बुधवार, 18 मई 2011

शहर का पुल


उगता है सूर्य
उसी पुल के नीचे से और पीछे से रोजाना
कि जिस पर दिन भर दौड़ता है शहर
और रात में लकलकाता है सन्नाटा 

तेज होती सिसकारियों पर
अंकुश लगाने के प्रयास में
एक बूढ़ी खंखारती है 
उत्तेजित युवती झकझोरती है अपने पियक्कड़ पति को 
जो भरभरा गया है
उकसाकर उसे
युवती बिलखती है
उसका विलाप कुलबुला देता है
पुल पर खड़े तमाम रिक्शों और ठेलों को

शहर भर में बिखरा फुटपाथ
सिमट आता है रात में
पुल पर लगी उन दो तख्तियों के बीच
कि जिस पर खोंइची गई हैं
भूमिपूजन से शिलान्यास तक की तारीखें
और उबटा हुआ है किसी उदघाटनकर्ता का नाम
पुल निर्माता कंपनियों के साथ
तख्तियां सलामत हैं कि कुत्ते
सींचते हैं उन्हें प्रतिदिन
बिना सूंघे ही

पुल के नीचे 
प्रभु के वराह अवतार के लिए
हर सुबह
इलाके के लोग छोड़ आते हैं रौरव

किशोरों की आँखों में पनपता है
मिनी स्कर्ट और पैन्टियों के रंग सना आशावाद
इसी पुल के नीचे

कई स्त्रियों की पेट की आग में
पड़ता है पानी इसी पुल के नीचे

एक युवक इस पुल को देख-देख
बन गया है नामी लेखक

वह बूढ़ा जो आप सबका सम्राट है
इस पुल पर बोल सकता है कई-कई घंटे लगातार

पुल के नीचे से बहा करता है
एक बड़ा नाला इस निर्देश के साथ कि
शहर भर का कचरा बहाना होगा उसे दूसरे शहर में
पता नहीं
दूसरे शहर में
कोई पुल है या नहीं

इस पुल पर जो नहीं रहते
वे देख सकते है टी.वी. पर 
शहर का पुल

(उन्नीस वर्ष की आयु में लिखी गई यह कविता 'सो जाओ रात' में संग्रहित है. कविता की डाइरी में इस कविता के नीचे १२ मई १९९३ की तारीख पड़ी है.)


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