गुरुवार, 19 मई 2011

१९ मई १९९६ को मेरी उम्र २२ साल की थी और मेरी दुनिया बदल गई थी.

(मेरी शरीक-ए-हयात सुषमा)

२१ बरस का होते ही मैंने समाज को बेहतर बनाने का सपना देखते हुए घर छोड़ दिया था. साथ मौसेरे भाई हेमधर भी थे. हमने तय किया था की बस चलते जायेंगे सन्यासियों की तरह और समाज को समझते-समझाते समूचा जीवन बिताएंगे. कृष्ण जन्माष्टमी की रात हमने चुपके से घर छोड़ा. दोनों भाइयों ने एक-एक चिट्ठी लिखी और अपने-अपने घर के पूजा-घर में 'भगवान् के सिंहासन' में रख आये. 'भगवान् के सिंहासन' में इसलिए कि हम दोनों के पिता सुबह भोर में ही स्नान कर लेते थे और घंटों पूजा घर में बिताते थे. भगवान् को नहलाते समय सिंहासन साफ़ किया जाता था और उस समय उन्हें चिट्ठियां आसानी से मिल सकती थीं. चिट्ठियों में यही लिखा था कि हम लोग अपनी मर्जी से घर छोड़ कर जा रहे हैं और हमें ढूंढने की कोई कोशिश न की जाए... अब से यह दुनिया ही हमारा घर है... 
रात बारह बजे घर से निकल कर हम दोनों अधाधुंध पैदल चलते रहे... सुबह होते-होते हम लोग लगभग साठ किलोमीटर पैदल चल चुके थे. महाराष्ट्र बार्डर पार कर हम दोनों मध्यप्रदेश की सीमा में आ गए थे. अपने ज़रा से कानूनी ज्ञान से हम इतना जानते थे की यदि पुलिस की मदद से हमारे परिजन हमें ढूंढने की कोशिश करेंगे तो राज्य सीमा बदल जाने से हम आसानी से उनके हाथ नहीं आयेंगे. खवासा नामक उस सीमान्त गाँव में हम दोनों ने एक होटल में जलपान किया. जलपान के बाद चलने में दिक्कत होने लगी. हेमधर तो चलते-चलते दो-तीन बार गिर गए. हमने कुछ देर बैठकर फिर चलने का निर्णय किया. बैठे-बैठे हेमधर रो पड़े. उन्हें अपने पिता की चिंता होने लगी. वह पिता के साथ अकेले रहते थे. बाकी परिवार गाँव में रहता था. उनका विवाह भी हो चुका था. एक-एक कर उन्हें सब की याद आने लगी. और जब उनका रोना बढ़ गया तो मैंने उनसे घर लौट जाने का अनुनय किया. वह मेरे बिना घर लौटने को तैयार न थे. मैंने घर लौटने से साफ़ मना कर दिया. फिर वे अकेले ही लौटने को तैयार हो गए. वापस खवासा लौट कर उन्हें बस में बिठाया. क्योंकि हम लोग पैसे लेकर घर से चले ही न थे, सो उनका बस का टिकट कटाने के लिए मुझे बस के यात्रियों से 'भीख' मांगनी पड़ी.
भाई हेमधर लौट गए और मैंने अपनी यात्रा जारी रखी...
पता नहीं, कैसा जोश था. हेमधर खवासा से साढ़े आठ बजे सुबह नागपुर के लिए बस से रवाना हुए थे और मैं उसी समय जबलपुर की दिशा में पैदल. साढ़े तीन बजे मैं सिवनी पहुँच गया. मेरे मित्र लीलाधर सोनी (जो इस समय एक कंपनी में प्रोजेक्ट इंजीनिअर हैं) उस समय सिवनी के शासकीय पोलिटेक्निक कॉलेज में इलेक्ट्रिक इंजीनिअरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. मेरे पास उनके कॉलेज का फोन नंबर था. कॉलेज में फोन किया. सोनी जी उस समय प्रयोगशाला में थे. कुछ देर बाद उनसे बात हुई. मैंने उन्हें बताया कि मैं घर छोड़कर दुनिया को बेहतर बनाने निकला हूँ. पैदल ही हूँ. आज रात आपके कमरे पर विश्राम की इच्छा है. कल सुबह होते ही आगे कूच कर जाऊँगा. सोनी जी ने फोन पर यह कहते हुए मुझे जहां का तहां खड़े रहने की हिदायत दी कि वे तुरंत मुझे लेने आ रहे हैं. दस मिनट भी न बीते होंगे कि वे अपने दो मित्रों के साथ आ गए. मुझसे गले मिले और दोस्तों की तरफ देखकर कहने लगे, 'हम लोग बेकार की प्रयोगशाला में समय बर्बाद कर रहे थे, इनसे मिलिए ये हैं चलती-फिरती लेकिन जीवंत प्रयोगशाला.' और इसके बाद हंसी-ठहाकों का लम्बा दौर चलता रहा. हम रिक्शे से उनके कमरे पर पहुंचे. सोनी जी अपने चार मित्रों के साथ रहते थे. दो कमरों में दो-दो लोग रहते थे.
