सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

चंद्रकांत देवताले : अंतर्बाह्य कवि - प्रफुल्ल शिलेदार

हिन्दी कवि चंद्रकांत देवताले को आज 26 मार्च को नाशिक के यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र मुक्त विश्वविद्यालय के कुसुमाग्रज अध्यासन की ओर से 'कुसुमाग्रज राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार 2011'प्रदान किया जाएगा। वरिष्ठ कवि एवं अनुवादक विष्णु खरे उन्हें यह पुरस्कार सौपेंगे। पिछले महीने ही श्री देवताले को ग्वालियर में प्रथम कविता समय सम्मान से नवाजा गया था। हमारे समय के इस 'वरिष्ठ' लेकिन महत्वपूर्ण कवि की कविताओं की समर्थता का खाका खींच रहे हैं, चर्चित युवा मराठी कवि प्रफुल्ल शिलेदार। मूल मराठी से अनुवाद किया है युवा हिन्दी कवि पुष्पेन्द्र फाल्गुन ने।

पिछले पचास साल से भी अधिक समय से कविता लिख रहे चंद्रकांत देवताले उम्र के उस मुकाम पर हैं, जिसे बुजुर्गियत कहा जाता है, और जहाँ पहुँचते ही आम लेखक कवि अपनी 'वरिष्ठता' पर धन्य हो उठते हैं और अपनी सर्जनशीलता भूलकर आर्शीवाद देने की भूमिका में जम जाते हैं। खुद अपने विघटन के चश्मदीद होते हैं और अपनी महिमा-मंडन की कोशिश में जुटे रहते हैं। लेकिन चंद्रकांत देवताले इस तरह की बातों से चिढ़ते हैं। 2010 में उनका ग्यारहवां कविता संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूँ' प्रकाशित हुआ। कवि के रूप में इस क्षण तक जीवित रहने का सूत्र ही उन्होंने इस संग्रह के एक कविता में बयान किया है;
'मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा  कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा'
वे लिखते हैं - 'ऐसे जिंदा रहने से नफरत है मुझे  जिसमें हर कोई आए और मुझे अच्छा कहे  मैं हर किसी की तारीफ करते भटकता रहूँ  मेरे दुश्मन न हों  और इसे मैं अपने हक में बड़ी बात मानूँ'
आम तौर पर इस उम्र के लेखकों की आकांक्षा के उलट बातें देवताले अपनी कविताओं में लिखते हैं। उनका अलहदापन विधानों के रूप में उनकी कविताओं में व्यक्त होता है, जिसे उनकी कविताओं से रूबरू हर शख्स जान सकता है। 
देवताले कभी कवि-काया में प्रवेश नहीं करते। उन्हें कभी कवि-काया में प्रवेश की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वे साक्षात अंतर्बाह्य कवि हैं। निरंतर कवि हैं। कविता की अखंड धूनी अपने मन में रमाए हुए हैं। जीवन का हर क्षण वे कवि की तरह ही जीते हैं। चिरंतन जागरुकता से उनकी कविताओं को व्यापक जीवन-दृष्टि मिलती है। दुनिया के सभी छोटे-बड़े प्रसंगों को कविता में रुपांतरित करने का सबक देवताले की कविताओं के जरिए हासिल है। 'नींबू मांगकर' सरीखी कविता के जरिए वह पड़ोसी से नींबू मांगने की छोटी सी घटना के जरिए बदलती सामाजिक मानसिकता को उजागर करते हैं। इस घटना की पार्श्वभूमि पर वे कहते हैं, 'अब घर में ही बाजार हो गए हैं और बैंक खुल गए हैं, लेकिन एक साधारण नींबू पड़ोसी से बाँटने की हमारी कैफियत गुम हो गई है', इस प्रसंग को पढ़ते हुए पाठक अपनी पड़ताल के लिए विवश हो जाता है।
