मंगलवार, 24 मई 2011

कहाँ हो तुम?


अब तो तुम्हारी छवि भी स्मृतियों से धूमिल होने लगी है
दिन में एक बार
उस मोड़ से गुजरना ही होता है मुझे
जहां तुम्हें हँसते देखकर
गिर पड़ा था वह सावंला बाइक सवार अपनी होंडा सीडी हंड्रेड से
उस पुल पर से भी
जिस पर न जाने कितनी ही बार
ठहर गया था समय
तुम्हें गुजरते देख

तुम्हें याद है
मुकेश का वह दर्दीला गीत
'दीवानों से ये मत पूछो...'
जिसकी अंतिम दो पंक्तियाँ
मैं अपनी नाक दबा कर गाता था
और तुम गीत के तमाम दर्द को महसूसने के बावजूद
खिलखिला कर हंस पड़ती थी

हिस्लॉप कॉलेज के प्रांगण
में उस रोज जब
बहुत दिनों बाद देखा था मैंने और तुमने
एक-दूसरे को
तो हमारे चेहरे के लाली चुराकर भाग गया था
सूर्य आकाश में
याद है न तुम्हें!

कैसी हो तुम या कैसी होगी?
इस सवाल का जवाब कभी नहीं ढूँढा मैंने
तुम्हें ढूंढते हुए भी
लेकिन मुझे हमेशा अंदेशा लगा रहता है कि
कहीं घट न रही हो
तुम्हारे मुस्कान की लम्बाई इस कठिनतम दौर में

तुम्हारे चेहरे का हर शफा
मैं लगभग भूल चूका हूँ
सिवाय तुम्हारे मुस्कान के
भूल चुका हूँ सारी बातें
सिवाय उस मौन के जिसे
तुमने कभी नहीं तोड़ा
मैंने तोड़ना चाहा तब भी

एक बार और देख लेने की तमन्ना है तुम्हें
क्योंकि मेरी ही तरह बदल गई होगी
तुम्हारी भी डील-डौल
और अब हिचकियाँ तुम्हें भी
होली-दिवाली पर ही आती होंगी

एक बार और देख लू तुम्हें
तो कम से कम कुछ दिन तो
आराम से सो पाउँगा
पिछले सत्रह सालों से नहीं सोया हूँ
क्या तुम सोयी?

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