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एक जून को फाल्गुन विश्व की पहली वर्षगाँठ है


आगामी एक जून को फाल्गुन विश्व की पहली वर्षगाँठ है. यों १७ जुलाई २००९ को फाल्गुन विश्व एक साप्ताहिक के तौर पर पाठकों से रू-ब-रू हुआ था, लेकिन एक सांस्कृतिक-वैचारिक पत्रिका को हर सप्ताह सिर्फ उत्साह और जिद के भरोसे नहीं प्रकाशित किया जा सकता. मार्च २०१० में पत्रिका बंद हो गई. लेकिन जून २०१० में हमने मासिक के तौर पर वापसी की. रंगीन आवरण में हमने फाल्गुन विश्व का प्रवेशांक प्रकाशित किया. महज ५०० प्रतियां छपी गई. इससे ज्यादा छपने का पैसा ही नहीं था. प्रवेशांक को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया लेकिन जुलाई का अंक छापने के लिए जरूरी धन एकत्रित नहीं हो पाया, लिहाजा जुलाई और अगस्त का अंक संयुक्त रूप से प्रकाशित करने का निर्णय हुआ. लेकिन अगस्त में भी जरूरी धन में कमी रह गई, सो जुलाई-अगस्त और सितम्बर का संयुक्त अंक प्रकाशित हुआ. लेकिन आवरण ब्लैक-वाइट रहा. इस बार भी प्रतियां ५०० ही छपी गई. पाठकों ने इस अंक को भी तहेदिल से स्वीकार किया.

अक्तूबर में कुछ मित्रों के सुझाव पर सदस्यता मुहिम चलाई गई. महज दस रुपये में साल भर पत्रिका देने की बात हुई. यह योजना बनी की यदि देश भर में पत्रिका के दस हज़ार पाठक इस मुहिम के जरिये जोड़ लिए जाते हैं तो हमारे पास एक लाख रुपये जमा हो जायेंगे, जिससे पत्रिका निकालने के वास्ते अंटी में कुछ पैसा हो जाएगा और दस हज़ार पाठकों का साथ मिल जाएगा, जिससे विज्ञापन पाने में कुछ आसानी होने लगेगी. इस मुहिम के लिए बड़ी संख्या में शुभचिंतकों के सहयोग की जरूरत थी. कुछ मित्रों ने आगे बढ़कर इस मुहिम का जिम्मा लिया. तय हुआ की हरेक मित्र अपने दस मित्रों को इस मुहिम में जोड़ेगा. हमें कुल ४०० साथियों की जरूरत थी, जिनमें से हरेक को २५-२५ सदस्य बनाने थे, जिससे एक साथी के जरिये फाल्गुन विश्व के अकाउंट में २५० रुपये पहुँचता, इस तरह ४०० साथियों के जरिये आसानी से हम एक लाख रुपये इकट्ठा कर लेते. 

मुहिम शुरू हुई, एक समय सीमा बनाई गई की एक महीने के भीतर-भीतर अपने लक्ष्य को पूरा कर लिया जाएगा. जिन मित्रों ने बढ़-चढ़ कर इस मुहिम का जिम्मा लिया था, अचानक उन्हें जरूरी काम याद आने लगे और एक महीना ख़त्म होते-होते महज दस साथी ही सदस्यता मुहिम को अंजाम दे पाए. सीधी भाषा में हमारे योजना की हवा निकल चुकी थी. कई साथी अपनी जेब से २५० सौ रुपये देने को तैयार थे, लेकिन पाठक बनाने को तैयार नहीं थे. मुझे उनकी इस उदारता का कारण आज तक नहीं मालूम है.

एक लाख की जगह अंटी में ढाई हज़ार रुपये आये. एक लम्बी सांस लेकर फिर से शुरुवात का निर्णय हुआ. अबकि बार साथ में कोई न था. लेकिन जाने क्यों हौसला कम नहीं हुआ. घर में नज़र दौड़ाई और उन गैर-जरूरी चीजों पर जाकर नज़र टिक गई, जिनके बिना भी गृहस्थी की गाड़ी आसानी से चल सकती थी. एक-एक कर वे चीजें घर में कम होने लगी, पत्रिका नियमित निकलने लगी. पत्रिका को ख़ास लोगों तक पहुंचाने का कोई तुक नहीं था, सो आम लोगों तक पत्रिका पहुचाई गई. आम लोगों ने पत्रिका को हाथों-हाथ लिया.