समय के थपेड़ों से मानवीय मूल्यों के अधोपतन ही देवताले की कविताओं के महत्वपूर्ण आस्थाविषय हैं। वैश्विक बाजारीकरण की वजह से धीरे-धीरे कमतर होती जा रही मानवता, उन्हें बेचैन करती है। आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक घिसरन के इस दौर में, वे, सबसे निचले पायदान पर स्थित आम आदमी के दृढ़ता से खड़े रहने का स्वप्न देखते हैं। लेकिन इस वर्ग से दूर हो जाने का खेद उनकी 'मेरी पोशाक ही ऐसी थी' शीर्षक की कविता में स्पष्ट दिखाई देता है। देवताले के कवि होने का यह एक महत्वपूर्ण पहलू है। इस तरह की आत्म-टिप्पणियों से वे कविता से आत्म-प्रवंचना के ऊपरी झोल को सीधे छाँट देते हैं। अनेक करुणामय चित्र वे कविता के माध्यम से हमारे समक्ष कुछ इस तरह उपस्थित करते हैं कि ये चित्र हमारे मन-मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। कई कविताओं में देवताले ने निजी और व्यक्तिगत अनुभव व्यक्त किए हैं। दैनिक जीवन के अनुभव हों कि छोटी घटनाओं से जन्मती विचार तरंगें हों, देवताले व्यक्तिगत अनुभवों का सहजता से व्यापीकरण करते हैं। इस प्रक्रिया में उनकी अनूठी कल्पनाशक्ति पंक्ति दर पंक्ति उनका साथ देती है। विलक्षण संवेदनशीलता उन अनुभव को संपूर्ण क्षमता के साथ कविता में ले आती है। ठेठ बोली से नजदीकी बनाती भाषा की ताजगी कविता को स्पंदित करती है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि जिंदगी के संघर्षों में भी कवि अपनी जनपक्षधरता को नहीं बिसरता और इसी वजह से उनकी कविताएं सीना ताने खड़ी रहती हैं। देवताले की प्रत्येक कविता, यहाँ तक कि उनके ताजा संग्रह की कविताएं भी, इस गुण-विशेष से जगमग हैं। इस तरह की सृजनात्मक ऊर्जा के कवि गिनती के ही हैं और देवताले का नाम इस श्रेणी में सर्वोच्च है।
देवताले जी की कविताओं का विश्व व्यापक है। उसमें वास्तविक जीवन की सैकड़ों वस्तुएं हैं। आग, पानी, रोशनी, आकाश, पहाड़, चंद्रमा, पत्थर, चाकू, नींबू, समुद्र, पेड़, अंधेरा..., उनके पसंदीदा रूपक हैं। इन रूपकों का वे किसी भी तरीके से उपयोग कर सकते हैं, विकसित कर सकते हैं। नई अल्पजीवी वस्तुओं को अपनी कविता में बिंब बनाने की बजाय वे पुरातन बिंबों से ही नए समकालीन अर्थ व्यक्त करते चलते हैं। हमारा मनुष्यत्व अनेक रिश्ते-नातों से समृद्ध होता है। देवताले अपने पिता होने, पुत्र होने, भाई होने, मित्र होने के संबंधों की अति सूक्ष्म पड़ताल अपने कविताओं के जरिए करते हैं। दो लड़कियों का पिता होने से, माँ पर नहीं लिख सकता कविता, बेटी के घर से लौटना, जैसी कविताओं के जरिए अति निजी संबंधों के अनुभवों को हौले-हौले कविताओं में महज रूपांतरित कर ही देवताले रुकते नहीं है, बल्कि इन अनुभवों को अविस्मरणीय ऊंचाई पर ले जाते हैं। इन कविताओं को पढ़ने के बाद हम निजी अनुभवों में इनकी तीव्रता महसूस कर सकते हैं।
देवताले की कविताओं में स्त्रियों के विविध स्वरूप और स्त्री की ओर देखने की उनकी निरपेक्ष दृष्टि पर विशेष विषय की तरह गौर किया जाना चाहिए। सिर्फ लेखक-कवियों को ही नहीं बल्कि मनुष्य के रूप में जीने वाले प्रत्येक व्यक्ति को देवताले की कविताओं की स्त्री रूप को देखना चाहिए। स्त्री-पुरुष के विविध नाते-संबंधों के दुर्लभ आयाम देवताले सहज रीति से प्रस्तुत करते हैं। विविध संदर्भों से वे स्त्री की जैव श्रेष्ठता को स्वीकारते हैं और उसकी पनाह लेते हैं। हर नाते, हर संबंध में वे स्त्री को श्रेष्ठता देते हैं। भावनात्मक दृष्टि से उससे पुख्ता तौर पर जुड़ते हैं और उसके अदभुत रसायन से थोड़ी सी ऊर्जा पाने की कोशिश करते हैं। श्रेष्ठता स्वीकारते समय वे भूले से भी उसके उदात्तीकरण का ढोल पीटना पसंद नहीं करते। आज समाज में शोषण की एक व्यूह रचना की तहत स्त्री के उदात्तीकरण का कुत्सित प्रयास कुछ शक्तियों द्वारा किया जा रहा है। इस तरह के दैवीकरण की किसी भी कारगुजारी से देवताले की स्त्री-श्रेष्ठता मीलों दूर है। बल्कि इस तरह के किसी भी कपट के विरुद्ध एक आवाज भी है। घर में अकेली औरत के लिए, नवंबर में तैरती हुई ऑंखें, बालम, ककड़ी बेचनेवाली लडकियां, ब्लेड, उसके सपने, स्त्री के साथ जैसी अनेक कविताओं के जरिए देवताले स्त्रियों की मानवीयता प्रकाशित करती अनन्य भूमिकाओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। किसी भी भूमिका के पार्श्व में स्त्री विषयक स्वाभाविक आकर्षण देवताले अदभुत तरीके से प्रस्तुत करते हैं।