कुछ देर बाद मुझे एकदम हेमधर की याद आयी और यह भी कि वे घर लौट गए हैं.
हेमधर भी लगभग उसी समय घर लौटे, जिस समय मैं सिवनी पहुंचा था. बस स्टैंड से सीधे वे मेरे घर गए और वहाँ सारा किस्सा एक ही बार में बता गए. उस समय तक घर में हडकंप मच चुका था. पिता बदहवास मेरे जाने वालों के बीच मुझे ढूंढने की नाकाम कोशिश कर रहे थे. चिट्ठी के हिसाब से मैं दुनिया बेहतर बनाने निकला था और उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि दुनिया बेहतर बनाने के लिए अपना घरबार छोड़ने की जरूरत क्या है. अपना यही असमंजस वे मेरे सभी मित्रों से साझा कर रहे थे. दोपहर बाद जब हेमधर के घर लौटने की खबर उन तक पहुंची तो वे मेरे एक मित्र के साथ स्थानीय पुलिस स्टेशन में बैठे थे. हेमधर की लौटने की खबर से वे उत्साहित हुए और मेरे गुमशुदगी की रपट लिखाए बिना ही घर लौट आये.
हेमधर की लौटने की खबर पाकर मेरे मौसाजी भी मेरे घर पहुँच गए थे. मौसा जी मेरे घर से कोई एक किलोमीटर की दूरी पर रहते थे. मेरे पिता और मौसा दोनों ही कोयला मजदूर थे और दोनों को शासकीय आवास आवंटित था. हेमधर भाई ने अब चाहे जिस तरह अपनी बात रखी, लेकिन उसका यही अर्थ लगाया गया कि मैंने उन्हें बरगला कर घर से भागने के लिए मजबूर कर दिया था. क्योंकि खवासा में सुबह नाश्ता करते समय मैंने हेमधर को यह बताया था कि शाम तक हमें सिवनी पहुंचना है और वहाँ लीलू भाई के यहाँ आराम. फिर सुबह उनके यहाँ से चलकर शाम तक जबलपुर और रात पुनश्च जबलपुर में आराम. इस तरह प्रतिदिन के चलने और रूकने के इंतजाम के बारे में मैंने उन्हें बताया था. हालाकि हम जिन भी मित्रों के यहाँ रात रुकने वाले थे, उनमे से किसी को भी हमारे इस 'मिशन' के बारे नहीं मालूम था.
बहरहाल, हेमधर की बातों से मेरे पिता को मालूम हो चुका था कि मैं उस रात सिवनी में लीलाधर सोनी के साथ रहूँगा. सोनीजी के मामा हमारे पडोसी थे. उन्हें सिवनी में लीलाधर का घर मालूम था.
हेमधर की याद आते ही मैंने अपनी आशंका लीलू भाई को बताई और यह डर भी उनसे साझा किया कि मेरे पिता, उनके मामा के साथ मुझे ढूंढते हुए वहाँ आ सकते हैं. सो हमने इस पकड़ से बचने की एक योजना बनाई. योजना यह थी कि लीलू भाई अपने मामाजी के घर फोन करेंगे और उनसे अर्जेंट पैसों की मांग करेंगे. यह भी कहेंगे कि वे पैसे लेने आज रात ही आ रहे हैं. बात-बात में सोनी जे मेरा हाल-चाल भी पूछेंगे, जैसा कि वे हर बार फोन करते समय करते हैं. कई बार तो वे मुझे फोन पर बुलाने के लिए भी अपने मामाजी से कहते हैं. इससे वहाँ के लोगों को यह यकीन हो जाएगा कि मैं सिवनी में उनके पास नहीं रुका हूँ.
