बुधवार, 25 मई 2011

ये हैं सबीहा खुर्शीद, नहीं डाक्टर सबीहा खुर्शीद.


ये हैं सबीहा खुर्शीद, नहीं डाक्टर सबीहा खुर्शीद. नागपुर के पास एक छोटे से कस्बे कामठी में रहती हैं. सबीहा ने हाल ही 'उर्दू में माहिया निगारी' पर पी.एचडी. हासिल की है. इस विषय पर अनुसंधान करने वाली वे देश और दुनिया की पहली शख्सियत हैं. पंजाब में लोकगीत के तौर पर माहिया की बड़ी प्रतिष्ठा है. लेकिन पंजाबी में माहिया के आगाज़, इर्तेका और उर्दू में इसके इब्तेदा के साथ उर्दू में होने वाले वजन और मेज़ाज़ को सबीहा ने अपने अनुसन्धान का विषय बनाया. उन्होंने माहिए के लिए किये जाने वाले तजुर्बात को भी निशान ज़द किया और माहिया कहने वालों को उनके इलाकाई हवाले से उजागर किया है. सबीहा के अनुसन्धान में मगरीबी दुनिया के माहिया निगार, हिन्दुस्तान के माहिया निगार, पकिस्तान के माहिया निगार तफसील से अपनी जगह बनाए हुए हैं. उर्दू माहिए के बानी हिम्मत राय शर्मा और इस तहरीक के रूह-ए-रवां हैदर कुरैशी तक, सभी से सबीहा आपका परिचय पूरी शिद्दत के साथ कराती हैं.
सबीहा एक बुनकर के घर पैदा हुईं और तमाम जद्दोजहद के साथ अपनी शिक्षा को उन्होंने एक मुक्कल मुकाम तक पहुंचाया है. अपने घर में पढ़ने-लिखने का जुनून रखने वाली पहली ही शख्स बनीं, जिससे एक बहन और एक छोटे भाई ने भी शिक्षा को अपने जीवन लक्ष्य पाने का जरिया बनाया. सबीहा के सबसे बड़े भाई शहीद युसूफी गैस-बत्ती का छोटा सा कारोबार करते हैं और अपनी सीमित कमाई से इतना इंतजाम जरूर करते रहे कि सबीहा की पढ़ाई और पी.एचडी. में ज़रा भी बाधा न आये.
सबीहा को राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज विश्विद्यालय यानि नागपुर विश्वविद्यालय जल्द ही 'उर्दू में माहिया निगारी के लिए 'पी.एचडी.' प्रदान करने जा रहा है. सबीहा को अशेष-अनंत शुभकामनाएं...

नाव, नाविक और समुद्र

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