जनवरी आते-आते एक हज़ार पाठक फाल्गुन विश्व पढ़ने लगे. यह भी सच है कि सभी लोग खरीद कर पत्रिका नहीं पढ़ रहे थे, लेकिन जो लोग भी पत्रिका ले रहे थे, वे पत्रिका पढ़ रहे थे, उस पर मुझसे बात कर रहे थे. पत्रिका में छपी रचनाओं से सहमती-असहमति जता रहे थे, और अपने खर्च से गोष्टियाँ कर रहे थे, जिसमें पत्रिका में छपी रचनाओं पर चर्चा हो रही थी. एकाध बार उन लोगों ने मुझे भी बुलाया, लेकिन निजी कारणों से मैं उनकी चर्चाओं में शामिल न हो सका.

आज नागपुर समेत समूचे विदर्भ में पांच हज़ार से ज्यादा लोग फाल्गुन विश्व पढ़ते हैं और ये वे लोग हैं जिनके पास इन्टरनेट और कंप्यूटर जैसी सुविधाएं नहीं है. मोबाइल है तो सिर्फ इसलिए कि अपने जानने वालों का हाल-चाल पूछ सकें, बता सकें. टी.वी है लेकिन उसे चलाने के लिए बिजली नहीं है. उनके लिए फाल्गुन विश्व जैसे दीन-दुनिया को समझने के एक जरिया बन गई है. मेरा भी सारा ध्यान अपने इन अमूल्य पाठकों पर केन्द्रित है. कई ऐसे आदिवासी युवा हैं जो पत्रिका पढ़ लेने के बाद चर्चा के लिए मेरे पास आते हैं. उनसे बात कर मेरा ज्ञान बढ़ रहा है, मेरी समझ बढ़ रही है. संकल्प दृढ़ हो रहा है....

कई मित्र कहते हैं कि आपकी पत्रिका में लगभग वही रचनाएँ रहती है, जिसे हमने पहले ही इन्टरनेट पर पढ़ लिया है. उनकी बात सही भी है. मैं जानकीपुल.कॉम, मोहल्ल लाइव.कॉम, समालोचना.ब्लागस्पाट.कॉम जैसी वेब पत्रिकाओं से साभार रचनाएं अपनी पत्रिका में छपता रहता हूँ. क्योंकि मैं मानता हूँ कि अच्छी रचनाओं पर मात्र उन्हीं पाठकों भर का अधिकार नहीं है, जो इन्टरनेट पर इन्हें पढ़ सकते हैं. मैं जिस भी वेब पत्रिका से रचना लेता हूँ, अपनी पत्रिका में उस वेब पत्रिका का उल्लेख करता हूँ और उन्हें रचना का श्रेय देता हूँ. 

दिसंबर २०१० में मुझे राज रगतसिंगे का साथ मिला. राज साहब जैसा कि मैं उन्हें प्यार से कहता हूँ, एक बीमा एजेंट हैं, लेकिन पढ़ने-पढ़ाने के शौक़ीन. उन्होंने जनवरी से फाल्गुन विश्व को प्रकाशित करने का मासिक खर्च उठाना शुरू किया. इस काम में वे मनीष गायकवाड़ नामक अपने मित्र की मदद लेते हैं. मनीष पत्रिका छापने का खर्च देते हैं और राज साहब पाठकों तक पहुंचाने का इंतजाम करते हैं. फिलहाल इसी तरह यह सफ़र जारी है. हर महीने पांच हज़ार प्रतियां छप रही हैं और उन पाठकों तक पहुँच रही हैं, जिनमें इसे पढ़ने की ललक है.

फाल्गुन विश्व का सफ़र जारी है और अपनी पहली वर्षगाँठ पर मैं अपने माता-पिता, अपनी पत्नी और बेटियों के साथ अनुज धर्मेन्द्र और भाई लीलाधर का भी शुक्रगुजार हूँ. इन सभी के परिश्रम के बिना फाल्गुन विश्व का एक भी अंक साकार न हो पता. आइये फाल्गुन विश्व के हमसफ़र बनिए, आपका स्वागत है...

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