सोनी जी ने अपने मामा को फोन किया और पैसो के अर्जेंसी बताई, साथ ही यह भी कहा कि बस वे थोड़ी ही देर में नागपुर के लिए निकल रहे हैं. लेकिन फोन पर वे मेरे बारे में बात नहीं कर पाए. सात बजे की बस से वे नागपुर के लिए रवाना हो गए. रात ग्यारह बजे के आसपास वे कन्हान (नागपुर के समीप के क़स्बा जहाँ मैं रहा करता था और अभी भी रहता हूँ) पहुँच गए. वहाँ उनके मामा स्कूटर लेकर उनका इंतज़ार कर रहे थे. उन्हें स्कूटर पर बैठकर उनके मामाजी चल पड़े. कुछ ही दूरी पर दो अलग-अलग स्कूटर पर मेरे पिता और मोहल्ले के तीन लोग और थे. इस तरह बिना किसी औपचारिक पूछताछ के वे लोग लीलू भाई को लेकर तीनों स्कूटर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात पर दौड़ाने लगे. रात ११ बजे कन्हान से चलकर वे लोग सुबह चार बजे के आसपास सिवनी लीलू भाई के कमरे पर दबिश देने पहुँच गए.
सीढ़ियों पर कदमों की आहट से मेरी नींद खुल गई. और मैंने अपनी बगल में सोये लीलू भाई के मित्र को जगाकर इतना ही पूछा कि यहाँ से भागने के लिए मुख्य दरवाजे के अलावा और कोई रास्ता है? लेकिन वे मित्र महाशय गहरी नींद में थे और उन्होंने हाथ के इशारे से पीछे की तरफ इशारा किया. तबतक दरवाज़े पर दस्तक दी जाने लगी थी और मैं फ़टाफ़ट अपने कपडे पहनकर पिछला दरवाज़ा ढूंढ रहा था. मुझे पिछला दरवाज़ा नहीं मिला और दस्तक तेज़ होने की वजह से कमरे में रहने वालों को दरवाज़ा खोलना ही पड़ा. हताशा में मैं पानी की टंकी के पाइप पर चढ़ने की कोशिश करने लगा, लेकिन पाइप प्लास्टिक का था, सो पहले ही झटके में मुझे लेकर जमीदोंज हो गया. मैं फर्श पर पड़ा कराह रहा था, पिता मेरे सिराहने पहुँच चुके थे. लीलू भाई उनके साथ थे. उन्होंने ही सहारा देकर मुझे उठाया और अत्यंत लाचारगी से मेरी और देखा.
पिता गुस्से से मेरी और देखे जा रहे थे. मुझे सामने के कमरे की चारपाई पर बिठाया गया. पिता ने और कुछ नहीं कहा. बस इतना ही कि 'महाराज अभी घर चलो, आपके बहन की शादी हो जाए तो आप जहां चाहे मर्ज़ी चले जाना...'
लीलू भाई ने मुझे घर लौट जाने की सलाह दी. पिता के साथ आये हुए लोगों से माँ की तबियत का हवाला दिया. माँ ब्लड प्रेशर की मरीज़ थी और मुझे उनकी चिंता होने लगी. सभी ने यही समझाया कि दुनिया अपने घर पर रहकर भी बदली जा सकती है.
वह क्षण भावुकता से भरा हुआ था और शायद ठहरा हुआ भी...
मैं पिता के साथ घर लौट आया. लीलू भाई भी लौटाए गए. उन्होंने पैसों की अर्जेंसी का जो बहाना किया था, उसे उनके मामाजी ने बहाना नहीं माना था.
घर लौटा, तो माँ ने एक ही सवाल किया, 'क्यों लौट आये?' मैं माँ का चेहरा देखता रह गया. वे एकदम शांत थीं. मुझे उन लोगों पर खूब गुस्सा आया जिन्होंने माँ की तबियत का हवाला दिया था.
अगले ही दिन पिता ने मुझे अपने एक मित्र के यहाँ नज़र कैद कर दिया. लगभग एक साल तक नज़र कैद रखने के पश्चात मेरी शादी का फैसला हुआ. मुझे उस रोज़ मालूम हुआ, जिस दिन मेरा तिलक होना था. नाऊ ठाकुर एक जोड़ी कपडा लेकर आया और मुझे से कहने लगा कि जल्दी से नहा-धोकर इसे पहन लो और घर आ जाओ. मुझे लगा कि शायद मेरी रिहाई का वक़्त आ गया है. घर पहुँचने पर मालूम हुआ कि मेरा तिलक होना है. मैंने जब भीतर जाकर माँ से पूछा कि यह सब क्या है, तो उन्होंने बस इतना ही कहा, 'घुट-घुट कर जीना नहीं है अब मुझे...'
१९ मई १९९६ को २२ साल की उम्र में मेरा विवाह हो गया. दुनिया बदलने का सपना और मुगालता मैं अब भी पाले हुए हूँ. मेरी दुनिया जरूर बदल गई है. माँ की दुनिया भी बदल गई है. लिखने-पढ़ने और जीवन को समझने की उम्र में जिस व्यक्ति को आटे-दाल और नमक का भाव मालूम हो जाता है... दुनिया बदलने का माद्दा उसी में आता है... अपने अनुभव से यह बात कह रहा हूँ भाई!

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