हर शै-हर दिन
वे अफ़सोस भी नदारद हैं काका के एल्बम से
जिन्हें पिया है काका ने कई-कई लोगों के आंसुओं के साथ

काका के एल्बम में नहीं हैं मैं और आप

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि

११ मई २०११ को नागपुर के दीनानाथ हाईस्कूल में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की १५० वीं जयंती के निमित्त युवा कवियों के विचार नामक कार्यक्रम आयोजित हुआ. इसमें श्री अरिंदम घोष, श्रीमती इला कुमार, श्रीमती अलका त्यागी, श्री अमित कल्ला के अलावा मैंने यानि पुष्पेन्द्र फाल्गुन ने भी अपने विचार रखे. मैंने वहाँ जो कहा, वह आपके पेशे-खिदमत है. पढ़कर कृपया अपनी राय से अवगत कराएं...

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कालजयी काव्यकृति गीतांजलि को यदि मुझे एक वाक्य में अभिव्यक्त करना हो तो मैं कहूँगा, 'सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि।' गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के किसी कविता की ही पंक्तियां हैं;
सत्य ये कठिन
कठिनेरे भालोबासिलाम
से कखनो करे ना बंचना
(सत्य तो कठिन है, लेकिन इस कठिन से ही मैंने प्रेम किया, क्योंकि यह सत्य कभी वंचना नहीं करता।)

      गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का समूचा साहित्य फिर चाहे वह काव्य हो, नाटय हो, कथा-कादंबरी हो, हर कहीं सत्य ही उद्भाषित होता है, सत्य ही उद्धाटित होता है, सत्य की ही पक्षधरता है। गीतांजलि में सत्य की पक्षधरता के साथ-साथ सत्य प्राप्ति के उपाय सर्वाधिक प्रखर हैं। प्रखरत…

दूध वाला भैया

वह भैया है या अंकल उसे नहीं पता, बस वह इतना जानता है कि उसका जन्म दूध बेचने के लिए ही हुआ है। बाप-दादा यही करते रहे, सो उसे भी यही करना है। बाप-दादा भी यह जानते थे कि उसे यही करना है, इसीलिए जब वह सातवीं क्लास में अपने मास्साहब की कलाई काट कर घर भाग आया था, तो वे दोनों जोर से हँस पड़े थे।
वह रोज गाँव से शहर आता है दूध बेचने। पहले साइकिल से आता था, लेकिन इधर एक साल पहले जब उसने दाढ़ी वाले नेताजी के मुंह से विकास का नाम और मतलब सुना था, तब से वह रात दिन अपने विकास की फ़िक्र में घुलने लगा था, लिहाजा उसके बाप ने उसकी शादी कर दहेज़ में एक मोटरसाइकिल मांग ली। तो वह अब दूध बेचने मोटरसाइकिल पर गाँव से शहर आता है।
अभी चार-पांच दिन पहले की बात है। अखबार में छपा था कि भीषण गर्मी पड़ रही है। तापमान ४७ डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था। उस दिन, वह अपनी मोटरसाइकिल से दूध देने शहर की और भागा जा रहा था। अचानक शहर से दस किलोमीटर पहले उसकी मोटरसाइकिल भुक-भुक कर बंद पड़ गई। अभी वह नीचे उत्तर कर यह समझने की कोशिश ही कर रहा था कि कल रात दस बजे तक अच्छी चलने वाली मोटरसाइकिल, आज अचानक क्यों बंद पड़ गई कि सड़क से गुज…

मेरी दिनचर्या

जिस रोज़ मैं गलतियां करता हूँ, उस रोज़ मैं दूसरों की गलतियां सहजता से नज़रंदाज़ कर देता हूँ... जिस रोज़ मैं गलतियां नहीं करता, दूसरों की एक गलती भी मुझे नागवार गुजरती है... :) :)) :)))