देवताले की कविताओं को पढ़ते हुए यह आसानी से समझा जा सकता है कि अपनी सर्जनाशील बुलंदी से वे अपने बोल-व्यवहार पर सूक्ष्म दृष्टि गड़ाए रहते हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते समय हम कई बार अपने से ही मुँह चुराने लगते हैं, अपराध बोध से भर जाते हैं। वे हमारे टुच्चेपन पर, हमारी अनैतिकता पर, हमारी असंवेदनशीलता पर, हमारी अमानवीयता पर उंगली रखते हैं। अपने व्यक्तिगत जीवन की असभ्यता और अनुदारता की ओर भी वे जब सीधे इशारा करते हैं, तब उनकी सर्वव्यापी काव्य-दृष्टि हममें संज्ञान पाती है। व्यक्तिगत संबंधों में सत्ता के तनाव से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता के निर्मम खेलों तक देवताले की कविताओं का पाट फैला हुआ है।
हिंदी के शीर्षस्थ कवि गजानन माधव मुक्तिबोध को देवताले अपना गुरु मानते हैं। मुक्तिबोध ने कलात्मकता की तुला को जरा सा भी झुकाए बिना अपने विचारों को कविता में जगह दिलाने के लिए संघर्ष किया। जीवन के स्थूल अनुभवों और विचारों की सूक्ष्म अनुभूतियों को कला में रूपांतरित करने में देवताले को महारत हासिल है।
दूसरी भाषा के कवियों की किताबें कई बार सहजता से नहीं मिलती, तब अपनी भाषा में अनुवाद उस कवि तक हम पहुँचाने का महत्वपूर्ण काम करते हैं। देवताले की चयनित कविताओं का मराठी में अनुवाद चंद्रकांत पाटिल ने किया है, जो 'तिची स्वप्ने' (पापुलर प्रकाशन, मुंबई) नाम से पुस्तकाकार उपलब्ध है। इसी तरह चंद्रकांत पाटिल ने ही देवताले की लंबी कविता 'भूखंड तप रहा है' का भी अनुवाद किया है। (इस अनुवाद को पुस्तक रूप में साक्षात प्रकाशन, औरंगाबाद ने प्रकाशित की है।) मराठी में उनकी फिलहाल यही दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। देवताले मराठी से विशेष प्रेम करते हैं। वे मराठी का 'मौसी की बोली' के रूप में उल्लेख करते हैं। मराठी साहित्य का वे लंबे समय से बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं। इसी प्रेम के चलते उन्होंने 1980 में दिलीप चित्रे की कविताओं का एक संग्रह 'पिसाती का बुर्ज' नाम से हिंदी में अनूदित किया था। हाल ही उन्होंने साहित्य अकादमी के लिए तुकाराम के चुनिंदा अभंगों को हिंदी में अनूदित किया है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में अपने समकालीनता को यदि समग्रता से समझना हो तो देवताले की कविताओं को पढ़ने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। समस्त राजनैतिक समझ, सामाजिक विषमता के स्वरूप एवं कारणों की समझ, व्यक्तिगत सुख-दुखों को मानवीय सुख-दुःखों के स्तर तक ले जाने की क्षमता, तरल भाषा और अपार सहृदयता की वजह से चंद्रकांत देवताले निर्विवाद रूप से भारतीय साहित्य के एक श्रेष्ठ कवि हैं।
'पत्थर फेंक रहा हूँ' संग्रह की अंतिम कविता में लिखते हैं; -
'अब मुद्दत बाद सुना है कि दिन रात लिख रहा है
संभालकर रखी चिट्ठियों के जवाब
खोल दिया है उसने बीचो-बीच आकाश के
मँझरात एक डाकघर
निवेदन कर रहा है नक्षत्रों से
कि बांट दे वे सब मिलकर पृथ्वी पर
पौ फटने तक उसकी चिट्ठियाँ तमाम'

मैं भी आधीरात आकाश के नक्षत्रों से अनुरोध कर रहा हूँ कि वे देवताले की कविताएं रातों-रात पृथ्वी के सभी मनुष्य तक पहुँचा दें। मुझे भरोसा है कि उसके बाद जो सूर्योदय होगा, वह निश्चित तौर पर खूब मानवीय चेहरे वाला होगा। उसमें जीवन की सहजता होगी, संबंधों में घनिष्ठता होगी, विषमता की खाई पटी हुई होगी। देवताले की कविताओं में इतनी ताकत तो निश्चित ही है।

प्रफुल्ल शिलेदार
6-अ, दामोदर कालोनी
सुरेन्द्र नगर, नागपुर 440015
मो. 09970186702
shiledarprafull@gmail.com

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि

११ मई २०११ को नागपुर के दीनानाथ हाईस्कूल में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की १५० वीं जयंती के निमित्त युवा कवियों के विचार नामक कार्यक्रम आयोजित हुआ. इसमें श्री अरिंदम घोष, श्रीमती इला कुमार, श्रीमती अलका त्यागी, श्री अमित कल्ला के अलावा मैंने यानि पुष्पेन्द्र फाल्गुन ने भी अपने विचार रखे. मैंने वहाँ जो कहा, वह आपके पेशे-खिदमत है. पढ़कर कृपया अपनी राय से अवगत कराएं...

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कालजयी काव्यकृति गीतांजलि को यदि मुझे एक वाक्य में अभिव्यक्त करना हो तो मैं कहूँगा, 'सत्य तक पहुँचने-पहुँचाने का प्रयास है गीतांजलि।' गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के किसी कविता की ही पंक्तियां हैं;
सत्य ये कठिन
कठिनेरे भालोबासिलाम
से कखनो करे ना बंचना
(सत्य तो कठिन है, लेकिन इस कठिन से ही मैंने प्रेम किया, क्योंकि यह सत्य कभी वंचना नहीं करता।)

      गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का समूचा साहित्य फिर चाहे वह काव्य हो, नाटय हो, कथा-कादंबरी हो, हर कहीं सत्य ही उद्भाषित होता है, सत्य ही उद्धाटित होता है, सत्य की ही पक्षधरता है। गीतांजलि में सत्य की पक्षधरता के साथ-साथ सत्य प्राप्ति के उपाय सर्वाधिक प्रखर हैं। प्रखरत…

दूध वाला भैया

वह भैया है या अंकल उसे नहीं पता, बस वह इतना जानता है कि उसका जन्म दूध बेचने के लिए ही हुआ है। बाप-दादा यही करते रहे, सो उसे भी यही करना है। बाप-दादा भी यह जानते थे कि उसे यही करना है, इसीलिए जब वह सातवीं क्लास में अपने मास्साहब की कलाई काट कर घर भाग आया था, तो वे दोनों जोर से हँस पड़े थे।
वह रोज गाँव से शहर आता है दूध बेचने। पहले साइकिल से आता था, लेकिन इधर एक साल पहले जब उसने दाढ़ी वाले नेताजी के मुंह से विकास का नाम और मतलब सुना था, तब से वह रात दिन अपने विकास की फ़िक्र में घुलने लगा था, लिहाजा उसके बाप ने उसकी शादी कर दहेज़ में एक मोटरसाइकिल मांग ली। तो वह अब दूध बेचने मोटरसाइकिल पर गाँव से शहर आता है।
अभी चार-पांच दिन पहले की बात है। अखबार में छपा था कि भीषण गर्मी पड़ रही है। तापमान ४७ डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था। उस दिन, वह अपनी मोटरसाइकिल से दूध देने शहर की और भागा जा रहा था। अचानक शहर से दस किलोमीटर पहले उसकी मोटरसाइकिल भुक-भुक कर बंद पड़ गई। अभी वह नीचे उत्तर कर यह समझने की कोशिश ही कर रहा था कि कल रात दस बजे तक अच्छी चलने वाली मोटरसाइकिल, आज अचानक क्यों बंद पड़ गई कि सड़क से गुज…

मेरी दिनचर्या

जिस रोज़ मैं गलतियां करता हूँ, उस रोज़ मैं दूसरों की गलतियां सहजता से नज़रंदाज़ कर देता हूँ... जिस रोज़ मैं गलतियां नहीं करता, दूसरों की एक गलती भी मुझे नागवार गुजरती है... :) :)) :)))